बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए चुने जाने और विधान परिषद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी बीजेपी नए मुख्यमंत्री का चुनाव नहीं कर पा रही है। बिहार में इन दिनों राजनीतिक सन्नाटा है। विधान परिषद से इस्तीफ़ा दे कर नीतीश ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ने का साफ़ संकेत दे दिया है। लेकिन बिहार से नीतीश के विदा होने के बाद राजनीतिक शून्य को कौन भरेगा, यह अभी तक साफ़ नहीं है। मुख्यमंत्री को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। इस बार बीजेपी को मुख्यमंत्री का पद मिलने की उम्मीद है। 2025 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी को 79 और जेडीयू को 75 सीटें मिली थी। तब से ही अटकलें लगायी जा रही थीं कि बीजेपी अब मुख्यमंत्री पद के लिए दावा करेगी। लेकिन नीतीश की सहमति के बिना यह संभव नहीं था। अब जब नीतीश ने दिल्ली प्रस्थान का एलान कर दिया है तब भी ताजपोशी किसकी होगी, इसका फ़ैसला बीजेपी नहीं कर पा रही है।

सम्राट चौधरी बनाम नित्यानंद राय

नए मुख्यमंत्री के लिए बीजेपी कोटा से उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय का नाम जोर-शोर से चल रहा है लेकिन ये भी चर्चा है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली की तरह कोई नया चेहरा बिहार की जातिवादी राजनीति के क्षितिज पर उभर सकता है। नई नई राजनीति में आई श्रेयसी सिंह का नाम भी उछाला जा रहा है। वैसे, नीतीश मुख्यमंत्री का पद कब छोड़ेंगे, इसकी घोषणा अभी नहीं हुई है। विधान परिषद से इस्तीफा के बाद भी वो छह महीने तक मुख्यमंत्री रह सकते हैं। एक चर्चा ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अभी बंगाल सहित पाँच राज्यों के चुनाव में व्यस्त हैं इसलिए इस महीने के बाद ही फ़ैसला हो पाएगा।
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पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा

बिहार की राजनीति से नीतीश की विदाई कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। 1990 के बाद बिहार की राजनीति सिर्फ़ दो व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। सबसे पहले आए लालू यादव जिन्होंने बिहार की सदियों पुराने सवर्ण वर्चस्व को ख़त्म करके पिछड़ों का दबदबा कायम किया। पिछड़ा और दलित राजनीति को दो खेमों में बाँटकर नीतीश ने 2005 में लालू को किनारे धकेल दिया। तब से अब तक बिहार में नीतीश का एकछत्र राज क़ायम है। 
20 सालों में नीतीश ने अपना गठबंधन बदला लेकिन मुख्यमंत्री बने रहे। वो जिस गठबंधन के साथ गए जीत उसी की हुई। नब्बे के दशक के आख़िरी दिनों में अपनी अलग पार्टी बनाने के बाद से नीतीश एनडीए के साथ रहे। लेकिन 2015 में वो एनडीए छोड़कर जेडीयू गठबंधन में शामिल हो गए तो जीत जेडीयू गठबंधन की ही हुई। 

नीतीश बिहार की अस्मिता बन गए। ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बंगाल के ज्योति बसु की तरह वो राज्य के प्रतीक माने जाने लगे।

वारिस की तलाश

नीतीश ने बिहार में एक नई राजनीति की शुरुआत की। नब्बे के दशक में लालू यादव ने राजनीति को सवर्णों से छीन कर पिछड़ों के हाथों में पहुँचा तो दिया लेकिन उसके मुख्य लाभार्थी यादव बन गए। अन्य पिछड़ों ने उपेक्षित महसूस करना शुरू कर दिया। इसी दौर में नीतीश ने अति पिछड़ों और अति दलितों को संगठित करके अपनी राजनीतिक आधार तैयार की। लालू के बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री काल में बिहार को जंगल राज की उपाधि मिल गयी। अपराध से परेशान सवर्ण जातियों ने नीतीश के रूप में एक मुक्तिदाता को देखा। नीतीश ने महिलाओं को एक अलग वोट बैंक का रूप दिया। इस तरह अति पिछड़ा, अति दलित, महिला और कुछ सवर्ण जातियों का एक नया गठबंधन तैयार हुआ, जिसके बूते पर नीतीश करीब 20 सालों से सत्ता में बने हुए हैं। नीतीश का ये गठबंधन कभी भी इतना मजबूत नहीं हुआ कि वो अकेले दम पर सरकार बना सकें। लेकिन बार बार यह साबित हुआ कि नीतीश जिसके साथ रहेंगे जीत उसी की होगी।
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अब ये सवाल उठ रहा है कि नीतीश के बाद उनकी विरासत को संभालेगा कौन? नीतीश की पार्टी के बड़े नेताओं में शुमार राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह और संजय झा इसके काबिल नहीं माने जाते। नीतीश की विरासत को कोई अति पिछड़ा ही संभाल सकता है। अब तक राजनीति से दूर रहे नीतीश के बेटे निशांत कुमार को जल्दबाजी में पार्टी में शामिल किया गया। नीतीश राजनीति में परिवारवाद के धुर विरोधी रहे हैं, इसलिए उन्होंने अपने बेटे को राजनीति में शामिल नहीं किया। अब लगभग 50 की उम्र में अचानक पार्टी संभालने की उनकी क्षमता पर सवाल उठाया जा रहा है। राज्य सभा में जाकर भी नीतीश पार्टी को थोड़े दिनों तक संभाल तो सकते हैं लेकिन उनके बाद कोई नेतृत्व नजर नहीं आ रहा है।

बीजेपी का सपना

हिंदी पट्टी में बिहार अकेला राज्य है जहाँ बीजेपी अकेले दम पर सरकार नहीं बना पायी है। इसका मुख्य कारण नीतीश कुमार ही हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पिछड़ों की कोई मजबूत पार्टी कभी नहीं उभरी इसलिए बीजेपी का रास्ता आसान हो गया। उत्तर प्रदेश में कांशीराम और मायावती ने अति पिछड़ों और दलितों को संगठित करने में कामयाबी हासिल कर ली थी। लेकिन कांशीराम के बाद मायावती उनकी राजनीतिक विरासत को आगे नहीं बढ़ा सकीं इसलिए बीजेपी को अति पिछड़ों और दलितों के बीच पैठ बनाने का मौक़ा मिल गया।
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क्या नीतीश के बाद बीजेपी बिहार में उत्तर प्रदेश के गणित को दोहरा पाएगी। नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर बीजेपी ने बिहार पर निशाना पहले से साध रखा है। नितिन नबीन चार बार विधायक होने के बाद भी बिहार की राजनीति में कोई चर्चित नाम नहीं थे। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनका कद अचानक बढ़ गया है। विधान सभा छोड़कर राज्य सभा में आने से उनका राजनीतिक दायरा और बढ़ेगा। नीतीश को मुख्यमंत्री के पद से हटने के लिए सहमत कर मोदी शाह की जोड़ी ने बिहार में बीजेपी का रास्ता आसान कर दिया है। नीतीश के रहते बीजेपी को उनकी छाया में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता था। नीतीश के बाद उनकी पार्टी का नेतृत्व भले ही उनके बेटे के हाथ में चला जाए उन्हें बीजेपी के साये में रहना होगा। लेकिन सिर्फ मुख्यमंत्री का पद छोड़ देने से नीतीश का राजनीतिक दबदबा खत्म नहीं होगा। उन्हें राजनीति में बेअसर करने के लिए बीजेपी को कुछ और उपाय सोचना होगा।