बिहार में हाल ही में हुई विधि अधिकारियों की नियुक्ति में दलितों, मुसलमानों, महिलाओं और कुछ खास जातियों को लगभग पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है। इससे पहले डीएम-एसपी और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की फील्ड पोस्टिंग में मुसलमान और कुछ खास जातियों के साथ यही रवैया देखने को मिला था। इस तरह की सरकारी नियुक्तियों और पोस्टिंग में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल के अंतिम दौर में भाजपा की छाप देखने को मिली रही थी। अब विधि अधिकारियों की नियुक्ति में भाजपा की छाप गहरी हो गयी है और जदयू के नेता अपने कुछ खास लोगों को पैनल में रखवाने तक सीमित हो चुके हैं।
बिहार में जब सम्राट चौधरी भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बने तो नीतीश कुमार के समय के महाधिवक्ता पीके शाही को हटाकर एसडी संजय को महाधिवक्ता बनाया गया। अब नए महाधिवक्ता द्वारा बनाए गैर सरकारी पैनलों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय मीडिया इस मामले में पूरी तरह चुप नजर आता है हालांकि सोशल मीडिया पर इसका विरोध जरूर हो रहा है।
पटना हाई कोर्ट के कई वकीलों का आरोप है कि लंबे अनुभव और अच्छी प्रैक्टिस वाले वकीलों को सरकारी पैनल में जगह न देखकर ऐसे लोगों को जगह दी गई है जो एक खास पार्टी का झंडा उठाने वाले हैं हालांकि उनके पास ना तो अनुभव है और ना ही कानूनी मामलों की सही जानकारी। कुछ वकीलों का कहना है कि सरकार वैसे तो इस पैनल में आरक्षण नहीं देती है लेकिन आरक्षण के प्रावधानों का ख्याल रखा जाना चाहिए था। उनका कहना है कि दरअसल यह इस कोशिश का हिस्सा है जिसमें यह कहा जा रहा है कि अब आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए।
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एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने फेसबुक लाइव में बताया कि 119 सरकारी वकीलों के पैनल में 97 वकील ऐसे हैं जिनका संबंध सवर्ण वर्ग से है। इसी तरह 16 एडिशनल एडवोकेट जनरल की बहाली में एक भी अनुसूचित जाति और मुस्लिम समुदाय का वकील नहीं है। यह भी बताया गया है कि जिन बाकी दूसरी जातियों के लोगों को प्रतिनिधित्व मिला है उनमें भी सरकारी बताई जाने वाली दो जातियों यानी कुर्मी और कुशवाहा का वर्चस्व है। पूरे पैनल में केवल तीन वकील दलित समुदाय के हैं।
जहां तक मुसलमानों का संबंध है तो उनको किस हद तक सीमित किया गया है इसका अंदाजा हाल ही में जारी लिस्ट से होता है। दरअसल पिछले दिनों 56 विधि अधिकारियों से सरकार ने इस्तीफा ले लिया था। जिन 6 एडिशनल एडवोकेट जनरल से इस्तीफा लिया गया उनमें दो वकील मुस्लिम थे लेकिन अब जिन 16 एडिशनल एडवोकेट जनरल की नियुक्ति की गई है उनमें एक भी मुस्लिम नहीं है। बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के लिए जिन दो एडिशनल एडवोकेट जनरल की नियुक्ति की है उनमें भी कोई मुसलमान और दलित नहीं है।
बिहार के महाधिवक्ता की ओर से जारी सूची में स्टैंडिंग काउंसल के 40 पदों में किसी मुस्लिम को जगह नहीं मिली है जबकि पहले दो मुस्लिम हुआ करते थे। पहले गवर्नर लीडर के तौर पर दो मुसलमान थे जबकि इस बार केवल एक हैं। 23 वकीलों को शासकीय अधिवक्ता यानी जीए नियुक्त किया गया है, उनमें एक मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर इस बार के पैनल में केवल दो मुसलमान को जगह मिली है जबकि इससे पहले इनकी संख्या आठ थी।
हाई कोर्ट के वकील सरोज कुमार का कहना है की नई लिस्ट में दो तरह के लोग शामिल हैं। एक तो वह है जो खुद या उनके माता-पिता किसी पार्टी का झंडा लगाते या पोस्टर चिपकाते थे। उनका कहना है कि यह विद्वान अधिवक्ताओं का पैनल होना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं है। इस मामले में वह बिहार के महाधिवक्ता के प्रति मायूसी जाहिर करते हैं। उन्होंने कहा कि नए महाधिवक्ता ने कमपीटेंट टीम बनाने की बात की थी लेकिन उनकी टीम में ऐसे लोग शामिल हैं जो शायद एक भी कैसे अपनी जिंदगी में नहीं जीत पाए होंगे।
दूसरी बात यह कि इसमें ऐसे एडवोकेट भी हैं जो 2014, 15 और 16 के एनरोलमेंट वाले हैं और 2001-2 से या उससे पहले के रजिस्टर्ड वकीलों की अनदेखी की गई है। उनका कहना है कि जो ज़्यादा अनुभवी और योग्य वकील हैं, वह क्या महाधिवक्ता को मूर्ख लगे? उन्होंने इस पैनल में महिलाओं को सही प्रतिधित्व नहीं मिलने की बात कही और कहा कि इसमें आरक्षण के कोटे का भी इसमें ध्यान नहीं रखा गया है। उनके अनुसार दलित समुदाय के ऐसे लोगों का प्रतिनिधित्व भी नहीं है जो हर मुद्दे को प्रखरता से उठाते हैं, यहां तक कि ओबीसी और एससी-एसटी के मामलों में भी अपर कास्ट के लोग सरकारी अधिवक्ता बनाए गए हैं।
पटना हाई कोर्ट के सीनियर वकील प्रेम कुमार पासवान ने तो इस मामले में केंद्रीय मंत्री और लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान और हिंदुस्तानी एवं मोर्चा के संरक्षक जीतन राम मांझी का नाम लेते हुए कहा कि उन्हें देखना चाहिए कि उनकी सरकार में नियुक्त महाधिवक्ता दलितों के साथ कितना अन्याय कर रहा है।
उनकी मांग है कि चिराग पासवान और जीतम राम मांझी महाधिवक्ता से कहें कि सरकारी पैनल में एससी एसटी और ओबीसी वर्ग के लोगों को उचित प्रतिनिधित्व दें। उन्होंने कहा कि जीतन राम मांझी आरक्षण की समीक्षा की बात करते हैं उन्हें देखना चाहिए कि वकालत जैसे मामले में भी कैसे दलित और पिछड़े समुदाय के लोगों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। उनका कहना है कि हमने इस एक उदाहरण से देख लिया कि जब आरक्षण नहीं मिलता है तो कैसे वंचित समुदाय के वकीलों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है।
पटना हाई कोर्ट के एक और अधिवक्ता का कहना है कि विधि अधिकारियों के लिए सिलेक्शन पैनल के लिए एक निष्पक्ष कमेटी होनी चाहिए थी लेकिन इसका ध्यान नहीं रखा गया। उनका कहना है कि सरकार ने स्वच्छ और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई है।
हाई कोर्ट की वकील ममता पांडे का कहना है कि बिहार सरकार ने बाकी जगहों पर तो महिलाओं को 35% तक आरक्षण दिया है लेकिन सरकारी पैनल में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। एक और वकील शिखा पांडे का कहना है कि न्याय से जुड़ी महिलाओं को ही न्याय नहीं मिल रहा है और उन्हें सरकारी पैनल में उचित जगह नहीं दी गई है।
ऐसा नहीं है कि केवल वंचित समुदाय और महिलाओं ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नए नेतृत्व वाली सरकार के महाधिवक्ता द्वारा नियुक्त वकीलों की टीम का विरोध किया है। वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश कुमार पांडे ने अपना नाम पैनल में स्टैंडिंग काउंसल के रूप में देखा जबकि उनका कहना है कि उन्होंने एडिशनल एडवोकेट जनरल पद के लिए अपनी सहमति दी थी। इसलिए उन्होंने इस पद पर ज्वाइन करने से साफ तौर पर मना कर दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप कुमार का कहना है कि उनके पास पटना हाईकोर्ट में प्रैक्टिस का 50 साल का अनुभव है लेकिन उनके मामले में भी स्टेट लॉ ऑफिसर के लिए तय नियमों की अनदेखी कर उनके नाम पर विचार नहीं किया गया।