सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को चुनौती दी थी। उन्होंने नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की थी। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और पार्टी को पटना हाई कोर्ट जाने की सलाह दी।

जन सुराज पार्टी ने याचिका में आरोप लगाया था कि बिहार सरकार ने चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को 10,000 रुपये प्रति परिवार ट्रांसफर किए, जो मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन था। पार्टी का दावा था कि इससे 25-35 लाख महिला मतदाताओं पर असर पड़ा और चुनाव निष्पक्ष नहीं रहे। जन सुराज ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट शेयर 4 प्रतिशत से कम रहा।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने याचिका पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "जनता ने आपको ठुकरा दिया है और अब आप इस न्यायिक मंच का इस्तेमाल पब्लिसिटी के लिए करना चाहते हैं?" जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी याचिकाकर्ताओं से सवाल किया, "आप यह कैसे कह सकते हैं?" कोर्ट ने कहा कि चुनावी फ्रीबीज (मुफ्त वादों) के मुद्दे पर वह गंभीर है, लेकिन ऐसी याचिका को सार्वजनिक हित के लिए दाखिल करने वाले याचिकाकर्ताओं से सुनना बेहतर होगा, न कि ऐसी पार्टी से जो चुनाव में सब कुछ हार चुकी है।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पूरे राज्य के चुनाव को रद्द करने का कोई व्यापक आदेश जारी नहीं किया जा सकता, खासकर एक राजनीतिक पार्टी की मांग पर। चीफ जस्टिस ने कहा, "हम पूरे राज्य के लिए कोई मनमाना निर्देश नहीं जारी कर सकते, वो भी एक राजनीतिक पार्टी के कहने पर।"

बिहार विधानसभा चुनाव नवंबर 2025 में हुए थे, जिसमें एनडीए (बीजेपी-जेडीयू) ने 202 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी, जबकि महागठबंधन को सिर्फ 35 सीटें मिलीं। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने चुनाव के बाद एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि 10,000 रुपये की राशि वोट प्रभावित करने के लिए काफी थी और जेडीयू-बीजेपी ने वोट "खरीदे"। उन्होंने दावा किया था कि इससे जेडीयू को 25 से ज्यादा सीटें नहीं मिलनी चाहिए थीं। बहरहाल, यह घटनाक्रम प्रशांत किशोर की पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जो पिछले साल बिहार में अपनी पहली चुनावी परीक्षा में पूरी तरह नाकाम रही थी।


सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बिहार हाई कोर्ट में जाने का निर्देश दिया। चुनावी फ्रीबीज के व्यापक मुद्दे पर कोर्ट पहले से ही सुनवाई कर रहा है और इसे तीन जजों की बेंच को भेजा गया है।

फ्रीबीज़ के विवादित मामले

प्रधानमंत्री मोदी फ्रीबीज़ की काफी आलोचना करते रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी और सरकार ने फ्रीबीज़ बांटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला लंबित है। चुनाव दर चुनाव होते जा रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई फैसला नहीं सुना पा रहा है। चुनाव के दौरान आचार संहिता लग जाती है लेकिन सत्ताररूढ़ पार्टी फ्रीज़ का ऐलान करने में पीछे नहीं रहती। बिहार, महाराष्ट्र, एमपी, यूपी, राजस्थान इसके खास उदाहरण हैं।
  • महिलाओं को सीधे कैश ट्रांसफर- मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना, लाड़ली बहन योजना, लाडकी बहिन योजना 
  • मुफ्त बिजली- दिल्ली में पिछली AAP सरकार यह योजना लेकर आई थी
  • मुफ्त पानी, लैपटॉप, साइकल, कलर टीवी, दुल्हनों के लिए गोल्ड, किसान कर्ज माफी, अतिरिक्त राशन, मुफ्त सार्वजनिक परिवहन या घरेलू उपकरण की घोषणाएं चुनाव के दौरान की गईं
  • 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में महिलाओं को ₹10,000 ट्रांसफर। चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन

बेशक, सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर की फ्रीबीज़ पर याचिका खारिज कर दी है, लेकिन यह मुद्दा बना हुआ है। महाराष्ट्र और एमपी में तो लाडली बहना योजना के जरिए चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान पैसे बांटे गए। लेकिन बीजेपी सरकार ने चुनावों जीतने के बाद इनमें कटौती शुरू कर दी है। तरह-तरह के बहाने बनाकर योजना का पैसा रोका जा रहा है। एमपी में तो लाडली बहन योजना की लाभार्थियों से सरकारी कार्यक्रमों में आने का दबाव बनाया जा रहा है और न आने पर उन्हें मिलने वाला लाभ रोकने की धमकियां दी जा रही हैं। महाराष्ट्र में लाडकी बहिन योजना में अपात्र महिलाओं की आड़ लेकर बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम काटे जा रहे हैं।