चुनाव आयोग (ईसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर अदालत को गुमराह करने का आरोप लगाया। आयोग ने याचिकाकर्ताओं पर बिहार एसआईआर प्रक्रिया को पटरी से उतारने के प्रयास में गलत और झूठे दावे करने का आरोप लगाया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले की संक्षिप्त सुनवाई की। बिहार विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने आयोग पर पूर्ण विश्वास जताते हुए विशेष गहन संशोधन (SIR) से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई 4 नवंबर तक स्थगित कर दी। 
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा बिहार में चुनाव सिर पर हैं। अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित नहीं की गई है। डिलीट किए गए नामों की वजह नहीं बताई जा रही है। उन्होंने हमारे 8 अक्टूबर के हलफनामे और योगेंद्र यादव द्वारा प्रस्तुत प्रस्तुतियों का भी जवाब दे दिया है। आज हम उस दिन से एक दिन दूर हैं जब सूची को अंतिम रूप दिया जाएगा। अब जाँच के लिए समय बहुत कम है। अभी ड्राफ्ट रोल में नए नाम हटाए गए हैं और ये नए नाम अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। 
इस पर अदालत ने स्पष्ट कहा कि आयोग अपनी जिम्मेदारी निभाएगा और अंतिम मतदाता सूची में जोड़ने या हटाए गए नामों की जानकारी प्रकाशित करेगा। अदालत की यह टिप्पणी बिहार में मतदाता सूची के बड़े पैमाने पर संशोधन को लेकर उठे विवाद के बीच आई है, जहां लाखों वोटरों के नाम कथित तौर पर हटाए जाने का आरोप लगा है।
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अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित क्यों नहीं की जा रहीः प्रशांत भूषण

ADR की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने फौरन अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने और नए नामों को हटाने (ड्राफ्ट से अंतिम सूची तक) की वजह बताने की मांग की। उन्होंने कहा, "उन्होंने ड्राफ्ट रोल्स से अंतिम रोल्स तक नए हटाए गए नामों की पूरी सूची का खुलासा नहीं किया... कल (17 अक्टूबर) पहली फेज के नामांकन की अंतिम तिथि है, उसके बाद रोल फ्रीज हो जाएगा।" ईसीआई की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने बताया कि अंतिम सूची प्रकाशन की प्रक्रिया चल रही है और अपीलें न आने का हवाला दिया। 
अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन और वकील वृंदा ग्रोवर ने SIR की वैधानिकता और संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई की मांग की। ईसीआई ने ADR और यादव के पूर्व दावों का खंडन करते हुए शपथ-पत्र दायर किया।

ईसीआई का हलफनामाः अजीबोगरीब तर्क 

  • 1. याचिकाकर्ता बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को "पटरी से उतारने और बाधित" करने की कोशिश कर रहे हैं। 
  •  2. याचिकाकर्ताओं के हलफनामों में गलत और झूठे बयान हैं। उनका असली उद्देश्य अन्य राज्यों में एसआईआर को होने से रोकना है। 
  •  3. चुनाव आयोग ने हाल ही में एक सुनवाई में राजनीतिक कार्यकर्ता और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव द्वारा किए गए इस दावे पर भी ध्यान दिया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची के कारण बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। चुनाव आयोग ने तर्क दिया है कि यादव ने अखबारों के लेखों और स्व-निर्मित चार्टों पर भरोसा किया, जो उनके हलफनामे का हिस्सा नहीं थे। चुनाव आयोग ने यादव के दावों को छोटे आँकड़ों के गलत इस्तेमाल का नतीजा बताया। 

  •  4. हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलें पेश करने के लिए 2011 की जनगणना के जनसंख्या अनुमानों का गलत इस्तेमाल किया। चुनाव आयोग ने तर्क दिया है कि ऐसे आँकड़ों का इस्तेमाल अंतिम मतदाता सूची की सटीकता का आकलन करने के लिए नहीं किया जा सकता। 

  •  5. मुसलमानों को मतदाता सूची से हटाने के आरोप पर, चुनाव आयोग ने कहा कि इस मुद्दे पर याचिकाकर्ताओं का नजडरिया सांप्रदायिक है और इसकी निंदा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग ने आगे कहा कि उसके डेटाबेस में धर्म से संबंधित कोई जानकारी नहीं है।
  • 6. आयोग ने पिछली मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारणों के बारे में भी कुछ विवरण दिए हैं। बताया गया है कि 7.89 करोड़ मतदाता पिछली मतदाता सूची में थे। इनमें से 7.24 करोड़ मतदाताओं ने एसआईआर के दौरान गणना फार्म जमा किए, जबकि 65 लाख ने नहीं जमा किए। जिन 65 लाख मतदाताओं ने प्रपत्र जमा नहीं किए, उनमें से 22 लाख की मृत्यु हो चुकी थी, 36 लाख मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गए थे, और 7 लाख मतदाता अन्यत्र नामांकित थे। 

  • 7. आयोग ने आगे बताया कि मतदाता सूची से 3.66 लाख नाम चुनाव अधिकारियों द्वारा नोटिस, सुनवाई और आदेश दिए जाने के बाद हटाए गए। अब तक कोई अपील दायर नहीं की गई है। 

  • 8. चुनाव आयोग ने योगेंद्र यादव के उस हालिया दावे पर भी ध्यान दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि एसआईआर के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची में अन्य त्रुटियों के अलावा 45,000 अस्पष्ट नाम थे। चुनाव आयोग ने कहा है कि ये त्रुटियाँ केवल सॉफ्टवेयर के माध्यम से हिंदी अनुवाद में हुईं और अंग्रेजी प्रविष्टियाँ सटीक थीं और बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा सत्यापित की गई थीं। हलफनामे में कहा गया है कि सॉफ्टवेयर अनुवाद संबंधी समस्याओं के कारण स्थानीय भाषाओं में नाम मुद्रित प्रति में ठीक से नहीं दिखाई देते हैं, लेकिन इस विसंगति का मतदाता की पात्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

  • 9. यादव के इस दावे का हवाला देते हुए कि 4 लाख से ज़्यादा मतदाताओं के घरों को "0" संख्या के रूप में दर्ज किया गया था, चुनाव आयोग ने जवाब दिया है कि ये "काल्पनिक मकान संख्याएँ" थीं। हलफनामे में कहा गया है कि मतदाता स्वयं अपने घरों का विवरण देते हैं और जहाँ मकान संख्याएँ आवंटित नहीं की गई हैं, वहाँ अस्थायी संख्याएँ दी जाती हैं ताकि परिवारों का नाम मतदाता सूची में एक साथ रखा जा सके। एसआईआर 2025 के दौरान कोई नया अंकन नहीं किया गया। 

  • 10. आयोग ने दावा किया है कि एसआईआर 2025 ने मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लिया है और अंतिम सूची 30 सितंबर, 2025 को अधिसूचित की गई थी। इसलिए, चुनाव आयोग ने यह भी तर्क दिया है कि एसआईआर के विरुद्ध सभी याचिकाएँ नाकाम रही गई हैं।
यह मामला जुलाई 2025 से अदालत में विचाराधीन है। 10 जुलाई को कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया था कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और EPIC को मतदाता सूची में शामिल करने के दस्तावेजों के रूप में स्वीकार किया जाए। 28 जुलाई को ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया गया, लेकिन मौखिक सलाह दी गई कि आधार और EPIC पर विचार किया जाए। अगले दिन, लगभग 65 लाख नामों के डिलीट होने की जानकारी मिलने पर कोर्ट ने कहा कि बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए तो अदालत हस्तक्षेप करेगी।
याचिकाकर्ताओं ने अगस्त में 65 लाख नाम हटाने की अनियमितताओं का आरोप लगाया, जिसके जवाब में ईसीआई ने शपथ-पत्र दायर कर कहा कि डिलीट किए गए नामों की वजह प्रकाशित करने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। 14 अगस्त को कोर्ट ने ईसीआई को इन 65 लाख नामों की सूची बिहार मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर कारणों सहित अपलोड करने का आदेश दिया। 22 अगस्त को इन वोटरों को आधार कार्ड के साथ ऑनलाइन आवेदन करने की अनुमति दी गई। सितंबर में आधार को पहचान प्रमाण के रूप में 12वें दस्तावेज के तौर पर मान्यता दी गई।
7 अक्टूबर को कोर्ट ने ड्राफ्ट से अंतिम सूची में 3.66 लाख अतिरिक्त नाम हटाने और 21 लाख जोड़ने पर पारदर्शिता की मांग पर नोटिस लिया। 9 अक्टूबर को मुफ्त कानूनी सहायता का आदेश दिया गया। एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने घुसपैठियों की आड़ में मुस्लिमों के नाम नाम हटाने और "देश के इतिहास में सबसे बड़ी मतदाता सूची में हेराफेरी" का आरोप लगाया।