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क्या मोदी ने नीतीश के पहले कार्यकाल पर ग़लतबयानी की? 

प्रधानमंत्री मोदी ने 5 साल पहले नीतीश कुमार का जिक्र करते हुए उनके डीएनए में गड़बड़ी बतायी थी तो उन्हें इसका बहुत ज़बर्दस्त जवाब दिया गया था। बोरे में भरकर नाखून और बाल भेजे गये थे कि डीएनए जाँच करा ली जाए। मगर अब नीतीश कुमार बीजेपी के आगे इतने मजबूर हो गये हैं कि अपने कामों को भी वे नहीं दोहरा पा रहे हैं। 

समी अहमद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार में अपनी पहली चुनावी सभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने कहा कि केन्द्र में यूपीए सरकार के रहते नीतीश कुमार को काम नहीं करने दिया जाता था। बकौल मोदी- नीतीश जी के दस साल बर्बाद कर दिये।
दस साल की जगह इसे नौ साल ही माना जाना चाहिए क्योंकि बिहार में 2005 में नीतीश कुमार की एनडीए सरकार बनी और 2014 में यूपीए सरकार की विदाई हो गयी। नरेन्द्र मोदी खुद प्रधानमंत्री बने।

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अपनी इस बात से प्रधानमंत्री ने क्या उन 10 वर्षों में नीतीश कुमार ने जो काम किये थे उसे नकार तो नहीं दिया? राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि नीतीश कुमार ने अपने पहले 5 वर्षों में सबसे अच्छा काम किया।

सुशासन

इसके 5 साल बाद तक उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे काम के लिए पुरस्कार-सम्मान मिलता रहा। यह ज़रूर है कि नीतीश कुमार का अब तक अंतिम कार्यकाल उनके पहले के दो कार्यकालों के मुक़ाबले बहुत ही निराशाजनक रहा है।

नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने के दो साल बाद से ही राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार-सम्मान मिलने लगे थे।
  • हिन्दुस्तान टाइम्स और सीएनए आईबीएन ने 2007 में नीतीश कुमार को 'सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री' के खिताब से नवाजा था।
  • इकाॅनोमिक टाइम्स ने 2009 में उन्हें 'बिज़नेस रिफाॅर्मरऑफ द ईयर करार' दिया।
  • 2010 में फोर्ब्स मैगज़ीन और एनडीटीवी ने उन्हें 'इंडियन ऑफ़ द ईयर' बताया।
  • 2011 में जमशेदपुर के नामी प्रबंधन संस्थान एक्सएलआरआई ने उन्हें 'सर जहांगीर गांधी मेडल' से नवाजा था।
  • 2012 में फाॅरन पाॅलिसी मैगजीन ने नीतीश कुमार को दुनिया के 100 बड़े चिंतक में शामिल किया।
  • 2017 में बिहार में शराबबंदी के लिए, जिसकी शुरुआत राजद के साथ सरकार में की गयी थी, जैन संस्था-श्वेतांबर महासभा ने उन्हें 'अनुव्रत पुरस्कार' दिया।'

नीतीश को झटका

पटना के ए. एन. सिन्हा इंस्टीच्यूट के पूर्व निदेशक डी. एम. दिवाकर का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ यूपीए सरकार पर आरोप लगाए बल्कि एक तरह से नीतीश कुमार के कामों को एक झटके में सवालों के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया।

नीतीश कुमार का पहला कार्यकाल बिहार के लिए काफी परफाॅर्मिंग था, जिसमें कई काम केन्द्र सरकार के सहयोग से हुए। विश्व बैंक संपोषित सर्व शिक्षा अभियान के तहत केन्द्र से मिली सहायता से ही बिहार में स्कूलों के भवन फिर से रंग-रोगन के साथ खड़े किये गये।
इसके अलावा भी स्कूली परियोजनाओं में उससे सहयोग मिला। इसका फायदा स्कूलों में बढ़ते दाखिले में मिला।

क्या इस बार नीतीश कुमार चुनाव हार जाएंगे? बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार नीतीश कुमार। 

मनरेगा

उन्होंने मनरेगा, जो उस समय नरेगा के नाम से जाना जाता था, का उदाहरण देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के आने से ठीक पहले बिहार में इसके तहत 100 दिनों का काम 60 हज़ार लोगों को मिल रहा था। इसके अगले साल यह आधा होकर 30 हज़ार हो गया। आज हालत यह है कि एक करोड़ 55 लाख जाॅब कार्डधारियों में महज 20 हज़ार को 100 दिनों का काम मिल पा रहा है। 

रूरल हेल्थ मिशन

डॉ. शकील बिहार में जन- स्वास्थ्य के क्षेत्र में लंबे समय से काम करते रहे हैं। उनका कहना कि नीतीश कुमार सरकार की खुशकिस्मती थी, जिस साल उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभाला उसी साल केन्द्र की यूपीए सरकार ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन की शुरुआत की।
इससे अकेले बिहार में करीब 50 हज़ार ‘आशा‘ कार्यकर्ता बहाल हुईं। इस मिशन के तहत देश के आठ राज्यों को चुना गया जिसमें बिहार को भी प्राथमिकता मिली। 

जननी सुरक्षा योजना

इसी तरह जननी सुरक्षा योजना की शुरुआत की गयी, जिसके तहत पहली बार सरकारी अस्पतालों में प्रसव पर प्रोत्साहन राशि देने की शुरुआत हुई। इसका असर यह हुआ कि सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वालों की संख्या बढ़ी।

उन्होंने बताया कि कुछ स्वास्थ्य कार्यक्रम केन्द्र सरकार के सहयोग से ही चलते हैं। इसमें पोलियो उन्मूलन प्रमुख है और बिहार में पोलियो के ख़ात्मे के लिए यूपीए की सरकार की ओर से कोई अड़ंगा डाला गया हो, यह कोई नहीं कह सकता।

इसी तरह टीबी उन्मूलन, मलेरिया, कालाज़ार, फाइलेरिया, आयोडीन की कमी और जापानी इनसेफलाइटिस जैसे मामलों में भी केन्द्र सरकार टीके या निर्धारित कोर्स उपलब्ध कराती है।

कोरोना

डॉ. शकील कहते हैं कि हाल ही में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वैक्सीन को राजनैतिक लाभ के लिए मुफ़्त में देने का ऐलान किया। यह तो हर इंसान का सार्वभौमिक अधिकार है।
कोरोना का वैक्सीन निकले तो बिहार में ही क्यों, पूरे भारत में मुफ्त में इसका वितरण होना चाहिए। इसे चुनाव से जोड़ने का मतलब होगा कि बाकी राज्यों में चुनाव और बीजेपी की जीत से पहले यह मुफ़्त में नहीं मिलेगा। यह तो मानव आपदा का राजनैतिक लाभ लेने की बात है।

श्री दिवाकर कहते हैं कि नीतीश कुमार के सामने प्रधानमंत्री ने यह ग़लतबयानी की और मज़बूरी में वे इसका जवाब नहीं दे पा रहे हैं। 

मोदी ने 5 साल पहले नीतीश कुमार पर तंज करते हुए उनके डीएनए में गड़बड़ी बतायी थी तो उन्हें ज़ोरदार जवाब दिया गया था। बोरे में भरकर नाखून और बाल भेजे गये थे। अब नीतीश कुमार बीजेपी के आगे इतने मज़बूर हैं कि अपने कामों को भी वे नहीं दोहरा पा रहे हैं।

डबल इंजन की सरकार

डॉ. शकील कहते हैं कि अभी तो केन्द्र और राज्य दोनों जगह एक ही गठबंधन की सरकार है लेकिन 2018 में आयी ‘नीति आयोग‘ की अंतिम रैंकिंग में बिहार देश के 21 राज्यों में 20वें स्थान पर था।अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश कुमार के उन 18 महीनों पर भी तंज कसा जब वे आरजेडी के साथ चुनाव लड़ने के बाद महागठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री बने।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बाद में 18 महीने क्या हुआ यह मुझे कहने की ज़रूरत नहीं। इन 18 महीनों में परिवार ने क्या किया। रोचक बात यह है कि नीतीश कुमार ने अपनी बेहद प्रिय शराबबंदी उसी 18 महीने की सरकार में शुरू की थी।

जीएसटी

श्री दिवाकर कहते हैं कि जहाँ तक केन्द्र से असहयोग की बात है तो जीएसटी में राज्यों का हिस्सा नहीं देना अभी का इतना बड़ा मुद्दा है। लेकिन यह बात तो नीतीश कुमार सार्वजनिक सभा में कह भी नहीं सकते। उन्होंने बताया कि पिछले साल तक जीएसटी मद में बिहार के 24 हजार करोड़ रुपए बकाया थे।

इस साल यह 30 हज़ार करोड़ रुपए हो गये हैं लेकिन राज्य सरकार राजनीतिक मजबूरी में कुछ नहीं कह रही।

वह कहते हैं कि बीजेपी का पूरा अभियान नीतीश कुमार का पत्ता साफ करने वाला है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने नीतीश कुमार के 15 साल के काम को तीन-चार साल तक सीमित कर दिया।

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