उमर खालिद ने बीमार मां की देखभाल और चाचा के 40वें दिन के चहलुम के लिए अंतरिम जमानत के लिए दिल्ली कोर्ट में अपील की थी, पर नहीं मिली। निचली अदालत का यह फ़ैसला तब आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने 'जमानत नियम है और जेल अपवाद' की बात कही है।
दिल्ली की एक अदालत ने उमर खालिद को अपनी बीमार मां की देखभाल और चाचा के 40वें दिन के चहलुम के लिए 15 दिन की अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। इसने मंगलवार को उनकी अर्जी खारिज कर दी। उमर खालिद ने अपनी मां की सर्जरी और परिवार की देखभाल के लिए जमानत मांगी थी। लेकिन अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने कहा कि इन कारणों को पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। निचली अदालत का यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने जमानत को 'नियम' बनाने की बात कही है। लेकिन दिल्ली की निचली अदालत ने इस मामले में अंतरिम जमानत भी नहीं दी। उमर खालिद दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश मामले में लगभग पांच साल से जेल में हैं।
उमर खालिद के वकील साहिल घई ने कोर्ट को बताया कि उनके परिवार में पिता, मां और पांच बहनें हैं। पिता 71 साल के हैं और बीमार पत्नी की देखभाल करने की स्थिति में नहीं हैं। मां को लंबे समय से बीमारी है और डॉक्टरों ने उनको गांठ निकालने की सर्जरी करने की सलाह दी है। वकील ने कहा कि उमर खालिद परिवार का सबसे बड़ा बेटा और इकलौता बेटा है, इसलिए केवल वही मां की सर्जरी से पहले और बाद में ठीक से देखभाल कर सकता है। चार बहनें शादी के बाद अलग-अलग जगहों पर रहती हैं।
कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने आदेश में कहा कि चाचा के 40वें दिन के कार्यक्रम में जाना जरूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर रिश्ता इतना क़रीबी होता तो चाचा की मौत के समय ही जमानत मांगी जाती, इतने दिन बाद नहीं। जस्टिस बाजपेयी ने कहा कि 'उमर खालिद की पांच बहनें हैं। हालांकि वे अलग रहती हैं, लेकिन मां की मदद के लिए आ सकती हैं। पिता भी घर पर मौजूद हैं। सर्जरी बहुत मामूली है- सिर्फ गांठ निकालने की। इसमें उमर खालिद की खास जरूरत नहीं है।'
उमर खालिद ने बीएनएसएस 2023 की धारा 483 और सीआरपीसी की धारा 439 के तहत यह अर्जी दी थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले कुछ मौकों पर उमर खालिद और अन्य आरोपियों को अंतरिम जमानत मिली थी और उन्होंने शर्तों का पालन किया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर बार जमानत दे दी जाए। हर नई अर्जी को अपने हिसाब से देखा जाएगा और तभी मंजूर होगी जब वजहें उचित हों।
उमर खालिद पर SC ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई को एक फ़ैसले में कहा कि जनवरी 2026 में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने वाले अपने पुराने फैसले में कुछ गलतियां हुई हैं। अदालत ने कहा कि उस फ़ैसले में UAPA कानून और लंबे समय तक जेल में रखने वाले नियमों को ठीक से नहीं लागू किया गया।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सैयद इफ्तिखार अंद्राबी नाम के एक व्यक्ति को जमानत दे दी। अंद्राबी पर नशीले पदार्थों के ज़रिए आतंकवाद को पैसे देने का आरोप है। वे क़रीब 6 साल से जेल में थे। इस फ़ैसले में कोर्ट ने कहा, 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है। यह सिद्धांत UAPA जैसे सख्त कानूनों में भी लागू होता है।'
बेंच ने कहा कि 2021 के Union of India vs KA Najeeb फ़ैसले का सही से पालन नहीं किया गया था। उस फ़ैसले में कहा गया था कि अगर मुक़दमा लंबा खिंच जाए और आरोपी का तेज सुनवाई का अधिकार (अनुच्छेद 21) प्रभावित हो तो यूएपीए में भी जमानत दी जा सकती है।
पुराने फ़ैसले पर सवाल
जनवरी 2026 में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया लेकिन गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर आदि 5 लोगों को जमानत दे दी। कोर्ट ने अब कहा कि छोटी बेंच बड़ी बेंच के फ़ैसले (केए नजीब) को कमजोर या नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। अगर कोई शंका हो तो मामले को बड़ी बेंच को भेजना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि उमर खालिद और गुरविंदर सिंह जैसे मामलों में अपनाया गया तरीका स्वीकार करना मुश्किल है।
उमर खालिद का मामला
उमर खालिद को फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की 'बड़ी साजिश' के मामले में सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर UAPA और IPC की कई धाराओं में केस है। वे आरोपों से इनकार करते हैं और कहते हैं कि दंगे के समय वे दिल्ली में नहीं थे। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी और एक साल तक नई याचिका लगाने पर रोक लगा दी थी।
उमर खालिद की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने के ए नजीब फैसले का हवाला दिया था, लेकिन उस समय उस पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया।