मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद 15 मई 2026 को एक नए मोड़ पर पहुंच गया, जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने बहुचर्चित फैसले में भोजशाला को हिंदू धार्मिक स्थल और वाग्देवी मंदिर घोषित कर दिया। अदालत के इस निर्णय के बाद जहां हिंदू संगठनों में उत्साह का माहौल है, वहीं मुस्लिम और जैन पक्षों ने फैसले पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। विशेष रूप से जैन समाज इस निर्णय से गहरे असंतोष में है और उसने सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया है।

क्या है भोजशाला विवाद?

धार जिले में स्थित भोजशाला एक प्राचीन स्थापत्य परिसर है, जिसे लेकर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद चला आ रहा था। हिंदू पक्ष का दावा रहा है कि यह 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा निर्मित देवी सरस्वती का मंदिर था, जिसे बाद में तोड़कर मस्जिद बना दी गई। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है, जिसका निर्माण 1304 से 1331 के बीच हुआ था।
हालांकि इस विवाद का एक तीसरा पक्ष भी था—जैन समाज। जैन पक्ष ने अदालत में दावा किया कि भोजशाला मूलतः एक जैन गुरुकुल और दर्शन-शिक्षा का केंद्र था, जहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी। जैन समुदाय ने यह भी कहा कि परिसर में जैन स्थापत्य कला, जैन परंपरा और जैन साहित्य से जुड़े अनेक प्रमाण मौजूद हैं।
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अदालत का फैसला और एएसआई सर्वे

भोजशाला विवाद में निर्णायक मोड़ तब आया जब 11 मार्च 2024 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया। मुस्लिम पक्ष ने इस सर्वे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने रोक लगाने से इनकार कर दिया।
15 जुलाई 2024 को एएसआई की रिपोर्ट सामने आई। रिपोर्ट में कहा गया कि परिसर मूल रूप से साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यहां संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख, संस्कृत वर्णमाला, व्याकरण संबंधी अभिलेख, ‘कर्पूरमंजरी’ नाटक के अंश, मंदिर स्थापत्य अवशेष और स्तंभों पर उकेरी गई आकृतियां मिलीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वर्तमान मस्जिद ढांचे में पुराने मंदिर के स्तंभों का उपयोग हुआ है।
इसी रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने 15 मई 2026 को फैसला सुनाते हुए भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना और मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज कर दिया। साथ ही वहां अब तक चल रही साझा पूजा और नमाज की व्यवस्था समाप्त कर दी गई।

फैसले में ‘प्रबंध चिंतामणि’ और जैन ग्रंथों की भूमिका: इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि अदालत ने अपने फैसले में 14वीं सदी के प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘प्रबंध चिंतामणि’ और एएसआई रिपोर्ट में प्रस्तुत तथ्यों को महत्वपूर्ण आधार माना। बावजूद इसके, अदालत ने भोजशाला को जैन परिसर मानने से इनकार कर दिया।

जैन समाज का कहना है कि यदि अदालत ने जैन ग्रंथों और जैन साक्ष्यों को स्वीकार किया, तो फिर जैन दावे को खारिज करने का आधार स्पष्ट नहीं है। इसी वजह से जैन समुदाय इस फैसले को राजनीतिक दबाव से प्रभावित बता रहा है।

ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है मूल वाग्देवी प्रतिमा

फैसले के बाद भोजशाला परिसर में हिंदू पक्ष द्वारा पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। लेकिन विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस वाग्देवी की पूजा की जा रही है, उसकी मूल प्रतिमा आज भोजशाला में मौजूद नहीं है। बताया जाता है कि 1886 में अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड इस प्रतिमा को धार से ब्रिटेन ले गए थे। वर्तमान में यह प्रतिमा लंदन स्थित British Museum में रखी हुई है। हिंदू पक्ष इसे देवी सरस्वती की प्रतिमा बताता रहा है, जबकि जैन समाज का दावा है कि यह जैन प्रतिमा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने भी अपने फैसले में माना कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी यह प्रतिमा जैन परंपरा से संबंधित है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को प्रतिमा भारत वापस लाकर भोजशाला परिसर में पुनर्स्थापित करने की संस्तुति भी की है।

जैन पक्ष का दावा: यह जैन प्रतिमा है

जैन पक्ष ने अदालत में जो सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किया, वह प्रतिमा के पादपीठ पर उत्कीर्ण संस्कृत-प्राकृत अभिलेख था। इसमें उल्लेख मिलता है कि प्राकृत व्याकरण ग्रंथ ‘प्राकृत-प्रकाश’ के रचयिता जैनाचार्य वररुचि ने धारा नगरी में सर्वप्रथम वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करवाई और बाद में जैन तीर्थंकरों तथा अम्बिका की प्रतिमाएं बनवाईं। जैन पक्ष का कहना है कि प्रतिमा की पृष्ठभूमि में जैन तीर्थंकर की आकृति उकेरी गई है, जो इसे जैन प्रतिमा सिद्ध करती है। इसके अलावा उन्होंने एएसआई सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि मेहराब के पीछे मिले शिलालेखों में ‘कर्पूरमंजरी’ नाटक अंकित है, जिसे जैन मतावलंबी राजकीय शिक्षक मदन ने लिखा था।

अदालत की टिप्पणी और जैन समाज का विरोध

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि प्रतिमा जैन परंपरा से जुड़ी है, तब भी केवल इसी आधार पर यह सिद्ध नहीं होता कि पूरा विवादित स्थल जैनों का है। अदालत ने यह भी कहा कि भारत में जैन और हिंदू धर्म पूरी तरह अलग इकाइयां नहीं हैं और जैन धर्म को हिंदू परंपरा की एक शाखा के रूप में देखा जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि दोनों परंपराओं की आस्थाएं प्राचीन काल से साथ-साथ विकसित हुई हैं, इसलिए एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों में संबंधित मूर्तियों का मिलना अस्वाभाविक नहीं है।
यहीं से विवाद और गहरा गया। जैन समाज ने अदालत की इस टिप्पणी का तीखा विरोध किया है। जैन पक्ष का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट अपने कई फैसलों में जैन धर्म को स्वतंत्र धर्म मान चुके हैं। उनका तर्क है कि जैन दर्शन मूलतः अनीश्वरवादी है, जबकि हिंदू धर्म ईश्वरवाद और अवतारवाद पर आधारित है, इसलिए दोनों को एक ही धार्मिक धारा कहना तथ्यात्मक रूप से गलत है।

जैन गुरुकुल बनाम जैन मंदिर का प्रश्न

सुनवाई के दौरान अदालत ने जैन पक्ष से पूछा कि वे भोजशाला को जैन मंदिर सिद्ध करना चाहते हैं या जैन गुरुकुल, क्योंकि दोनों अलग अवधारणाएं हैं। इस पर जैन पक्ष ने कहा कि जैन परंपरा में आवासीय गुरुकुलों के भीतर चैत्यालय या जैन मंदिर बनाए जाते रहे हैं। उन्होंने मुंबई, पुणे, इंदौर और हस्तिनापुर सहित कई शहरों के जैन छात्रावासों और शिक्षण परिसरों का उदाहरण भी दिया, जहां मंदिर और गुरुकुल एक साथ स्थित हैं।

फैसले के बाद उठा नया विवाद

फैसले के तुरंत बाद यह खबर भी सामने आई कि निर्णय देने वाले जस्टिस विजय कुमार शुक्ला के पुत्र सुजय शुक्ला को मध्य प्रदेश सरकार का अधिवक्ता नियुक्त किया गया है। हालांकि इस नियुक्ति और फैसले के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध का कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है, लेकिन जैन पक्ष इसे संदेह की दृष्टि से देख रहा है।

रामजन्मभूमि फैसले से तुलना

जैन पक्ष के कुछ प्रतिनिधियों ने भोजशाला फैसले की तुलना अयोध्या रामजन्मभूमि मामले से भी की है। उनका कहना है कि अदालत ने ऐतिहासिक और धार्मिक जटिलताओं के बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की आस्था को प्राथमिकता दी। जैन याचिकाकर्ता सुलेख चंद्र जैन ने कहा है कि देशभर में ऐसे दो हजार से अधिक जैन मंदिरों की सूची उनके पास है, जिन पर कथित रूप से हिंदू समुदाय का कब्जा है। उन्होंने कहा कि भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी और जैन धार्मिक स्थलों की पुनर्प्राप्ति के लिए कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।
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भोजशाला विवाद अब केवल हिंदू-मुस्लिम विवाद नहीं रह गया है। यह मामला भारतीय इतिहास, धार्मिक पहचान, पुरातत्व, सांस्कृतिक विरासत और न्यायिक व्याख्याओं के जटिल सवालों को सामने ला रहा है। एक ओर हिंदू संगठनों के लिए यह “ऐतिहासिक न्याय” का क्षण है, तो दूसरी ओर जैन समाज इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान की अनदेखी मान रहा है। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह विवाद एक बार फिर नए कानूनी और संवैधानिक प्रश्नों के साथ पहुंच सकता है।