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मोदी सरकार के 100 दिन : बीएसई को 14 लाख करोड़ का नुक़सान

नरेंद्र मोदी सरकार 2.0 के अब तक 100 दिन में पूंजी बाज़ार में शेयरधारकों को तक़रीबन 14 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हो चुका है। शेयर बाज़ार को पूरी अर्थव्यवस्था का इंडीकेटर माना जाता है और यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि यह नुक़सान बदतर होती जा रही अर्थव्यवस्था का पुख़्ता संकेत दे रहा है। 

96 प्रतिशत कंपनियों को नुक़सान

मंदी की स्थिति को इससे समझा जा सकता है कि मोदी सरकार ने 30 मई को शपथ ग्रहण किया। बंबई स्टॉक एक्सेंज यानी बीएसई पर उसके बाद से अब तक सिर्फ़ 4 प्रतिशत शेयरों को कुल मिला कर मुनाफ़ा हुआ है। 
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बीएसई में जिन 2,664 कंपनियों के  शेयरों की ख़रीद-बिक्री नियमित तौर पर होती है, उनमें से 2,290 कंपनियों के शेयरों की कीमतें गिरी है, यानी उन्हें नुक़सान हुआ है। यानी कुल लिस्टेड कंपनियों में से 96 प्रतिशत कंपनियों के शेयरों को नुक़सान हुआ है। इसमें से 422 कंपनियों के शेयरों की कीमतें औसतन 40 प्रतिशत तक गिरी हैं। 
इन 100 दिनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफ़आईआई ने 31,700 करोड़ रुपए की पूंजी शेयर बाज़ार से निकाल ली है। इसे इस विरोधाभास से समझा जा सकता है कि इन्हीं विदेशी संस्थानों ने फ़रवरी-मार्च के दौरान 83,000 करोड़ रुपये का निवेश किया था।

सेंसेक्स 7 प्रतिशत टूटा

उस समय उन्हें यह उम्मीद थी कि मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को सुधारने की दिशा में काम करेगी। इन 100 दिनों में बीएसई का संवेदनशील सूचकांक यानी सेंसेक्स 7-8  प्रतिशत गिरा। सरकारी बैंकों का हाल सबसे बुरा हुआ। घबराए हुए निवेशकों ने अब सूचना प्रौद्योगिकी और दवा कंपनियों की कंपनियों का रुख किया है। 
देश की अर्थव्यवस्था का हाल यह है कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि की दर बीते तिमाही में 5 प्रतिशत दर्ज की गई। 

आर्थिक सुधार से भी नहीं सुधरी स्थिति

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उद्योग जगत को सहारा देने के लिए कई तरह के आर्थिक सुधारों का एलान किया, उन्होंने बैंकों का कन्सोलिडेशन किया और 10 बैंकों का विलय कर 4 बैंक बना दिए। इन दो क़दम कों को साफ़ी सकारात्मक माना गया था और उसके ठीक बाद के कारोबार में पूंजी बाज़ार ने यही संकेत भी दिया था। पर इसके बावजूद कुल मिला कर स्थिति में कोई ख़ास सुधार नहीं देखा गया है। 
रिज़र्व बैंक के बाद अब सरकार ने भी यह मान लिया है कि अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ चुकी है। पर सरकार का तर्क यह है कि यह मंदी 'साइक्लिकल' यानी चक्रीय है, यानी इस तरह की मंदी बीच-बीच में आती रहती है और यह समय के साथ अपने आप ठीक भी हो जाएगी।
लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह मंदी अपने आप ठीक होने वाली नहीं है, यह तुरन्त भी ठीक नहीं होगी, इसमें समय लगेगा और यदि सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो यह लंबे समय तक रहेगी। 
वित्त मंत्री ने सरकारी बैंकों में 70,000 करोड़ रुपए के पूंजी निवेश का फ़ैसला किया, नेशनल हाउसिंग बैंक से कहा है कि वह 20,000 करोड़ रुपये हाउसिंग फ़ाइनेंस कंपनियों को दें। इसके अलावा उसने जीएसटी सुधार किए हैं। रिज़र्व बैंक ने उस ब्याज दर में कटौती की, जिस पर वह बैंकों को कर्ज़ देता है। यह इसलिए किया गया ताकि बैंकों को सस्ते में पैसे मिले, साथ ही केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा कि इस दर को सीधे बैंक कर्ज की दरों से जोड़ दिया जाए। 
इन तमाम उपायों के बावजूद उद्योग धंधे में कोई प्रगति नहीं है, उत्पादन, माँग, खपत, सबकुछ कम हो रहा है, सरकार को मिलने वाले कर राजस्व में कमी हो रही है, आम लोगों की आय कम हो रही है, उनकी क्रय शक्ति कम हो रही है। बेरोज़गारी बढ़ रही है। शेयर बाज़ार ने इन तमाम बातों पर एक तरह से मुहर लगा दी है। 
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