कलकत्ता हाईकोर्ट का कहना है कि बिना नागरिकता तय हुए किसी को पासपोर्ट नहीं दिया जा सकता। वोटर लिस्ट में नाम हटने के बाद एक व्यक्ति को पासपोर्ट जारी करने का निर्देश देने से हाईकोर्ट ने साफ इनकार कर दिया है।
कलकत्ता हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी बेंच ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को नागरिकता की पुष्टि के बिना पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटा दिए जाने के बाद एक व्यक्ति को तत्काल पासपोर्ट जारी करने का निर्देश देने से साफ इनकार कर दिया।
यह मामला कूचबिहार जिले के तुफानगंज विधानसभा क्षेत्र के निवासी सिराजुल शेख का है। सिराजुल ने हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर मांग की थी कि पासपोर्ट अधिकारियों को उनका 'होल्ड' पर रखा गया पासपोर्ट आवेदन आगे बढ़ाने का निर्देश दिया जाए। हालांकि अभी हाल ही में कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार आर राजगोपाल का पासपोर्ट का रिन्यूअल इन्हीं वजहों से रोक दिया गया था। लेकिन मामला मीडिया में उछलने, केरल के सीएम वीडी सतीशन के हस्तक्षेप पर कोलकाता पुलिस ने उनका वेरिफिकेशन कर दिया और उनके पासपोर्ट रिन्यूअल का रास्ता साफ हो गया। लेकिन पत्रकार राजगोपाल जैसा प्रिविलेज हर भारतीय को हासिल नहीं है। राजगोपाल की कहानी नीचे विस्तार से है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह पेट से जुड़ी गंभीर बीमारी (गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल बीमारी) से पीड़ित है और इलाज के लिए विदेश जाना चाहता है। हालांकि, जब उसने तत्काल (Tatkal) पासपोर्ट के लिए आवेदन किया, तो सत्यापन के दौरान पासपोर्ट कार्यालय ने उससे उसका मूल वोटर आईडी कार्ड (EPIC) मांगा। सिराजुल का नाम विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान पूरक विलोपन सूची (Supplementary Deletion List) के जरिए मतदाता सूची से हटा दिया गया था, जिसके कारण उसका वोटर आईडी नंबर अवैध हो गया और वह मूल कार्ड पेश नहीं कर सका। इसी वजह से उसका पासपोर्ट आवेदन रोक दिया गया था।
याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें
अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अविषिक्ता दास और बिप्रोज्योति भौमिक ने दलील दी कि:
- पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और पासपोर्ट नियम, 1980 के तहत मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) कोई अनिवार्य दस्तावेज नहीं है, बशर्ते व्यक्ति की पहचान, पता और जन्मतिथि अन्य दस्तावेजों से साबित होती हो।
- वकील ने यह भी तर्क दिया कि वोटर आईडी कार्ड वैसे भी नागरिकता का अंतिम दस्तावेज नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक मामले (ADR बनाम ECI) में कहा है कि SIR के तहत नाम हटाया जाना किसी की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं है। इसलिए, पासपोर्ट अधिकारियों को इस आधार पर आवेदन नहीं रोकना चाहिए।
हाई कोर्ट का फैसला और सख्त टिप्पणी
जस्टिस कौशिक चंदा की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता को कोई भी अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ तौर पर कहा:
"जब तक आपको भारत का नागरिक घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक आपको पासपोर्ट नहीं दिया जा सकता। नागरिकता का सवाल पहले हल होना चाहिए।" अदालत ने नोट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ सिराजुल शेख की वैधानिक अपील पहले से ही 'SIR अपीलीय न्यायाधिकरण' (SIR Appellate Tribunal) के समक्ष लंबित है।ट्रिब्यूनल की रफ्तार पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान जब यह बात सामने आई कि अपीलीय न्यायाधिकरण के पास ऐसे मामलों का भारी बोझ है और याचिकाकर्ता की अपील अभी तक सूचीबद्ध (Unlisted) भी नहीं हुई है, तो हाई कोर्ट ने इसकी धीमी रफ्तार पर गहरी चिंता व्यक्त की। जस्टिस चंदा ने टिप्पणी की:
"वर्तमान गति से, SIR न्यायाधिकरण को सभी लंबित अपीलों को निपटाने में 21 साल लग जाएंगे, हमने इसकी गणना की है। इस स्थिति में हम (तुरंत) कुछ नहीं कर सकते, लेकिन संबंधित अपीलीय न्यायाधिकरण को निर्देश दिया जाता है कि वह आवेदक की लंबित अपील पर जल्द से जल्द सुनवाई करे और उसे निपटाए।"अदालत ने मामले को पूरी तरह खारिज न करते हुए न्यायाधिकरण को मामले को तेजी से निपटाने का आदेश दिया है ताकि याचिकाकर्ता की नागरिकता की स्थिति स्पष्ट हो सके और उसके बाद ही उसके पासपोर्ट पर कोई निर्णय लिया जा सके। तब तक के लिए उसे कोई भी तत्काल राहत नहीं दी गई है।
क्या है वरिष्ठ पत्रकार राजगोपाल का मामला
देश भर में एसआईआर के दौरान करोड़ों लोगों का वोटर लिस्ट से नाम काटना किस तरह नागरिक पहचान का संकट खड़ा कर रहा है उसे द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल की व्यथा से समझा जा सकता है। आर. राजगोपाल ने दावा किया है कि मतदाता सूची से उनका नाम हटाए जाने के बाद वे न केवल मतदान के अधिकार से वंचित हो गए, बल्कि उनका पासपोर्ट रिन्यूअल भी अटक गया। उन्होंने अपनी पूरी आपबीती सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कहा है कि उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन लाखों भारतीयों की है जो अपनी नागरिक पहचान साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राजगोपाल ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि मार्च 2026 में कोलकाता के बालीगंज विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया। उनके अनुसार, SIR के दौरान अधिकारियों को न तो उनका और न ही उनके दिवंगत पिता का नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में मिला। इसी आधार पर उनका नाम सूची से हटा दिया गया।
राजगोपाल का कहना है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 27 लाख लोगों के नाम तथाकथित 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए। उन्होंने मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र समेत अन्य दस्तावेज जमा किए, लेकिन उन्हें कोई साफ़ कारण नहीं बताया गया। उन्होंने बताया कि उनका मामला अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित एक ट्रिब्यूनल के सामने लंबित है। इसी वजह से वे हाल में हुए चुनाव में मतदान भी नहीं कर सके। राजगोपाल ने बताया कि उन्होंने 19 मार्च 2026 को पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन पुलिस सत्यापन नहीं हो सका क्योंकि उनका नाम मतदाता सूची में नहीं था।
दबाव पड़ा तो पासपोर्ट रिन्यू हुआ
उनके पासपोर्ट को अब रिन्यू कर दिया गया है। एक अधिकारी का कहना है कि पुलिस की दूसरी वेरिफिकेशन रिपोर्ट भेजने के बाद उनका नाम क्लियर हो गया। लेकिन ऐसा तब हुआ जब इसके लिए काफ़ी दबाव पड़ा। इस पर मीडिया में रिपोर्टें छपीं, केरल के मुख्यमंत्री ने पश्चिम बंगाल के सीएम को ख़त लिखा और इस मुद्दे पर सरकार की काफ़ी किरकिरी हुई। हालाँकि राजगोपाल का पोसपोर्ट तो रिन्यू हो गया, लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार तमाम ऐसे लोगों के पासपोर्ट रिन्यू नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि उनके नाम एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से कट गए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल मतदाता सूची में नाम न होने के आधार पर किसी नागरिक के पासपोर्ट सत्यापन को प्रभावित किया जा सकता है। हालांकि, आर. राजगोपाल के मामले में दोबारा सत्यापन के बाद पासपोर्ट जारी कर दिया गया है, लेकिन उन लोगों का क्या होगा जो पत्रकार राजगोपाल जैसे रसूखदार नहीं हैं। जिन्हें कोई मुख्यमंत्री या सांसद नहीं पहचानता है। या जिन लोगों की खबरें मीडिया नहीं रिपोर्ट करता, ऐसे लोगों के पासपोर्ट का क्या होगा।