लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने एक नोटिस पेश कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हटाने की मांग की है। उन पर पक्षपातपूर्ण आचरण, चुनावी धोखाधड़ी, एसआईआर के जरिए बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने के आरोप लगाए गए हैं।
संसद में शुक्रवार को भी हंगामा जारी रहा। सत्तापक्ष और विपक्ष की नारेबाजी के बीच सदन बार-बार स्थगित किया गया। लोकसभा और राज्यसभा के विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार गुप्ता को उनके पद से हटाने के लिए नोटिस दिया है। यह पहली बार है जब किसी वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हटाने का ऐसा नोटिस संसद में दिया गया है।
लोकसभा में 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों ने कुल 193 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ यह नोटिस दिया है। ये सांसद INDIA ब्लॉक की सभी पार्टियों से हैं, साथ ही अब गठबंधन में शामिल न होने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) के कुछ सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए हैं। नोटिस शुक्रवार को दोनों सदनों में जमा किया गया।
नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सात आरोप लगाए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, चुनावी धांधली की जांच में जानबूझकर बाधा डालना, बड़े पैमाने पर मतदाताओं को वंचित करना (मास डिसेनफ्रैंचाइजमेंट)। विपक्ष का आरोप है कि CEC ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) की मदद की है, खासकर विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) के माध्यम से, जिसे वे केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को फायदा पहुंचाने वाला बताते हैं।
यह नोटिस भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है - समान आधारों और समान तरीके से। हालांकि सरकारी नियमों के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद पर नियुक्ति के बाद सेवा शर्तों में उन्हें बदला नहीं ज सकता।
प्रक्रिया के अनुसार, यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिए जाते हैं, तो Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत कोई समिति तब तक नहीं बनाई जाएगी जब तक दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार न हो जाए। स्वीकृति के बाद लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन द्वारा संयुक्त रूप से जांच समिति गठित की जाएगी। प्रस्ताव को पास होने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
विपक्षी नेताओं ने बताया कि सांसदों में इस नोटिस पर हस्ताक्षर करने के लिए जबरदस्त उत्साह था। कई सांसदों ने गुरुवार को भी हस्ताक्षर किए, भले ही आवश्यक संख्या पहले ही पूरी हो चुकी थी। यह कदम हाल के SIR विवाद के बाद उठाया गया है, जिसमें विपक्ष चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगा रहा है।
सरकार, चुनाव आयोग या BJP की ओर से अभी तक इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। संसद का बजट सत्र जारी है, और यह घटनाक्रम राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है।
LPG संकट पर संसद कैंपस में विपक्ष का प्रदर्शन
शुक्रवार को संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने भारत के कई हिस्सों में एलपीजी सिलेंडर की कमी की खबरों के विरोध में प्रदर्शन किया। कई विपक्षी दलों के नेताओं ने सरकार पर बढ़ते ईंधन संकट को दूर करने में विफल रहने का आरोप लगाया और देश भर में खाना पकाने की गैस की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कार्रवाई की मांग की।
संसद की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने एलपीजी की उपलब्धता और हाल ही में हुई मूल्य वृद्धि को लेकर चिंताएं उठाने का प्रयास किया। उनके विरोध प्रदर्शन से सत्र शुरू होते ही कार्यवाही बाधित हो गई। सत्ता पक्ष एलपीजी मुद्दा उठाने से विपक्ष को रोक रहा है।संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर जनता की नब्ज़ न समझने का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर प्रमुख विपक्षी दल इसी तरह का व्यवहार करते रहे तो जनता उन्हें करारा दंड देगी। रिजिजू ने कहा, “उनके नेता में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। अब सांसद भी उन्हीं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उनके नेता संसद परिसर में थाली-चादर लेकर हंगामा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह के नाटक से वे जनता का ध्यान आकर्षित कर लेंगे, लेकिन जनता उन्हें अच्छी तरह जानती है, इसीलिए वे सत्ता में नहीं आ पाए हैं।”
अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से प्रश्नकाल में बाधा न डालने का आग्रह करते हुए कहा कि यह सांसदों के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों और राष्ट्रीय महत्व के मामलों को उठाने का महत्वपूर्ण समय है। उन्होंने सदन को याद दिलाया कि संसद की गरिमा और पवित्रता बनाए रखना सदन के अंदर और बाहर, प्रत्येक सदस्य का दायित्व है। बिरला ने विरोध कर रहे सदस्यों की भी कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उनका व्यवहार सदन में अपेक्षित मर्यादा के अनुरूप नहीं था। उन्होंने बताया कि जहां विपक्षी सदस्य अक्सर मुद्दों को उठाने के पर्याप्त अवसर न मिलने की शिकायत करते हैं, वहीं प्रश्नकाल के दौरान व्यवधान संसद के प्रभावी कामकाज में बाधा डालते हैं।