प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण पर आचार संहिता उल्लंघन का आरोप लगाते हुए कांग्रेस नेता सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। क्या चुनाव आयोग पर कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा?
पीएम मोदी के देश के नाम संबोधन पर चुनावी आचार संहिता उल्लंघन की कार्रवाई के लिए कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। इसके लिए अदालत में एक नई याचिका दाखिल की गई है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 18 अप्रैल को राष्ट्र के नाम दिए गए टीवी भाषण को मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट यानी MCC का उल्लंघन बताते हुए चुनाव आयोग से सख्त कार्रवाई की मांग की गई है। याचिका कांग्रेस के सांसद और केरल के थ्रिसूर से पूर्व सांसद टी.एन. प्रथापन ने दाखिल की है। वे इस समय केरल विधानसभा चुनाव में मनलूर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार भी हैं।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए?
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार याचिका में कहा गया है कि 18 अप्रैल को शाम 8:30 बजे प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन और संसद टीवी पर राष्ट्र के नाम संबोधन दिया। यह भाषण उन राज्यों में चुनाव चल रहे होने के बावजूद दिया गया, जहां 15 मार्च से मॉडल कोड लागू है। इन राज्यों में असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी शामिल हैं।भाषण में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और समाजवादी पार्टी का नाम लेकर उनकी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ये पार्टियां ‘नारी शक्ति वंदन’ संशोधन के खिलाफ हैं और मतदाताओं से इन पार्टियों को चुनाव में जवाब देने की अपील की। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह भाषण खुल्लमखुल्ला पक्षपाती था। सरकारी चैनलों का इस्तेमाल करके सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की गई। इससे विपक्षी उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचा और चुनाव में बराबरी का मौका नहीं मिला।
कौन-कौन से कानून टूटे?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस भाषण से दो बड़े उल्लंघन हुए:
- मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट की धारा VII(4) – चुनाव के दौरान सरकारी संसाधनों और सरकारी मीडिया का इस्तेमाल पक्षपाती प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 123(7) – सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल चुनावी फायदे के लिए करना भ्रष्ट आचरण माना जाता है।
याचिकाकर्ता की मांगें
टी.एन. प्रथापन ने सुप्रीम कोर्ट से ये मांगें की हैं-
- चुनाव आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी को शो-कॉज नोटिस जारी करे।
- भाषण को सरकारी प्लेटफॉर्म से हटाया जाए।
- चुनाव आयोग धारा 123(7) के उल्लंघन की जांच करे और कोर्ट द्वारा तय समय में रिपोर्ट दे।
- प्रधानमंत्री पर आगे प्रचार पर अस्थायी रोक लगाई जाए।
याचिका में कहा गया है कि 19 अप्रैल को उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया और कोई कार्रवाई नहीं की।
याचिकाकर्ता का तर्क
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार प्रथापन ने कहा कि वे खुद केरल चुनाव में उम्मीदवार हैं और प्रधानमंत्री के भाषण में उनकी पार्टी का नाम लेकर आलोचना की गई। इससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार और अनुच्छेद 19(1)(ए) यानी अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ निष्पक्ष चुनाव लड़ने का अधिकार प्रभावित हुआ है।
याचिका में लिखा है, 'चुनाव समयबद्ध प्रक्रिया है। सरकारी मीडिया के दुरुपयोग से जो नुकसान होता है, उसे चुनाव के बाद ठीक नहीं किया जा सकता। मतदाताओं ने पहले ही यह पक्षपाती भाषण देख लिया है। चुनाव आयोग की हर दिन की निष्क्रियता से नुकसान और बढ़ता जा रहा है।'
सुप्रीम कोर्ट में अब क्या होगा?
यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सुविदुत्त एम.एस. के जरिए दाखिल की गई है। कोर्ट अब इस याचिका पर सुनवाई का फैसला करेगा। यह मामला चुनाव आयोग की निष्पक्षता और प्रधानमंत्री के भाषण की सीमा को लेकर नया विवाद खड़ा कर रहा है। अभी तक चुनाव आयोग ने इस याचिका पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल समेत कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में यह याचिका चुनावी माहौल को और गर्म कर सकती है।