सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आरक्षण के लिए 'क्रीमी लेयर' का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के पद की स्थिति और सेवा श्रेणी को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। केंद्र सरकार ने सिविल सेवा परीक्षा में कुछ ओबीसी उम्मीदवारों को राहत देने वाले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) और हाई कोर्ट के फैसलों को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन (ओएम) और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि क्रीमी लेयर को बाहर करने की व्यवस्था मुख्य रूप से पद की स्थिति (स्टेटस-बेस्ड) पर आधारित है, न कि केवल आय पर। 1993 के ओएम में सरकारी पदों की उच्च श्रेणियों (क्लास I/ग्रुप A और कुछ क्लास II/ग्रुप B) के बच्चों को क्रीमी लेयर में रखा गया है, क्योंकि सेवा में प्रोग्रेस सामाजिक प्रगति का संकेत मानी जाती है। आय/संपत्ति परीक्षण केवल उन मामलों में पूरक के रूप में लागू होता है जहां पदों की समकक्षता तय नहीं हुई हो।
पीठ ने कहा, "1993 के ओएम और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की व्याख्या से स्पष्ट है कि वेतन से होने वाली आय अकेले क्रीमी लेयर तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। उम्मीदवार के माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी आवश्यक है। केवल आय के आधार पर क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर का फैसला नहीं किया जा सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा कि स्पष्टीकरण पत्र मूल नीति में कोई नई शर्त नहीं जोड़ सकता। यदि यह मूल नीति से आगे बढ़कर अधिकारों या दायित्वों में बदलाव लाए तो यह स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि संशोधन माना जाएगा। कोर्ट ने चेतावनी दी कि 2004 के पत्र पर अत्यधिक जोर देकर केवल आय को आधार बनाना 1993 की मूल योजना को विफल कर देगा।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) या निजी क्षेत्र में उच्च वेतन वाले माता-पिता के बच्चों को केवल आय के आधार पर आरक्षण से बाहर करना, जबकि समान स्थिति वाले सरकारी कर्मचारियों के बच्चों पर अलग नियम लागू करना, असंवैधानिक भेदभाव होगा। इससे "समान व्यक्तियों के साथ असमान व्यवहार" होगा।
फैसले में केंद्र सरकार की अपीलें खारिज करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रभावित उम्मीदवारों के दावों की इस फैसले के सिद्धांतों के अनुसार छह महीने के भीतर पुनर्विचार किया जाए। योग्य पाए जाने वाले उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए सुपरन्यूमरेरी पद भी बनाए जा सकते हैं।
यह फैसला ओबीसी आरक्षण के लाभार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर उन उम्मीदवारों के लिए जिनके माता-पिता पीएसयू या निजी क्षेत्र में उच्च वेतन वाली नौकरियों में हैं, लेकिन पद की स्थिति उच्च श्रेणी की नहीं है। वर्तमान में क्रीमी लेयर की आय सीमा 8 लाख रुपये वार्षिक है, लेकिन अब केवल इस पर निर्भर नहीं रहेगी।