भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते ने देश में हलचल मचा दी है। खासकर भारत के कृषि क्षेत्र को अमेरिकी बाज़ार के लिए खोलकर। कम से कम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी कृषि सचिव ने तो भारत के कृषि क्षेत्र को खोलने को लेकर यही दावा किया है। तो क्या मोदी सरकार ने ट्रंप के दबाव में झुककर भारतीय किसानों के हितों को ख़तरे में डाल दिया है? क्या अमेरिकी फार्म प्रोडक्ट्स के लिए भारत के बाजार के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए गए हैं? केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने तो दावा किया कि इस समझौते में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की पूरी सुरक्षा की गई है, लेकिन उन्होंने विस्तृत जानकारी नहीं दी कि ऐसा किस तरह से किया गया।

भारत के कृषि क्षेत्र के खुलने के क्या ख़तरे हैं और इसका क्या असर हो सकता है, यह समझने से पहले ट्रंप की घोषणा को जान लें। ट्रंप ने सोमवार को घोषणा की कि भारत पर लगे 25 प्रतिशत के ऊंचे टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। रूसी तेल खरीदने पर लगने वाला टैरिफ़ भी ख़त्म होगा क्योंकि ट्रंप ने कहा है कि बदले में भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने और अमेरिका से ज्यादा सामान खरीदने का वादा किया है।

समझौते किन हालात में हुए?

पिछले साल अगस्त से ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ लगा दिया था, क्योंकि भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा था। इससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत हो गया और भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हुआ। कपड़ा, जूते और अन्य सेक्टरों में निर्यात गिर गया। ट्रंप ने इसे व्यापार युद्ध की तरह इस्तेमाल किया और भारत को मजबूर किया कि वह अमेरिका से ज़्यादा आयात करे। और इस दौरान आयात बढ़ा भी।

अब इस समझौते में ट्रंप ने दावा किया है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर यानी क़रीब 45.65 लाख करोड़ रुपये के सामान खरीदेगा, जिसमें ऊर्जा, तकनीक, कोयला और कृषि उत्पाद शामिल हैं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह समझौता किसानों, छोटे उद्यमियों और कुशल कामगारों के लिए नए अवसर खोलेगा।' हालाँकि सौदे के बारे में ज़्यादा जानकारी बाहर साझा नहीं की गई है।

अमेरिकी कृषि सचिव का दावा क्या?

अमेरिकी कृषि सचिव ब्रूक रॉलिन्स ने कहा कि यह डील अमेरिकी फार्म प्रोडक्ट्स को भारत के बड़े बाजार में ज्यादा निर्यात करने देगी, जिससे अमेरिकी किसानों की कमाई बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि अमेरिका का भारत के साथ कृषि व्यापार घाटा 1.3 अरब डॉलर है और भारत की बढ़ती आबादी अमेरिकी उत्पादों के लिए बड़ा बाजार है।
भारत का कृषि क्षेत्र राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि भारत की आधी आबादी कृषि पर निर्भर है। कहा जा रहा है कि यह समझौता सोयाबीन, डेयरी उत्पाद, फल-सब्जियां और मीट जैसे अमेरिकी कृषि निर्यात को बढ़ावा दे सकता है। अमेरिका लंबे समय से शिकायत करता रहा है कि भारत के ऊंचे टैरिफ और क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर उसके उत्पादों को रोकते हैं। अब अगर भारत इन बैरियर्स को हटाता है तो अमेरिकी उत्पाद सस्ते होकर भारतीय बाजार में घुस सकते हैं।

इस पर कुछ लोग कह सकते हैं कि बादाम, सेब या डेयरी जैसे अमेरिकी उत्पाद उपभोक्ताओं के लिए सस्ते मिल सकते हैं। और नई तकनीक या बीज अमेरिका से आ सकते हैं। लेकिन नुकसान काफ़ी ज्यादा लगते हैं।

भारतीय किसानों पर खतरा

अगर अमेरिकी डेयरी या सोयाबीन सस्ते आएंगे तो स्थानीय किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। डेयरी सेक्टर में पहले से विरोध है, क्योंकि अमेरिका के बड़े फार्म भारतीय छोटे किसानों से ज्यादा उत्पादक हैं।

नौकरियां और आय प्रभावित

कृषि पर निर्भर 50 करोड़ लोगों की आजीविका ख़तरे में पड़ सकती है। कांग्रेस पार्टी ने इसे भारतीय किसानों की सुरक्षा पर सवाल बताया और कहा कि सरकार ने अमेरिका के लिए बाजार पूरी तरह खोल दिया है, जो उद्योग, व्यापारियों और किसानों को नुकसान पहुंचाएगा।

रूसी तेल बंद करने से तेल महंगा हो सकता है, जो ट्रांसपोर्ट और खेती की लागत बढ़ाएगा। किसान पहले से ही महंगे डीजल और उर्वरक से परेशान हैं।

विपक्ष का हमला

विपक्षी नेता राहुल गांधी ने संसद में कहा कि यह समझौता ट्रंप की जीत और मोदी की हार है। कांग्रेस ने कहा है कि कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोलने की बात है, आखिर क्या सौदा हुआ है? हमारे किसानों के हितों का ध्यान रखा गया है या उनका साथ भी छोड़ दिया गया है? हमारे किसानों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी?

जयराम रमेश ने कहा कि भारत को अब अपने अहम राष्ट्रीय निर्णयों की जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप या उनके अधिकारियों से मिलती है। अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि एक छोटा सा संवैधानिक सवाल बाकी है- भारत ने अपनी व्यापार घोषणाओं को कब से बाहर सौंप दिया?

संसद में जवाब दे सरकार: योगेंद्र यादव

राजनीतिक विश्लेषक और किसानों को मुद्दों पर अग्रसर रहने वाले योगेंद्र यादव ने भी यही सवाल पूछा है कि क्या मोदी सरकार ने ट्रंप के आगे घुटने टेक कर कृषि क्षेत्र में अमेरिकी निर्यात के लिए दरवाजे खोल दिए हैं? उन्होंने कहा है कि संसद को जवाब देना चाहिए।

भारत ने सबसे अच्छा व्यापार समझौता किया: गोयल

इधर, वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने मंगलवार को भरोसा दिलाया कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कृषि और डेयरी जैसे भारत के संवेदनशील सेक्टर्स के हितों की पूरी तरह से रक्षा की गई है, जो नई दिल्ली के प्रतिद्वंद्वियों को वॉशिंगटन से मिले डील से कहीं बेहतर है। मंगलवार शाम को मीडिया से बात करते हुए गोयल ने कहा कि यह डील दोनों देशों की बातचीत करने वाली टीमों के बीच डिटेलिंग के आखिरी स्टेज में है, और इसकी टेक्निकल डिटेल्स जल्द ही जारी होने वाले भारत-अमेरिका के जॉइंट स्टेटमेंट के ज़रिए उपलब्ध कराई जाएंगी।

पीयूष गोयल ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अच्छे रिश्तों की वजह से यह डील हुई। उन्होंने दावा किया कि यह हमारे किसानों, छोटे-मध्यम उद्योगों, महिलाओं और पूरे देश के लिए फायदेमंद होगा। मंत्री ने जोर देकर कहा कि इस समझौते में कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की पूरी सुरक्षा की गई है।

ट्रंप की रणनीति 'अमेरिका फर्स्ट' की जीत?

ट्रंप की नीति हमेशा से 'अमेरिका फर्स्ट' की रही है। उन्होंने भारत को दबाव डालकर रूस से दूरी बनवाई और अपना बाजार बढ़ाया। समझौते में भारत ने अमेरिका और शायद वेनेजुएला से भी तेल और अन्य सामान खरीदने का वादा किया। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 500 अरब डॉलर का आंकड़ा अविश्वसनीय है - यह भारत की पूरी जीडीपी का अधिकतर हिस्सा है।

मोदी सरकार की स्थिति: मजबूत या मजबूर?

सरकार का दावा है कि यह समझौता इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्सटाइल जैसे भारतीय निर्यात को बढ़ावा देगा। आलोचकों का कहना है कि ट्रंप के दबाव में सरकार ने जल्दबाजी की, बिना किसानों से सलाह लिए। पहले से किसान आंदोलन चल रहे हैं, और यह नया विवाद उन्हें और भड़का सकता है।

तो क्या यह अमेरिका के सामने घुटने टेकना है? आरोप तो हैं कि सरकार ने ट्रंप के आगे कुछ हद तक झुककर समझौता किया। कृषि क्षेत्र में अमेरिकी निर्यात के लिए दरवाजे खोलने से भारतीय किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कहा जा रहा है कि भारत के लिए यह मजबूरी में लिया गया फ़ैसला लगता है। हालाँकि, मोदी सरकार की ओर से अब तक कृषि क्षेत्र में डील को लेकर विस्तार से नहीं बताया गया है। इसकी पूरी जानकारी आने पर ही नुक़सान या फायदे का आकलन पूरा किया जा सकता है।