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जस्टिस क़ुरैशी: क्या एक बार फिर होगा न्यायपालिका-केंद्र में टकराव?

क्या कॉलेजियम की सिफ़ारिश के मुद्दे पर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार में टकराव हो सकता है। लगता तो यही है क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस अकील क़ुरैशी को मध्य प्रदेश का चीफ़ जस्टिस बनाने की कॉलेजियम की सिफ़ारिश को केंद्र सरकार ने लौटा दिया है। सूत्रों के हवाले से इस बात का दावा किया गया है कि केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से कहा गया है कि वह क़ुरैशी को जस्टिस बनाने की सिफ़ारिश पर फिर से विचार करे। यह तीसरी बार है जब सरकार ने कॉलेजियम की सिफ़ारिश को लौटाया है। इससे पहले जस्टिस केएम जोसफ़ और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यन के मामले में ऐसा हो चुका है। 
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कॉलेजियम ने 10 मई को जस्टिस क़ुरैशी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ़ जस्टिस बनाने की सिफ़ारिश की थी। कॉलेजियम ने अपनी सिफ़ारिश में कहा था कि जस्टिस क़ुरैशी गुजरात हाई कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायमूर्ति हैं और कॉलेजियम की राय है कि जस्टिस क़ुरैशी मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के रूप में नियुक्त किये जाने के लिए पूरी तरह योग्य हैं। सूत्रों के मुताबिक़, सरकार की ओर से इस बारे में मंगलवार को सिफ़ारिश पर फिर से विचार करने का जवाब आया है।
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चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले में बुधवार सुनवाई की थी। गुजरात हाई कोर्ट एडवोकेटस एसोसिएशन ने एक याचिका दायर कर केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि सरकार जान-बूझकर जस्टिस क़ुरैशी की नियुक्ति में देरी कर रही है।
जानकारी के मुताबिक़, जस्टिस क़ुरैशी के लिए गए कुछ फ़ैसलों से केंद्र सरकार नाराज है, इसलिए वह उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का चीफ़ जस्टिस बनाने की इच्छुक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि सरकार की ओर से आए जवाब पर कॉलेजियम में चर्चा की जाएगी और तब इस बारे में फ़ैसला लिया जाएगा। नियमों के मुताबिक़, अगर कॉलेजियम दो बार किसी एक नाम की सिफ़ारिश करता है तो केंद्र सरकार के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। सरकार ने यह कहते हुए जस्टिस क़ुरैशी को लेकर की गई सिफ़ारिश पर सवाल उठाये हैं कि दूसरे राज्यों का शीर्ष अदालत में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
जस्टिस क़ुरैशी के नाम की सिफ़ारिश को लौटाये जाने की ख़बरों के बाद वकीलों में 2016 में उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस जोसेफ़ के मामले की चर्चा है।
जस्टिस जोसेफ़ के फ़ैसले के बाद उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन रद्द हो गया था और माना जा रहा था कि बीजेपी का राज्य में हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को गिराने का सपना अधूरा रह गया था। तब विधि मामलों से जुड़ी संस्थाओं और विपक्ष ने आरोप लगाया था कि सरकार ने न्यायपालिका की गरिमा को कम करने की और जस्टिस जोसफ़ के उत्पीड़न की कोशिश की। लेकिन जस्टिस अकील क़ुरैशी के मामले में ऐसे आरोपों को केंद्रीय क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने नकार दिया है।
बता दें कि जस्टिस जोसफ़ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफ़ारिश को लेकर भी केंद्र और न्यायपालिका का टकराव हुआ था। क्योंकि जस्टिस जोसेफ़ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफ़ारिश पर भी केंद्र ने दोबारा विचार करने के लिए कहा था। हालाँकि बाद में केंद्र सरकार ने सिफ़ारिश को स्वीकार कर लिया था। 
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क्या है कॉलेजियम?

कॉलेजियम शीर्ष न्यायपालिका में जजों को नियुक्त करने और प्रमोशन करने की सिफ़ारिश करने वाली सुप्रीम कोर्ट के पाँच वरिष्ठ जजों की एक समिति है। यह समिति जजों की नियुक्तियों और उनके प्रमोशन की सिफ़ारिशों को केंद्र सरकार को भेजती है और सरकार इसे राष्ट्रपति को भेजती है। राष्ट्रपति के कार्यालय से अनुमति मिलने का नोटिफ़िकेशन जारी होने के बाद ही जजों की नियुक्ति होती है। 

सरकारें आम तौर पर कॉलेजियम के फ़ैसलों को मानती रही हैं लेकिन मोदी सरकार का पहले जस्टिस जोसफ के मामले में और अब जस्टिस अकील क़ुरैशी के मामले में कॉलेजियम की सिफ़ारिश को लौटा देना इस बात को दर्शाता है कि सरकार और न्यायपालिका के रिश्ते ठीक नहीं हैं।

पहले कार्यकाल में हुआ टकराव

यहाँ याद दिला दें कि मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल में कई बार न्यायपालिका से टकराती रही। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक बार कहा था कि भारत की न्यायपालिका लगातार विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों का अतिक्रमण कर रही है और अब केंद्र सरकार के पास केवल बजट बनाने का और वित्तीय अधिकार रह गए हैं। जेटली के इस बयान के बाद सभी को समझ आ गया था कि सरकार और न्यायपालिका में टकराव चरम पर है। मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में कॉलेजियम को नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन यानी एनजेएसी से रिप्लेस करने की कोशिश की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने 2015 में इस प्रस्ताव को 4-1 से ठुकरा दिया था। तब कहा गया था कि एनजेएसी के जरिए सरकार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में ख़ुद नियुक्तियाँ करना चाहती थी और इसके बाद से ही सरकार और न्यायपालिका में विवाद बढ़ गया था।
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