गौतम अडानी 15 जुलाई तक अमेरिकी अदालत में हलफनामा देंगे। जज ने पूछा है कि क्या अमेरिका में निवेश के वादे के बदले उनके खिलाफ रिश्वतखोरी के आरोप हटाए गए हैं?
दिग्गज कारोबारी और अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी इसी हफ्ते अमेरिकी अदालत के सामने एक हस्ताक्षरित हलफनामा (Sworn Affidavit) दाखिल करने वाले हैं। पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि इस हलफनामे में गौतम अडानी को स्पष्ट करना होगा कि क्या वे किसी ऐसे गुप्त समझौते, वादे या लाभ के बारे में जानते हैं जिसके तहत अमेरिका में अडानी ग्रुप द्वारा किए जाने वाले संभावित निवेश के बदले उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक आरोपों (Indictment) को वापस लिया गया हो।
जज के आदेश के बाद उठाया गया कदम
अमेरिकी न्याय विभाग (US Department of Justice - DOJ) ने हाल ही में न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट को बताया था कि वह गौतम अडानी और सात अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज सिक्योरिटीज धोखाधड़ी के मामले को पूरी तरह से वापस लेना चाहता है, क्योंकि यह मामला कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।इसके बाद, अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज निकोलस गराफिस (Nicholas Garaufis) ने मामले की समीक्षा करते हुए कहा कि सरकार की दलीलों से पहली बार यह संभावना पैदा हुई है कि परदे के पीछे किसी प्रकार का समझौता हुआ हो सकता है, जिसकी जानकारी अदालत को नहीं दी गई। जज ने स्पष्ट किया कि मामले को पूरी तरह खारिज करने की मंजूरी देने से पहले कोर्ट को यह तय करना होगा कि सरकार का यह फैसला किसी अघोषित सौदेबाजी का हिस्सा न हो। इसी के चलते अदालत ने गौतम अडानी को 15 जुलाई तक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था।
न्याय विभाग ने मीडिया रिपोर्ट्स को नकारा
डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस के अधिकारी आर. ट्रेंट मैकॉटर ने कोर्ट में सौंपे 10 पन्नों के लिखित दस्तावेज में साफ किया कि आरोप वापस लेने का फैसला उनका अपना था। उन्होंने उन मीडिया रिपोर्ट्स को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिनमें दावा किया जा रहा था कि अडानी ग्रुप द्वारा अमेरिका में निवेश करने की प्रतिबद्धता (Commitment) के बदले इन आपराधिक आरोपों को हटाया गया है।न्याय विभाग का कहना है कि यह मामला बुनियादी रूप से विदेशी धरती (भारत) से जुड़ा था, इसे साबित करना बेहद मुश्किल था और यह वर्तमान अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता था। विभाग ने यह भी कहा कि इस मामले से किसी भी अमेरिकी निवेशक को एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ है।
अडानी ग्रुप की प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले पर अडानी ग्रुप ने फिलहाल कोई भी आधिकारिक टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। ग्रुप के प्रवक्ताओं का कहना है कि मामला अभी अदालत के अधीन (Sub-judice) है, इसलिए वे इस पर कुछ नहीं कहेंगे। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए अडानी इसी सप्ताह अपना हलफनामा कोर्ट में पेश कर देंगे।यह मामला साल 2024 (बाइडेन प्रशासन के दौरान) में शुरू हुआ था, जब अमेरिकी अभियोजकों ने आरोप लगाया था कि गौतम अडानी और उनके सहयोगियों ने भारत में एक सौर ऊर्जा परियोजना (Solar Plant Project) को मंजूरी दिलाने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को लगभग 250 मिलियन डॉलर की रिश्वत देने पर सहमति जताई थी और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह कर फंड जुटाया था। हालांकि, अब अमेरिकी न्याय विभाग ने माना है कि इन आरोपों को गलत तरीके से पेश किया गया था और यह मामला अमेरिकी क्षेत्राधिकार से बाहर का था।
अमेरिका विश्व पुलिस की तरह व्यवहार न करेः न्याय विभागः न्याय विभाग ने कोर्ट से कहा कि अमेरिका द्वारा 'विश्व पुलिस' (World Police) की तरह व्यवहार करना राजनयिक संबंधों को खराब कर सकता है। विभाग का मानना है कि भारत अपने आंतरिक तंत्र और व्यवस्था को संभालने में अमेरिकी वकीलों और अभियोजकों से कहीं अधिक सक्षम है। भारत की अपनी जांच एजेंसियों ने इन आरोपों की जांच की थी और उन्हें कोई भी कार्रवाई योग्य गड़बड़ी नहीं मिली थी। ऐसे में अमेरिकी कार्रवाई से राजनयिक तनाव पैदा होने का जोखिम था।
डीओजे (DOJ) ने स्पष्ट किया कि इस पूरे मामले में किसी भी अमेरिकी या अन्य निवेशक को "एक भी पैसे का नुकसान नहीं हुआ है" (Not a penny has been lost)。 चूंकि जिन बॉन्ड्स और लोन को लेकर सवाल उठाए गए थे, उनका या तो पूरा भुगतान कर दिया गया है या उनकी सर्विसिंग लगातार जारी है, इसलिए किसी पीड़ित के न होने पर इस आपराधिक मामले को आगे बढ़ाने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं बचता।
अभियोग (Indictment) में जिन बयानों के आधार पर धोखाधड़ी का दावा किया गया था, उन्हें न्याय विभाग ने कमजोर पाया। विभाग ने कोर्ट से कहा कि वे बयान केवल सामान्य कॉर्पोरेट "घिसे-पिटे जुमले" (Platitudes) और "बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई बातें" (Puffery) थीं, जिन पर कोई भी समझदार या अनुभवी संस्थागत निवेशक (Sophisticated Institutional Investors) आंख मूंदकर भरोसा नहीं करता।
ट्रम्प प्रशासन के तहत न्याय विभाग की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। जून 2025 के एक आधिकारिक ज्ञापन ( Todd Blanche Memorandum) का हवाला देते हुए डीओजे ने कहा कि अब अमेरिकी अभियोजकों का ध्यान केवल उन मामलों पर है जो अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठनों, या अमेरिकी कंपनियों को सीधा नुकसान पहुंचाने से जुड़े हों। अडानी का मामला इन प्राथमिकताओं में कहीं भी फिट नहीं बैठता।
न्याय विभाग ने कोर्ट को यह भी याद दिलाया कि संविधान के तहत किसी मामले को चलाना या बंद करना कार्यपालिका (Executive Branch) और अभियोजकों के विवेकाधिकार का हिस्सा है, न कि न्यायपालिका (Judiciary) का। कोर्ट को इस प्रशासनिक निर्णय में बहुत सीमित दखल देना चाहिए, क्योंकि अभियोजकों को सार्वजनिक रूप से अपनी हर रणनीति को सही ठहराने के लिए मजबूर करने से भविष्य के न्यायसंगत फैसलों पर बुरा असर पड़ेगा।