असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हाल के दिनों में बंगाली भाषी मुसलमानों को "मिया" कहकर बार-बार निशाना बना रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ और आलोचक खुले तौर पर नफरत फैलाने वाली भाषा (हेट स्पीच) करार दे रहे हैं। सरमा की भाषा समाज को विभाजित करने में यूजीसी की 2026 नियमावली से कहीं अधिक खतरनाक है, और सवाल उठ रहा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अब भी चुप रहेगा? हाल ही में सरमा का एक वीडियो असम बीजेपी ने जारी किया था, जिसमें सरमा दाढ़ी और टोपी वाले मुस्लिमों की फोटो पर गोली चलाते दिख रहे हैं। हालांकि बाद में उस वीडियो को डिलीट कर दिया गया। लेकिन इस वीडियो ने असम के तमाम बुद्धिजीवियों को हिला दिया और उन्होंने अपने बयान तारी किए। 

सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2023 में सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि नफरत फैलाने वालों के खिलाफ स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) लेकर एफआईआर दर्ज की जाए, बिना किसी शिकायत के इंतजार के। इसका उद्देश्य भीड़ हिंसा को रोकना और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना था। लेकिन असम में मुख्यमंत्री खुद बार-बार मुसलमानों, खासकर "मियाओं" (बांग्लादेश से अवैध रूप से आए बताए जाने वाले बंगाली मुसलमानों) के खिलाफ जहरीली बातें कर रहे हैं।

जनवरी और फरवरी 2026 में सरमा ने कई मौकों पर विवादास्पद बयान दिए। 25 जनवरी को उन्होंने कहा कि असम के मतदाता सूची के विशेष संशोधन (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) में कोई विवाद नहीं है, क्योंकि नोटिस सिर्फ "मियाओं" को दिए गए हैं। उन्होंने कहा, "किस हिंदू को नोटिस मिला? किस असमिया मुसलमान को मिला? नोटिस मियाओं को दिए गए हैं, वरना वे हमारे सिर पर चढ़ जाएंगे। हम कुछ उत्पात करेंगे, लेकिन कानून के दायरे में।"

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27 जनवरी को उन्होंने और साफ कहा कि मतदाता सूची संशोधन के दौरान "चार से पांच लाख मिया वोटरों के नाम हटाए जाएंगे।" उन्होंने बिना शर्मिंदगी के कहा, "वोट चोरी का मतलब है कि हम कुछ मिया वोट चुराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें असम में वोट नहीं करना चाहिए, बल्कि बांग्लादेश में जाकर करें।"

28 जनवरी को उन्होंने और नीचे गिरते हुए कहा, "जो भी मियाओं को किसी भी तरह परेशान कर सकता है, उसे करना चाहिए। रिक्शा में किराया 5 रुपये हो तो उन्हें 4 रुपये दें। केवल परेशानी झेलने पर ही वे असम छोड़ेंगे।"

यह कोई नई बात नहीं है। अगस्त 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर सरमा ने कहा कि अवैध मुस्लिम प्रवासी घर किराए पर लेते हैं, गाय काटते हैं, मस्जिद बनाते हैं और सत्र (वैष्णव मठों) को बाहर निकाल देते हैं। इससे पहले उन्होंने "फ्लड जिहाद" और "लैंड जिहाद" जैसे आरोप लगाए, और हिंदुओं को गन लाइसेंस बांटने को जायज ठहराया।

हाल ही में हर्ष मंदर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता ने दिल्ली में उनके खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराई, लेकिन सरमा ने पलटवार में कहा कि वे मंदर के खिलाफ 100 मामले दर्ज करेंगे। असम में किसी पुलिस अधिकारी के लिए मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना लगभग असंभव माना जाता है। 2024 में एक कार्यकर्ता ने सरमा के खिलाफ एफआईआर की मांग की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अली खान महमूदाबाद का केस याद है

अशोका यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद जैसे शिक्षाविद को सोशल मीडिया पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी, लेकिन एफआईआर पर रोक नहीं लगाई और जांच के लिए एसआईटी गठित की। जस्टिस सूर्य कांत (अब मुख्य न्यायाधीश) ने यहां तक कहा कि उनके पोस्ट "डॉग व्हिसल" (यानी देश और समाज को सावधान करना ) हो सकते हैं।

जस्टिस सूर्य कांत की बेंच ने जनवरी 2026 में यूजीसी की इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026 को "समाज को विभाजित करने" के आधार पर स्थगित कर दिया। सवाल ये है कि जब यूजीसी नियमावली पर इतनी संवेदनशीलता दिखाई गई, तो सरमा की खुले नफरत भरे भाषणों पर सुप्रीम कोर्ट क्यों चुप है?

अकादमिक अरूपज्योति सैकिया की किताब "द क्वेस्ट फॉर मॉडर्न असम" में ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर साबित किया गया है कि बांग्लादेश से "डेमोग्राफिक इनवेजन" का दावा अतिरंजित है। विभाजन के बाद हिंदू बहुल प्रवास हुआ, और अवैध मुस्लिम प्रवास सीमित रहा। एनआरसी में भी अधिकांश बहिष्कृत हिंदू थे, और कई कानूनी नागरिक बन चुके हैं।

प्रशांत भूषण का बयान

सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले का खुद संज्ञान लेना चाहिए और गोली मारने वाले वायरल वीडियो पोस्ट के लिए जिम्मेदार भाजपा पदाधिकारियों को जवाबदेह ठहराना चाहिए। यह एक गंभीर आपराधिक अपराध है। विपक्ष का कोई भी पदाधिकारी अगर ऐसी पोस्ट डालता तो उसे यूपीए के तहत जेल हो जाती।

उधर, शिक्षाविदों, डॉक्टरों, लेखकों और रिटायर्ड नौकरशाहों सहित 40 से अधिक प्रमुख नागरिकों ने गुवाहाटी हाईकोर्ट से असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा एक विशेष समुदाय के विरुद्ध दिए गए हालिया बयानों का स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि "संवैधानिक उल्लंघनों के विरुद्ध मौन या निष्क्रियता" से "संविधान की नैतिक सत्ता ही नष्ट हो सकती है"।
पिछले गुरुवार को चीफ जस्टिस को लिखे पत्र में नागरिकों ने हाईकोर्ट का ध्यान सरमा के कई सार्वजनिक बयानों की ओर दिलाया, जो "स्पष्ट रूप से घृणास्पद भाषण, कार्यकारी धमकी और एक विशेष समुदाय की खुली बदनामी" के समान हैं। यह पत्र मुख्यमंत्री द्वारा 'मिया' (बंगाली भाषी मुस्लिम) के विरुद्ध की गई टिप्पणियों के संदर्भ में था। उन्होंने कहा कि बंगाली भाषी मुस्लिम 100 से अधिक वर्षों में "विशाल असमिया समाज का हिस्सा" बन चुके हैं, और मुख्यमंत्री के बयान "अमानवीकरण, सामूहिक कलंक और राज्य प्रायोजित उत्पीड़न की धमकियों में आते हैं"।
43 हस्ताक्षरकर्ताओं में शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी हिरेन गोहेन, पूर्व-डीजीपी हरेकृष्ण डेका, गुवाहाटी के पूर्व आर्कबिशप, थॉमस मेनमपरमपिल, राज्यसभा सांसद अजीत भुयां, पर्यावरण वैज्ञानिक दुलाल चंद्र गोस्वामी, असम मेडिकल कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल टीआर बोरबोरा, वकील शांतनु बोरठाकुर, ज्वाइंट काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स के संयुक्त संयोजक गर्ग तालुकदार और साहित्यकार अरूपा पतंगिया कलिता शामिल हैं।
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उन्होंने अदालत से "पीड़ित समुदाय की गरिमा, समानता और सुरक्षा की रक्षा" करने और "यह पुनः पुष्टि करने" का आह्वान किया कि संवैधानिक पदाधिकारी अपनी शपथ और संवैधानिक अनुशासन से बंधे हैं। प्रमुख नागरिकों ने अदालत से "धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक शासन और कानून के शासन में जनता के विश्वास को बनाए रखने" के लिए हस्तक्षेप करने का भी आग्रह किया। पत्र में आगे कहा गया, "इस तरह के खुले संवैधानिक उल्लंघनों के सामने चुप्पी या निष्क्रियता इन्हें सामान्य बना देगी और स्वयं संविधान के नैतिक अधिकार को कमजोर कर देगी।"
विश्लेषकों का कहना है कि सरमा की भाषा और नीतियां (जैसे बेदखली, जिसमें अडानी जैसे कॉरपोरेट से जुड़े प्रोजेक्ट्स शामिल हैं) समाज में डर और विभाजन पैदा कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने 2023 के आदेश को लागू करेगा और असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करेगा, या राजनीतिक शक्ति के आगे चुप्पी साधेगा? असम और देश की एकता दांव पर लगी है।