ब्लूमबर्ग की स्तंभकार कैथरीन थोर्बेक ने अपने लेख में भारत की एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) महत्वाकांक्षाओं और जमीनी हकीकतों के बीच के अंतर का विश्लेषण किया है। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित 'एआई इम्पैक्ट समिट 2026' के संदर्भ में, उनका तर्क है कि बड़े आयोजनों और विदेशी टेक दिग्गजों के साथ फोटो खिंचवाने से भारत एआई महाशक्ति नहीं बन जाएगा; इसके लिए बुनियादी ढांचे और सामाजिक चुनौतियों का समाधान करना बेहद ज़रूरी है।
शहर के हर कोने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशाल पोस्टर लगाए गए थे, जो एआई से जुड़े उत्साहजनक स्लोगन्स के साथ थे। ये पोस्टर शहर के चौराहों पर लगे थे, जो मेहमानों का स्वागत कर रहे थे। कैथरीन ने इसकी 2023 में भारत द्वारा आयोजित जी20 समिट से तुलना की है। उस समय भी मोदी के पोस्टर हर जगह नजर आते थे, मानो वे हर जगह से नजर रख रहे हों। जी 20 समिट भी तमाशा बन गया था, भारत को कुछ हासिल नहीं हुआ।



कैथरीन थोर्बेक ने लिखा है कि भारत दुनिया की मेजबानी कर सकता है और अपने भविष्य के विजन को भी बेच सकता है, लेकिन एआई पावर हासिल करने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए unglamorous (अनाकर्षक) काम की जरूरत है, जैसे कि बुनियादी ढांचे में निवेश, शिक्षा में सुधार, प्रतिभा विकास और अनुसंधान पर फोकस। वो कहती हैं कि दिल्ली में इस सप्ताह एआई के वादों और पाखंडों (हिप्पोक्रेसी) को सबसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। उनका तर्क है कि सिर्फ इवेंट्स और प्रचार से भारत एआई में ग्लोबल लीडर नहीं बन सकता; इसके लिए ठोस और निरंतर प्रयास जरूरी हैं।
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लेख के खास प्वाइंट

1. उत्साह बनाम वास्तविकता (Hype vs Reality)
भारत वर्तमान में जेनरेटिव एआई ऐप डाउनलोड के मामले में दुनिया में सबसे आगे है और चैटजीपीटी (ChatGPT) का दूसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्ता आधार है। हालाँकि, लेख में सवाल उठाया गया है कि क्या भारत केवल एक 'उपभोक्ता' (Consumer) बनकर रह जाएगा या वास्तव में एआई तकनीक का 'उत्पादक' (Producer) बन पाएगा।

2. बुनियादी ढांचे की चुनौतियां

अंबानी और अडानी जैसे बड़े समूहों ने डेटा केंद्रों में भारी निवेश का वादा किया है, लेकिन स्तंभकार ने इसके व्यावहारिक पक्ष पर सवाल उठाया है। एआई के लिए विशाल मात्रा में बिजली, जमीन और पानी की ज़रूरत होती है। भारत के कई शहरों में अभी भी पीने योग्य पानी और स्वच्छ हवा का संकट है। क्या भारत का बिजली ग्रिड इस अतिरिक्त बोझ को सह पाएगा? भारत में ऐसा बुनियादी ढांचा विकसित ही नहीं किया गया कि उसके दम पर एआई के बारे में कुछ सोचा जा सके।

3. रोजगार का संकट 

पश्चिमी देशों में एआई को 'श्रम की कमी' के समाधान के तौर पर देखा जाता है, लेकिन भारत में स्थिति बिल्कुल उलट है। भारत के पास युवकों की एक विशाल फौज है जिन्हें नौकरियों की जरूरत है। खतरा यह है कि यदि एआई एंट्री-लेवल (शुरुआती स्तर) की नौकरियों की जगह ले लेता है, तो भारत में एक बड़ा सामाजिक संकट पैदा हो सकता है, क्योंकि भारत का आईटी क्षेत्र इस बदलाव के प्रति काफी संवेदनशील है।
ब्लूमबर्ग पर एआई समिट रिपोर्टिंग का वीडियो

4. तकनीकी और राजनीतिक चुनौतियां

लेख के अनुसार, एआई शिखर सम्मेलन में अव्यवस्था (जैसे प्रवेश द्वारों पर भीड़ और कुप्रबंधन) ने यह उजागर किया कि भारत की सबसे प्रतिभाशाली प्रतिभाएं अभी भी विदेशों में अवसर क्यों तलाश रही हैं। सम्मेलन में एक तरफ $33,000 प्रति रात वाले महंगे होटल के कमरे थे, तो दूसरी तरफ आयोजन स्थल के बाहर से बेघर लोगों को हटाया जा रहा था। यह एआई के 'लोकतांत्रीकरण' के दावों के बीच बढ़ती असमानता को दर्शाता है।

5. जियो पॉलिटिक्स और एआई गवर्नेंस

अमेरिका और भारत ने एक द्विपक्षीय घोषणा जारी की है जो नवाचार (इनोवेशन) के प्रति उदार है, लेकिन अमेरिका ने एआई के 'वैश्विक शासन' (Global Governance) को खारिज कर दिया है। भारत खुद को अमेरिका और चीन के बराबर खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, जिसके लिए वह नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और विशाल डेटा केंद्रों की योजना बना रहा है।
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लेख का निष्कर्ष ये है कि भारत दुनिया की मेजबानी कर सकता है और भविष्य का सपना बेच सकता है, लेकिन एआई शक्ति बनने का रास्ता केवल इवेंट से होकर नहीं गुजरता। इसके लिए एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem), ऊर्जा सुरक्षा और सबसे महत्वपूर्ण रूप से एआई लहर को आम लोगों की आजीविका में बदलने की क्षमता की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी के लिए असली परीक्षा सिलिकॉन वैली के दिग्गजों के साथ सेल्फी लेना नहीं, बल्कि एआई के माध्यम से रोजगार पैदा करना है।