संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) जैसी प्रमुख किसान यूनियनों ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील की निंदा करते हुए इसे विश्वासघात बताया है। उसने सब्सिडी वाले अमेरिकी कृषि उत्पादों की बाढ़ आने की आशंका जताई है। 12 फरवरी से विरोध प्रदर्शन की योजना बन रही है।
संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) सहित प्रमुख किसान संगठनों ने भारत-अमेरिका के बीच हुए ट्रेड डील की कड़ी निंदा की है। किसान नेताओं का आरोप है कि यह समझौता भारतीय किसानों के हितों के साथ "ऐतिहासिक विश्वासघात" है, क्योंकि इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों से भारतीय बाजार भर जाएगा और देश के किसान बर्बाद हो जाएंगे। संगठनों ने समझौते का पूरी जानकारी संसद में पेश करने, राज्य सरकारों से चर्चा करने और कृषि-डेयरी क्षेत्र को इससे पूरी तरह बाहर रखने की मांग की है।
एसकेएम ने मोदी सरकार पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने "झुकने" का आरोप लगाते हुए कहा, "मोदी सरकार द्वारा लोगों, खासकर किसानों के साथ विश्वासघात की हम कड़ी निंदा करते हैं। अमेरिकी सामानों पर जीरो प्रतिशत आयात शुल्क की अनुमति देकर सरकार अमेरिकी दबाव के आगे आत्मसमर्पण कर रही है।" संगठन ने इसे "किसानों के साथ धोखा" करार दिया और चेतावनी दी कि "किसान इस ऐतिहासिक विश्वासघात को कभी माफ नहीं करेंगे।"
एसकेएम ने 11 फरवरी तक गांवों में राष्ट्रीय अभियान चलाने और 12 फरवरी को देशव्यापी हड़ताल व बड़े पैमाने पर प्रदर्शन की घोषणा की है। इसी तरह, भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने 12 फरवरी को सभी जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर सरकार को ज्ञापन सौंपने का ऐलान किया है। ऑल इंडिया किसान सभा (एआईकेएस) ने भी समझौते का विरोध करते हुए संसद में भारत-अमेरिका, भारत-यूके और भारत-ईयू फ्री ट्रेड समझौतों का पूरा विवरण पेश करने की मांग की है।
बीकेयू के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा, "अगर यह समझौता आगे बढ़ता है, तो अमेरिका भारत के कृषि और डेयरी बाजार पर कब्जा कर लेगा, जिससे यहां के किसानों को भारी नुकसान होगा। अमेरिकी किसानों को भारतीय किसानों से ज्यादा सब्सिडी मिलती है। भारतीय किसान कैसे अमेरिकी कंपनियों से मुकाबला करेंगे? शुरुआत में कम कीमत पर बेचकर बाद में कीमतें बढ़ा दी जाएंगी, जिससे किसान और आम जनता दोनों प्रभावित होंगे।"
एआईकेएस के अध्यक्ष अशोक धवाले ने कहा, "एआईकेएस भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का दृढ़ता से विरोध करता है। यह अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियों के सामने आत्मसमर्पण के अलावा और कुछ नहीं है।"
भारतीय किसान संघ (बीकेएस) के राष्ट्रीय प्रवक्ता रघुवेंद्र सिंह पटेल ने कहा कि बीकेएस किसी भी ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौते के खिलाफ है जो भारतीय किसानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले, लेकिन समझौते की स्पष्टता मिलने के बाद ही टिप्पणी करेंगे कि क्या कृषि और डेयरी क्षेत्र इसमें शामिल हैं या नहीं।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में समझौते का बचाव करते हुए कहा, "मैं इस पवित्र सदन को दोहराता हूं कि भारत की उर्वरक और कृषि क्षेत्रों की प्राथमिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखा गया है। कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित हैं।" गोयल ने दावा किया कि समझौते से भारत की निर्यात क्षमता बढ़ेगी, खासकर श्रम-गहन क्षेत्रों में, और अमेरिका पर भारतीय टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया गया है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष तकनीकी प्रक्रियाओं पर काम कर रहे हैं और जल्द ही समझौता पूरा हो जाएगा।
किसान संगठनों का कहना है कि समझौते में अमेरिकी कृषि उत्पादों पर जीरो आयात शुल्क से बाजार में बाढ़ आ जाएगी। अमेरिकी किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, जिससे भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। एसकेएम ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से कहा था कि "किसानों के हितों की रक्षा के लिए भारी कीमत चुकाने को तैयार हैं", लेकिन अब यह समझौता उसी के विपरीत है।
यह मुद्दा 2020-21 के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के बड़े आंदोलन की याद दिलाता है, जिसमें एसकेएम अग्रणी भूमिका में था। फिलहाल, किसान संगठन समझौते के पूरे विवरण की मांग कर रहे हैं और विरोध तेज करने की तैयारी में हैं।