अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी जिस ‘ग्रेट डील’ की पटकथा दुनिया के सामने बेच रहे हैं, वह दरअसल समान भागीदारी नहीं, बल्कि दबाव में कराए गए आर्थिक समझौतों की अगली कड़ी है। भारत के साथ अंतरिम व्यापार ढांचा भी इसी रणनीति का हिस्सा है। जिसमें अमेरिका को फ़ायदा मिलना तय है, जबकि भारत के लिए जोखिम और अनिश्चितता ज़्यादा बढ़ी है।
भारत-अमेरिका संयुक्त बयान के मुताबिक भारत ने अगले पाँच वर्षों में लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों के आयात की प्रतिबद्धता जताई है। यह आंकड़ा अपनेआप में चौंकाने वाला है, क्योंकि 2025 में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार सिर्फ़ 132 अरब डॉलर रहा है। ऐसे में भारत का हर साल लगभग 100 अरब डॉलर का अतिरिक्त अमेरिकी आयात कराना न केवल असंतुलित है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए संभावित रूप से ख़तरनाक भी है।

ट्रंप की ‘डील-मेकिंग’ या आर्थिक जबरदस्ती?

भारत से पहले ट्रंप प्रशासन इसी तरह की जबरदस्ती वाली डील जापान, साउथ कोरिया और मलेशिया से कर चुका है। जापान से 550 अरब डॉलर के अमेरिकी निवेश व आयात की डील हुई है। दक्षिण कोरिया से 350 अरब डॉलर की डील हुई है और और मलेशिया से 70 अरब डॉलर की प्रतिबद्धताएँ ट्रंप करवा चुके हैं।
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यह कोई संयोग नहीं, बल्कि weaponized trade strategy का हिस्सा है, जिसमें अमेरिकी बाज़ार तक पहुँच को इनाम नहीं, बल्कि दंड और दबाव के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कमज़ोर या रणनीतिक रूप से आश्रित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बनाकर ट्रंप अमेरिका के व्यापार घाटे को दूसरों के कंधों पर लादने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत की आर्थिक हक़ीक़त: गलत तुलना, गलत सौदा

भारत की तुलना जापान या दक्षिण-पूर्व एशिया की export-led economies से करना एक बुनियादी भूल है। भारत की वृद्धि घरेलू खपत पर आधारित है। भारत पहले से ही ऊर्जा, रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीक में आयात-निर्भर है। ऐसे में अमेरिकी आयात को आक्रामक रूप से बढ़ाना भारत के मर्चेंडाइज़ ट्रेड डेफ़िसिट को 200 अरब डॉलर के आसपास धकेल सकता है।

इसका सीधा असर रुपये के एक्सचेंज रेट पर पड़ेगा। रूपया जो डॉलर के मुकाबले लगातार लुढ़क रहा है और गिरता जाएगा। इसका भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी सीधा असर पड़ेगा। घरेलू उद्योगों के मुकाबले पर पड़ेगा। अभी तो घरेलू उद्योग आपस में मुकाबला करते हैं।

किसानों के हितों पर सीधा हमला

इस समझौते से अमेरिका के प्रोसेस्ड फलों और अन्य कृषि उत्पादों को अब भारत में प्रवेश की अनुमति मिल गई है। भारत पहले से ही अमेरिका से लगभग 334 मिलियन डॉलर का कपास आयात कर रहा है, जिसकी वजह से देश के किसानों को मिलने वाली कपास की कीमतें घरेलू बाज़ार में तेज़ी से गिर गई हैं। अब अमेरिका से मक्का आएगा, कपास आएगी, ज्वार आएगा, फल आएंगे, प्रोसेस्ड फल आएंगे और यहाँ तक कि सोयाबीन भी अमेरिका से आएगा। सवाल यह है कि जब विदेशी कृषि उत्पाद भारतीय बाज़ार में भर जाएंगे, तो भारतीय किसान अपनी फसल किस कीमत पर और किसे बेचेंगे?

इस समझौते से यह बात स्पष्ट है कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पाद पर या तो ड्यूटी (टैक्स) घटाएगा या खत्म करेगा। ऐसा होने पर भारत के कृषि उत्पाद यानी किसानों के उत्पाद कहां टिकेंगे।

‘चीन मॉडल’ से भी सख़्त अमेरिकी दबाव?

यह ट्रेड डील चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) से भी ज़्यादा खतरनाक है। विशेषज्ञों की यह राय पूरी तरह निराधार नहीं लगती। क्योंकि BRI में कम से कम इंफ़्रास्ट्रक्चर निवेश, दीर्घकालिक ऋण  और विकास का नैरेटिव मौजूद रहता है। वहीं अमेरिकी मॉडल में
न निवेश की गारंटी, न तकनीक ट्रांसफर, न भारतीय निर्यात के लिए सुनिश्चित बाज़ार। सिर्फ़ एकतरफ़ा आयात का वादा — वह भी राजनीतिक दबाव के साए में।

‘मेक इन इंडिया’ बनाम ‘मेड इन यूएसए’

लंबे समय से दो शब्द मोदी सरकार बहुत जोर शोर से गा रही थी- मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत। इस ट्रेड डील ने उन्हें हवा में उड़ा दिया। डील का फ्रेमवर्क सीधे तौर पर Make in India और Atmanirbhar Bharat की अवधारणा से टकराता दिखता है। सवाल यह नहीं कि भारत अमेरिका से व्यापार क्यों बढ़ाना चाहता है, सवाल यह है कि क्या सरकार ने सेक्टर-वाइज़ असर का आकलन किया? MSMEs, कृषि और फार्मा उद्योग को इससे क्या मिलेगा? क्या भारतीय बाज़ार को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलकर घरेलू उद्योगों को हाशिए पर नहीं धकेला जा रहा? अब तक इन सवालों पर सरकार की चुप्पी चिंताजनक है।

रणनीतिक साझेदारी या भू-राजनीतिक मोहरा?

इस समझौते को चीन के मुक़ाबले भारत को एक strategic counter-weight बनाने की अमेरिकी कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। लेकिन रणनीतिक साझेदारी का मतलब यह नहीं हो सकता कि भारत अपनी आर्थिक संप्रभुता दांव पर लगा दे। यह ट्रेड डील भारत-अमेरिका रिश्तों में संतुलन की बजाय असमानता को उजागर करती है, जहाँ अमेरिका शर्तें तय कर रहा है और भारत जोखिम उठा रहा है। 
अगर भारत ने इस समझौते में निर्यात पहुँच, तकनीक, रोज़गार और घरेलू उद्योगों के लिए ठोस सुरक्षा कवच सुनिश्चित नहीं किया, तो यह सौदा इतिहास में साझेदारी नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव के उदाहरण के रूप में दर्ज हो सकता है।