अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 फरवरी को नया कार्यकारी आदेश जारी किया। उसके बाद मोदी सरकार ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने का फैसला टाल दिया है। इस बड़े नीतिगत बदलाव के तहत अब भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल के आयात पर अमेरिकी निगरानी भी लागू होगी। यह इस समझौते का सबसे चिन्ताजनक पहलू है कि भारत ने अमेरिका की निगरानी क्यों स्वीकार की। क्या अमेरिका को भारत पर अब भी भरोसा नहीं है।
ट्रंप प्रशासन के सख्त रुख और प्रतिबंधों की चेतावनी के बाद भारत ने यह कदम उठाया है। यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत रूस से भारी मात्रा में सस्ता कच्चा तेल खरीद रहा था, जो अब बंद होने की कगार पर है।
ट्रंप ने चेतावनी भी दी है कि यदि भारत दोबारा रूसी तेल आयात शुरू करता है, तो वाणिज्य सचिव द्वारा अतिरिक्त शुल्क फिर से लगाने की सिफारिश की जा सकती है। इस फ्रेमवर्क में दर्ज किया गया है- अमेरिकी वाणिज्य सचिव, विदेश सचिव, वित्त सचिव और वाणिज्य सचिव द्वारा उचित समझे जाने वाले किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी आपसी तालमेल के जरिए इस बात की निगरानी करेंगे कि क्या भारत कार्यकारी आदेश 14329 की धारा 7 में परिभाषित रूसी संघ के तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात फिर से शुरू करता है। यदि वाणिज्य सचिव को पता चलता है कि भारत ने रूसी संघ के तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात फिर से शुरू कर दिया है, तो विदेश सचिव परामर्श से यह सिफारिश करेंगे कि क्या और किस हद तक भारत के संबंध में अतिरिक्त कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या भारत से आयातित वस्तुओं पर 25 प्रतिशत की अतिरिक्त मूल्य-आधारित शुल्क दर फिर से लागू की जानी चाहिए।


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ट्रंप के कार्यकारी आदेश से साफ है कि "भारत ने रूसी संघ के तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है, यह स्पष्ट किया है कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद खरीदेगा, और हाल ही में अगले 10 वर्षों में डिफेंस सहयोग का विस्तार करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक रूपरेखा के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की है।"

ट्रेड डील फ्रेम वर्क और ट्रंप के आदेश के बाद मुख्य प्वाइंट

  • रूसी तेल का त्याग: भारत सरकार ने अपनी तेल कंपनियों को रूसी कच्चे तेल के नए ऑर्डर देने से बचने के निर्देश दिए हैं।

  • अमेरिकी निगरानी: अब भारत के तेल आयात सौदों की अमेरिका द्वारा निगरानी की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं हो रहा है।

  • आर्थिक प्रभाव: रूस से सस्ता तेल मिलना बंद होने से भारत के आयात बिल पर असर पड़ सकता है और घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना है।

  • कूटनीतिक दबाव: यह फैसला ट्रंप प्रशासन के उस दबाव का नतीजा माना जा रहा है जिसमें सहयोगी देशों को रूस के साथ व्यापारिक संबंध सीमित करने को कहा गया है।

भारत क्यों फिर ये सब कह रहा था

ट्रंप ने जब स्पष्ट तौर पर कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार (5 फरवरी 2026) को मीडिया ब्रीफिंग में कहा था, "भारत की ऊर्जा सुरक्षा या सोर्सिंग के संदर्भ में सरकार ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। बाजार की स्थितियों और विकसित अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता के मुताबिक ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण हमारी रणनीति का केंद्र है। भारत की सभी कार्रवाइयां और भविष्य में की जाने वाली कार्रवाइयां इसी को ध्यान में रखकर की जाती हैं।" यानी जायसवाल का मतलब यह था कि भारत में जरूरत के हिसाब से तेल खरीदने की प्राथमिकता तय करेगा। कोई देश उसे आदेश नहीं दे सकता।

भारत रूस से लगातार तेल खरीद कम कर रहा है

भारत ने दिसंबर 2025 से ही रूस से कच्चे तेल की खरीद को काफी कम कर दिया है। रूस से तेल आयात घटकर मात्र 2.7 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले 38 महीनों में सबसे कम है। रूस से आने वाला तेल अब भारत के कुल तेल आयात का सिर्फ़ 24.9% है, जो नवंबर में 34% से काफ़ी कम हो गया है। यह तीन साल में सबसे कम हिस्सा है। ट्रंप ने दावा किया कि भारत अब अमेरिका और शायद वेनेजुएला से ज्यादा तेल खरीदेगा।
भारत ने दिसंबर 2025 में रूस से 5.8 मिलियन टन तेल आयात किया। यह फरवरी 2025 के बाद सबसे कम है। पिछले साल दिसंबर की तुलना में मूल्य में 15% की कमी आई, जबकि नवंबर 2025 की तुलना में 27.1% कम हुआ। यह नवंबर में 3.7 अरब डॉलर था।
सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि यह कमी इसलिए आई क्योंकि भारत अब तेल के स्रोतों को विविधता दे रहा है। यानी अब सरकार किसी एक या कुछ देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहती है और कई देशों से तेल आयात हो रहा है।
दूसरी तरफ, अमेरिका से तेल आयात में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। दिसंबर 2025 में अमेरिका से 569.3 मिलियन डॉलर का तेल आया, जो दिसंबर 2024 की तुलना में लगभग 31% ज्यादा है। मात्रा में देखें तो 1.1 मिलियन टन तेल आया, जो पिछले साल दिसंबर से 58% ज्यादा है। हालांकि नवंबर 2025 में अमेरिका से आयात बहुत ज्यादा था। यह सात महीने का उच्चतम स्तर था, इसलिए दिसंबर में उससे कम दिख रहा है, लेकिन साल-दर-साल बढ़ोतरी साफ़ है।