अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था Amnesty International ने आज सोमवार को दिल्ली के Jantar Mantar Protest पर 20 जुलाई को छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की जांच रिपोर्ट जारी की है। उसने ‘संसद मार्च’ प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर पैलेट, लाठी और इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों के अत्यधिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जंतर मंतर पर 20 जुलाई को पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने जुलाई में दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संगठन की नई जांच के मुताबिक, 20 जुलाई को दिल्ली में हुए ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट फायरिंग शॉटगन, आंसू गैस, लाठियों और इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों का इस्तेमाल किया। एमनेस्टी का कहना है कि उपलब्ध वीडियो, तस्वीरों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की जांच से पुलिस कार्रवाई में जरूरत से ज्यादा और गैरकानूनी बल प्रयोग के संकेत मिलते हैं। यह रिपोर्ट आज सोमवार 24 अगस्त को जारी की गई।
एमनेस्टी ने 17 वीडियो की जांच की
एमनेस्टी इंटरनेशनल के Evidence Lab ने दिल्ली में 20 जुलाई को बनाए गए 17 वीडियो की पुष्टि की। ये वीडियो जंतर-मंतर, संसद मार्ग और कनॉट प्लेस के आसपास के इलाकों के हैं। जांच में दिल्ली पुलिस के अलावा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों की भी पहचान की गई। संगठन ने बिहार के सिवान में 24 जुलाई को बनाए गए दो वीडियो की भी जांच की।जंतर मंतर पर 20 जुलाई के पुलिस बल प्रयोग पर रिपोर्ट
एमनेस्टी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर बल प्रयोग को असंगत बताने के आरोपों को खारिज किया था। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में भी अपनी कार्रवाई को ‘प्रोफेशनल’ बताते हुए कहा था कि बल का इस्तेमाल न्यूनतम और परिस्थितियों के अनुरूप किया गया। हालांकि एमनेस्टी का दावा है कि उसके द्वारा सत्यापित दृश्य सबूत पुलिस के इस पक्ष से मेल नहीं खाते।
पैलेट फायरिंग शॉटगन के इस्तेमाल का आरोप
एमनेस्टी ने दो ऐसे वीडियो की पुष्टि की है जिनमें RAF का एक अधिकारी कनॉट प्लेस और संसद मार्ग के चौराहे के पास भीड़ की ओर पैलेट शॉटगन चलाता दिखाई देता है। दो अन्य वीडियो में इसी इलाके के दो प्रदर्शनकारियों के शरीर पर ऐसे घाव दिखाई देते हैं जो बर्डशॉट यानी छोटे-छोटे धातु के छर्रों से लगी चोटों से मेल खाते हैं।एमनेस्टी के अनुसार, एक घायल प्रदर्शनकारी ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पुलिस पहले आंसू गैस का इस्तेमाल कर रही थी, लेकिन बाद में बिना चेतावनी पैलेट फायरिंग शॉटगन का इस्तेमाल किया गया। उसके मुताबिक उसके शरीर पर करीब 25-30 छर्रों के घाव हुए और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। संगठन का कहना है कि बर्डशॉट कानून-प्रवर्तन के लिए तैयार किया गया हथियार नहीं है। छोटे-छोटे धातु के छर्रे अनियंत्रित तरीके से फैलते हैं और इससे प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ आसपास मौजूद लोगों के गंभीर रूप से घायल होने का खतरा रहता है। एमनेस्टी ने इसे भीड़ नियंत्रण में इस्तेमाल करने पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की है।
पुलिस ने बल प्रयोग से पहले चेतावनी नियम का पालन नहीं कियाः एमनेस्टी ने भारत के Bureau for Police Research and Development की ‘Standard Operating Procedures to deal with Public Agitations with Non-Lethal Measures’ का हवाला देते हुए कहा कि कम घातक या घातक बल प्रयोग से पहले सुरक्षा बलों को प्रदर्शनकारियों को चेतावनी देनी चाहिए। संगठन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों में भी पुलिस से पहले गैर-हिंसक तरीकों का इस्तेमाल करने और संभव होने पर स्पष्ट चेतावनी देने की अपेक्षा की जाती है।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने पैलेट से चोट लगने की खबरों को सोशल मीडिया पर ‘फेक न्यूज’ बताते हुए इन्हें गलत और भ्रामक कहा था तथा अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। हालांकि नेता विपक्ष राहुल गांधी ने पैलेट से घायल एक युवक को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेश किया था। द हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया आदि अखबारों ने ऐसे तमाम घायलों की रिपोर्ट प्रकाशित की थी। साहिल लाचव की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने जब एफआईआर दर्ज नहीं की तो राहुल गांधी ने संसद मार्ग थाने पर जाकर धरना दिया। तब दिल्ली पुलिस एफआईआर दर्ज करने को राज़ी हुई।
प्लास्टिक और मेटल पैलेट के इस्तेमाल पर भी सवाल
द हिन्दू की रिपोर्ट का हवाला देते हुए एमनेस्टी ने कहा कि 20 जुलाई की शाम RAF की एक इकाई ने एक DCP के आदेश पर प्लास्टिक पैलेट से भरे दो बैलिस्टिक कारतूस चलाए थे। इसके अलावा 55 नॉन-इलेक्ट्रिकल और 15 इलेक्ट्रिकल क्राउड-कंट्रोल शेल तथा पांच आंसू गैस ग्रेनेड भी इस्तेमाल किए गए थे। एमनेस्टी के मुताबिक, बाद में CRPF की एक आंतरिक जांच में यह बात सामने आई कि RAF कर्मियों ने कम से कम सात राउंड ऐसे गोला-बारूद के चलाए जिनमें धातु के छर्रे थे। RTI के जरिए सामने आई जानकारी के अनुसार प्रदर्शन के दौरान कम से कम 10 लोग पैलेट से घायल हुए।8 वीडियोः शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज का आरोप
एमनेस्टी ने आठ ऐसे वीडियो सत्यापित किए हैं जिनमें दिल्ली पुलिस और RAF के जवान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसाते दिखाई देते हैं। संगठन के मुताबिक, इनमें एक युवा लड़का भी शामिल था, जिसने पुलिस को उकसाया नहीं था और न ही प्रतिरोध कर रहा था। एक वीडियो में एक व्यक्ति जमीन पर गिरा हुआ दिखाई देता है और उसके बाद भी उस पर लगातार लाठियां बरसाई जाती हैं। कुछ अन्य वीडियो में सादे कपड़ों में मौजूद लोग प्रदर्शनकारियों को पीटते दिखाई देते हैं। इनमें कुछ लोगों के हेलमेट पर ‘Delhi Police’ लिखा था। एमनेस्टी ने कहा कि इन लोगों के पास स्पष्ट पहचान चिह्न नहीं दिखना भी जवाबदेही के सिद्धांत के खिलाफ है।संगठन ने लंबे और लचीले डंडों यानी लाठियों के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई है। एमनेस्टी ने संयुक्त राष्ट्र के विशेष मेमोरेंडम के हवाले से कहा कि इस तरह के डंडे सामान्य बैटन की तुलना में अधिक गति बल पैदा कर सकते हैं और गंभीर चोट का जोखिम बढ़ाते हैं।
इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइस के इस्तेमाल पर भी सवाल
एमनेस्टी ने एक वीडियो की भी पुष्टि की जिसमें RAF का एक अधिकारी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी पर इलेक्ट्रिक शॉक बैटन का इस्तेमाल करता दिखाई देता है। संगठन के मुताबिक, सीधे संपर्क वाले इलेक्ट्रिक शॉक उपकरण अत्यधिक दर्द पैदा कर सकते हैं और उनके इस्तेमाल से गंभीर शारीरिक व मनोवैज्ञानिक नुकसान का खतरा रहता है। एमनेस्टी और संयुक्त राष्ट्र के विशेष मेमोरेंडम ने कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है।सीवान में AK-टाइप राइफल से फायरिंग का आरोप
एमनेस्टी की जांच सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। संगठन ने 24 जुलाई को बिहार के सीवान में बनाए गए दो वीडियो भी सत्यापित किए हैं। इनमें राज्य पुलिस का एक अधिकारी प्रदर्शनकारियों की ओर AK-टाइप असॉल्ट राइफल से गोली चलाता दिखाई देता है।एमनेस्टी का कहना है कि इस तरह की राइफलें जानलेवा हथियार हैं और प्रदर्शन जैसी स्थिति में इनका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब किसी व्यक्ति की जान या गंभीर चोट का तत्काल खतरा हो और कोई दूसरा विकल्प न बचा हो। संगठन ने कहा कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि उस समय ऐसी स्थिति मौजूद थी। सीवान में कम से कम तीन लोग घायल हुए थे। इनमें एक राहगीर भी शामिल था, जिसके गले में गोली लगी थी।
400 से ज्यादा लोग घायल होने का पुलिस का दावा
दिल्ली पुलिस के अनुसार, 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों समेत 400 से अधिक लोग घायल हुए। पुलिस का कहना है कि शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में भीड़ में असामाजिक तत्व और कथित तौर पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग शामिल हो गए, जिसके बाद स्थिति बिगड़ी और बल प्रयोग करना पड़ा।पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उसने ‘अधिकतम संयम’ बरता और केवल स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जरूरी न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित करने का फैसला भी किया है।
इंटरनेट बंद करने और प्रतिबंधों पर भी सवाल
एमनेस्टी ने प्रदर्शन से पहले प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों को भी मानवाधिकार के नजरिए से सवालों के घेरे में रखा है। संगठन के अनुसार, ‘चलो संसद’ मार्च की अनुमति नहीं दी गई, प्रदर्शन वाले इलाकों में इंटरनेट बंद किया गया, पांच से अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाने के आदेश जारी किए गए, कई दिल्ली मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और मध्य दिल्ली में बैरिकेड लगाए गए।एमनेस्टी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को पहले से अनुमति लेने की शर्त से नहीं बांधा जाना चाहिए। संगठन के अनुसार, यदि किसी तरह की सूचना या नोटिफिकेशन जरूरी हो तो उसका उद्देश्य प्रशासन को प्रदर्शन की व्यवस्था करने में मदद करना होना चाहिए, न कि शांतिपूर्ण सभा को रोकना।
एमनेस्टी ने निष्पक्ष जांच की मांग की
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बोर्ड के अध्यक्ष आकार पटेल ने कहा कि अधिकारियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को सुनिश्चित करने के बजाय पहले संचार बाधित किया, बैरिकेड लगाए और परिवहन व्यवस्था प्रभावित की तथा इसके बाद प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अनावश्यक और अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया।उन्होंने कहा कि एक महीने बाद भी दिल्ली में किसी पुलिस अधिकारी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया है। एमनेस्टी ने भारतीय अधिकारियों से दिल्ली और सिवान में पुलिस द्वारा पेलेट, आंसू गैस, लाठियों, इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों और आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल की तत्काल, निष्पक्ष और प्रभावी जांच कराने तथा उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है। संगठन ने विशेष रूप से बर्डशॉट/पैलेट फायरिंग शॉटगन और सीधे संपर्क वाले इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों का कानून-व्यवस्था में इस्तेमाल तत्काल बंद करने की मांग की है।
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
20 जुलाई के प्रदर्शन पर एमनेस्टी की रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पहले ही न्यायिक जांच के दायरे में है। एक तरफ पुलिस का कहना है कि उसने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम और आवश्यक बल का इस्तेमाल किया, जबकि दूसरी ओर एमनेस्टी की वीडियो-आधारित जांच पैलेट, लाठी, आंसू गैस और इलेक्ट्रिक शॉक उपकरणों के कथित दुरुपयोग की ओर इशारा करती है। अब इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जांच में पुलिस बल के इस्तेमाल को कानून, भारतीय पुलिस दिशानिर्देशों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार के अनुरूप पाया जाता है या नहीं।