जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) ने जेएनयूएसयू अध्यक्ष अदिति मिश्रा और चार अन्य छात्र नेताओं को एक साल के लिए निष्कासित कर दिया है। छात्र नेता नए यूजीसी नियमों के मुद्दे पर बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे, उससे पहले कार्रवाई की गई है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने छात्र संघ (JNUSU) के चार शीर्ष पदाधिकारियों और एक पूर्व अध्यक्ष को एक साल के लिए विश्वविद्यालय से निष्कासित (Rusticate) कर दिया है। यह कार्रवाई पिछले साल नवंबर में डॉ. बी.आर. अंबेडकर सेंट्रल लाइब्रेरी में स्थापित 'फेशियल रिकग्निशन सिस्टम' (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) के विरोध और वहां हुई तोड़फोड़ के मामले में की गई है।
हालांकि, जानकारी के मुताबिक जेएनयू छात्र नेता नए यूजीसी नियमों के समर्थन में बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे। हाल ही में इन नियमों को जब जारी किया गया तो देश में सवर्ण संगठनों ने इनका कड़ा विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और अदालत ने नए नियमों को लागू करने पर रोक लगा दी। कोर्ट के फैसले के खिलाफ देशभर में बहुजन छात्र और उनके संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांग है कि नए यूजीसी नियमों को लागू किया जाए। जेएनयू छात्रसंघ के नेता उसी आंदोलन को दिशा देने की तैयारी में थे। इसकी जानकारी सरकार को मिल गई और जेएनयू प्रशासन ने कार्रवाई कर दी।
जेएनयू के छात्रों ने 3 फरवरी यानी मंगलवार की रात को यूजीसी नियमों के समर्थन में कैंपस के अंदर टार्च की रोशनी में मार्च निकाला था। इस मौके पर जेएनयूएसयू की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा- "हमें इसे मजबूती से इस आंदोलन को बनाए रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि यह हर जगह लागू हो। जब महिलाओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो निर्भया या विशाखा कांड के बाद जैसे दिशानिर्देश जारी किए गए और पास्को अधिनियम जैसे कानून बनाए गए, फिर भी झूठे मामलों की समस्या आती रहती है। पुलिस की भूमिका क्या है? जांच कौन करेगा...। इसलिए यूजीसी के नए नियम जरूरी हैं।"
अदिति ने कहा- "यह मशाल मार्च रोहित वेमुला, पायल ताडवी और दर्शन सुल्तानकी जैसे उन छात्रों के संघर्षों की याद में आयोजित किया गया था, जो विश्वविद्यालयों में शहीद हो गए, जिनकी माताओं ने न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। उस दबाव के चलते, सुप्रीम कोर्च ने यूजीसी को नियम बनाने का निर्देश दिया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः यूजीसी ने इक्विटी विनियम जारी किए..."
नए यूजीसी नियम शिक्षण संस्थाओं में दलितों, ओबीसी छात्रों को प्रताड़ित करने पर रोक लगाने के लिए लाए गए हैं। उसके तहत हर शिक्षण संस्थान में एक कमेटी बनाई जानी है, जहां ऐसे मामलों की सुनवाई होगी। इसमें सवर्ण छात्रों की परिभाषा पर विवाद हो गया। हालांकि नए नियम रोहित वेमुला और पायल तड़वी को कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में प्रताड़ित किए जाने की घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब अपने ही निर्देश के बाद जारी हुए नियमों पर रोक लगा दी। मौजूदा देशव्यापी छात्र आंदोलन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का विरोध है।
किन पर हुई कार्रवाई?
निष्कासित किए गए छात्रों में जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा, उपाध्यक्ष के. गोपिका बाबू, महासचिव सुनील यादव, संयुक्त सचिव दानिश अली और पूर्व अध्यक्ष नीतीश कुमार शामिल हैं। इन सभी छात्र नेताओं का संबंध वामपंथी छात्र संगठनों (AISA, SFI और DSF) से है।
जुर्माना और कैंपस में प्रवेश पर रोक
चीफ प्रॉक्टर एन. जनार्दन राजू द्वारा जारी नोटिस के अनुसार, इन छात्रों पर न केवल एक साल का निष्कासन लगाया गया है, बल्कि प्रत्येक पर 20,000 रुपये का जुर्माना भी किया गया है। साथ ही, इन्हें विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करने से भी रोक दिया गया है। प्रशासन का कहना है कि यदि छात्र जुर्माना भरने में विफल रहते हैं, तो उन्हें एक साल बाद भी वापस आने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
छात्र नेताओं पर क्या हैं आरोप?
विश्वविद्यालय प्रशासन का आरोप है कि 21 नवंबर, 2025 को इन छात्रों ने लाइब्रेरी में लगभग 20 लाख रुपये की लागत से लगाए गए फेशियल रिकग्निशन आधारित एक्सेस गेट्स को नुकसान पहुँचाया था। प्रशासन के मुताबिक, इस घटना के दौरान दो महिला सुरक्षा गार्ड भी घायल हुई थीं।
छात्र संघ और शिक्षकों का विरोध
दूसरी ओर, जेएनयू छात्र संघ ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। छात्र संघ का कहना है कि छात्र केवल अपनी निजता (Privacy) और निगरानी (Surveillance) के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे। उन्होंने प्रशासन पर 'लोकतांत्रिक अधिकारों' पर हमला करने का आरोप लगाया है।
जेएनयू शिक्षक संघ (JNUTA) ने भी इस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे छात्रों को अपराधी बनाने की प्रक्रिया बताया है। शिक्षकों का कहना है कि यह सजा केवल कुछ छात्रों के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे छात्र समुदाय के लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार है।
शिक्षक संगठन ने कहा कि यह कार्रवाई केवल कुछ व्यक्तिगत छात्रों के खिलाफ निर्देशित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय के छात्र समुदाय के सामूहिक लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला है। प्रशासन ने छात्रों पर भारी जुर्माना भी लगाया है और उन्हें दो सेमेस्टर के लिए परिसर में प्रवेश वर्जित घोषित कर दिया है। जेएनयूटीए ने कहा कि यह निर्णय कुलपति शांतिश्री धुलिपुडी पंडित के नेतृत्व में "तानाशाही और कानूनविहीन" कार्यशैली को दर्शाता है। संगठन ने आरोप लगाया कि अनुशासनात्मक उपाय, विशेष रूप से विरोध करने वाले छात्रों पर भारी जुर्माना लगाना, नियमित हो गया है और असहमति को अपराधीकरण करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
संगठन ने कहा, "प्रशासन ने न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद की भूमिका निभा ली है," और उस पर संस्था को भीतर से नष्ट करने और वैध एवं व्यवस्थित कार्य के स्थापित मानदंडों को कमजोर करने का आरोप लगाया। संगठन ने कहा, "प्रशासन ने न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद की भूमिका निभा ली है," और उस पर संस्था को भीतर से ही नष्ट करने और वैध एवं व्यवस्थित कार्य के स्थापित मानदंडों को कमजोर करने का आरोप लगाया। इस बयान में संकाय सदस्यों को प्रभावित करने वाले मनमाने निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला गया, जिसमें पदोन्नति, भर्ती, आवास आवंटन और छुट्टी की मंजूरी से संबंधित चिंताओं के साथ-साथ प्रवेश जैसे व्यापक नीतिगत मुद्दों का हवाला दिया गया।