गिल्ड ने कहा कि इसके नतीजे दूरगामी निकलेंगे। जैसा कि देश में लंबे समय से चल रही साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों से पता चलता है, ज्यादातर घटनाएं वैसी नहीं होतीं, जैसी वो दिखाई देती हैं यानी उनकी सच्चाई कुछ और होती हैं। ऐसे तमाम मामलों में राजनेताओं, पुलिस, अधिकारियों और अन्य गैर सरकारी लोगों की भूमिका के दस्तावेज मौजूद हैं। इसलिए, संपादकों के लिए यह आवश्यक है कि वे उत्तेजना के इस माहौल में अपने अनुभव और दृष्टिकोण को न्यूज़ रूम में लाएं।