Justice Ujjal Bhuyan Collegium transparency- जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि जजों की नियुक्तियों में कॉलेजियम के अंदर वजह सार्वजनिक न करना न्यायपालिका की पारदर्शिता और जनता के भरोसे को कमजोर करता है।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि कॉलेजियम की सिफारिशों में कारणों का उल्लेख न करना न्यायपालिका और जनता दोनों के हितों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यदि नियुक्तियों के पीछे कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते, तो इससे न केवल योग्य जजों के साथ अन्याय होता है, बल्कि ऐसे लोगों के न्यायपालिका में आने की संभावना भी बढ़ जाती है, जो बाद में संविधान-विरोधी टिप्पणियां करते हैं।
(जस्टिस भुइयां ने किसी जज का नाम नहीं लिया। लेकिन उनका इशारा समझा जा सकता है। हाल ही में एक केस की सुनवाई के दौरान कॉकरोच और परजीवी जैसे शब्दों का इस्तेमाल आंदोलनकारियों के लिए हुआ था। देश में आज तक यह चर्चा का विषय है)
शनिवार को कानूनी शोध संस्था विदि (Vidhi) की JALDI Initiative द्वारा तैयार रिपोर्ट "The Judicial Transparency Index: Assessing Disclosure of Information by the Supreme Court and the High Courts" के विमोचन अवसर पर आयोजित पैनल चर्चा में जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी की।
"कारण नहीं बताना योग्य न्यायाधीशों के साथ अन्याय"
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम के फैसलों में कारण दर्ज न करने से उन जजों के उत्कृष्ट कार्यों का उचित मूल्यांकन सामने नहीं आ पाता, जिन्होंने न्यायपालिका में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने कहा, "जब हम कारण नहीं बताते, तो वास्तव में हम कई बेहतरीन जजों के साथ अन्याय करते हैं। दूसरी ओर, इसी अपारदर्शिता के कारण ऐसे लोगों के लिए भी जगह बनती है, जो बाद में पूरी तरह असंवैधानिक और संविधान के मूल्यों के विपरीत फैसलों में टिप्पणियां करते हैं।"इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज के विवादित भाषण का उल्लेख
अपने वक्तव्य में जस्टिस भुइयां ने वर्ष 2024 में एक पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट जज द्वारा विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यक्रम में दिए गए विवादित भाषण का भी जिक्र किया। उस भाषण में मुस्लिम समुदाय पर परोक्ष टिप्पणी करते हुए कहा गया था कि भारत में लोगों को चींटी तक न मारने की शिक्षा दी जाती है, जबकि "आपकी संस्कृति" में बचपन से पशुओं के वध का दृश्य देखने को मिलता है, इसलिए उनसे सहिष्णुता और करुणा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।जस्टिस भुइयां ने ऐसे बयानों को पूरी तरह असंवैधानिक बताते हुए कहा कि न्यायिक नियुक्तियां ठोस विचार-विमर्श और स्पष्ट कारणों के आधार पर होनी चाहिए।
"जानकारीपूर्ण सार्वजनिक बहस से नुकसान क्या है?"
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कॉलेजियम के फैसलों पर तथ्य आधारित सार्वजनिक चर्चा हो, तो इससे नुकसान क्या है। उन्होंने कहा, "जानकारीपूर्ण सार्वजनिक बहस से आखिर क्या हानि होती है?"सौरभ किरपाल का मामला भी उठाया
जस्टिस भुइयां ने वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल की दिल्ली हाई कोर्ट में जज के रूप में नियुक्ति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनकी नियुक्ति की सिफारिश दोहराई थी, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे मंजूरी नहीं दी। उन्होंने कहा, "कॉलेजियम द्वारा दिए गए कारण काफी ठोस और विश्वसनीय थे। कम से कम मैं उन कारणों से पूरी तरह सहमत हूं।"हाल की कॉलेजियम बैठकों में कारण गायबः जस्टिस भुइयां ने कहा कि पहले कॉलेजियम के प्रस्तावों में भले ही संक्षिप्त या एक जैसे कारण लिखे जाते थे, लेकिन कुछ न कुछ आधार जरूर दिया जाता था। उन्होंने कहा कि हाल की तीन कॉलेजियम बैठकों के प्रस्तावों में कोई कारण दर्ज नहीं किया गया। उन्होंने कहा, "मैंने देखा है कि पिछली तीन कॉलेजियम संकल्पों में कोई कारण नहीं दिया गया। क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटने का संकेत है?"
"नागरिकों को जानने का अधिकार"
उन्होंने जोर देकर कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि अदालतों में क्या हो रहा है और उनके न्यायाधीश कौन हैं। न्यायपालिका में जनता का विश्वास तभी मजबूत होगा जब उसकी कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी होगी।सौरभ किरपाल: कारण वास्तविक और वजह स्पष्ट होनी चाहिए
पैनल चर्चा में मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल ने भी जस्टिस भुइयां की राय का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति के पीछे दिए जाने वाले कारण वास्तविक और वजह स्पष्ट होनी चाहिए, केवल औपचारिक या "कॉपी-पेस्ट" नहीं। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को जज बनाया जाता है तो बार और समाज को यह भी बताया जाना चाहिए कि समान योग्यता रखने वाले अन्य लोगों की तुलना में उसी उम्मीदवार को क्यों चुना गया।किरपाल के अनुसार, कारण सार्वजनिक करने से कॉलेजियम के निर्णयों पर भी संस्थागत निगरानी बनी रहेगी और मनमाने फैसलों की संभावना कम होगी।
आदित्य सोंधी: कुछ मामलों में गोपनीयता जरूरी
वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी ने कहा कि कॉलेजियम के निर्णयों में कारणों का उल्लेख स्वागतयोग्य है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी उम्मीदवार की आय जज बनने में बाधा बनती है, तो उसे सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा, क्योंकि मानवाधिकार, श्रम या नागरिक अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले वकीलों की आय अपेक्षाकृत कम हो सकती है, जबकि उनकी योग्यता पर कोई प्रश्न नहीं होता।केंद्र सरकार से भी पारदर्शिता की मांग
आदित्य सोंधी ने यह भी कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की जिम्मेदारी केवल न्यायपालिका की नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि जब कॉलेजियम किसी नाम की दोबारा सिफारिश कर देता है, तब भी यदि केंद्र सरकार वर्षों तक उस फाइल को मंजूरी नहीं देती, तो सरकार को भी इसका कारण सार्वजनिक करना चाहिए।उन्होंने कहा, "यदि हम न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की बात कर रहे हैं, तो सरकार को भी बताना चाहिए कि कॉलेजियम द्वारा दोबारा सिफारिश किए जाने के तीन साल बाद तक भी किसी फाइल को मंजूरी क्यों नहीं मिली।"