शायद, सरकार को ये बात समझ नहीं आती या वह समझना नहीं चाहती कि जो किसान किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं लेकर अपने दम पर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं वे आख़िर क्यों इसमें वामपंथियों या किसी अन्य विचारधारा के लोगों को आने देंगे।
इस तरह के नैरेटिव पिछले कुछ सालों में ही चर्चा में आए हैं। वरना पिछली सरकारों में भी निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए बड़ा आंदोलन हुआ, अन्ना आंदोलन हुआ, सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन हुए तब किसी को यह नहीं कहा गया कि आप खालिस्तानी हो, पाकिस्तानी हो, गद्दार हो, देशद्रोही हो।
बीजेपी के नेताओं, सरकार के मंत्रियों के अपने विरोधियों के लिए ऐसे बयान देना कि वे पाकिस्तानी हैं, खालिस्तानी हैं, देशद्रोही हैं, मोदी सरकार के निकम्मेपन को बताता है। भारत में अगर कोई पाकिस्तानी-खालिस्तानी रह रहा है तो सरकार क्या झक मार रही है?
अगर बीजेपी और मोदी सरकार में कुछ पढ़े-लिखे लोग बैठे हों, तो वे हुक़्मरानों को समझाएं कि ये फसल उगाने वालों का आंदोलन है, ये लोग फसल नहीं उगाएंगे तो दुनिया से अनाज खरीदकर भी 135 करोड़ लोगों का पेट सरकार नहीं भर पाएगी।