लंदन में जजों और वकीलों के बैडमिंटन इवेंट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस इवेंट को भारत के कानून मंत्रालय ने प्रायोजित किया था। सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण से लेकर तमाम लोगों ने सोशल मीडिया पर इस इवेंट को लेकर सवाल उठाए हैं। ये सवाल यूं ही नहीं उठ रहे हैं। पश्चिम एशिया (West Asia) संघर्ष के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट से निपटने के लिए पीएम मोदी ने नागरिकों से फिजूलखर्ची रोकने की अपील की थी। मोदी ने आम लोगों से विदेश यात्राएं न करने की नसीहत भी दी थी। लेकिन लंदन इवेंट को भारत सरकार ने स्पांसर किया, इसलिए अब प्रधानमंत्री की अपील को याद दिलाया जा रहा है। 
यह इवेंट 7 जून को लंदन में हो चुका है। इसका आयोजन पूर्व अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी और डेका इवेंट्स की संस्थापक अबंतिका डेका ने किया था। इस कार्यक्रम को भारत के केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के साथ-साथ कुछ कॉर्पोरेट कंपनियों ने भी प्रायोजित किया था।

लंदन कितनी संख्या में पहुंचे जज और वकील

रिपोर्टों के अनुसार, दूसरी इंटरनेशनल बार एंड बेंच बैडमिंटन चैंपियनशिप (2nd International Bar & Bench Badminton Championship) में भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में भारतीय जज और वकील ब्रिटेन पहुंचे। बताया जा रहा है कि लगभग 150 जजों और वकीलों ने इस इवेंट में हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्घाटन भारत के चीफ जस्टिस (Chief Justice of India) और केंद्रीय कानून मंत्री द्वारा किया गया।

प्रशांत भूषण ने लंदन बैडमिंटन इवेंट पर क्या सवाल उठाए

इस आयोजन को लेकर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने आपत्ति जताई। जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने X पर इस कार्यक्रम की आवश्यकता और औचित्य पर सवाल उठाए। उन्होंने लिखा: "यह आश्चर्यजनक है कि भारतीय न्यायाधीशों और वकीलों के बीच एक बैडमिंटन टूर्नामेंट आज (7 जून) लंदन में कानून मंत्रालय द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है। अन्य प्रायोजकों में कई कॉर्पोरेट कंपनियाँ भी शामिल हैं। इसका उद्घाटन भारत के मुख्य न्यायाधीश और कानून मंत्री द्वारा किया गया है। लगभग 150 जज और वकील इसमें भाग ले रहे हैं। प्रधानमंत्री की मितव्ययिता (फिजूलखर्ची रोकना) की अपील का क्या हुआ? न्यायाधीशों की आचार संहिता का क्या हुआ? न्यायपालिका की स्वतंत्रता का क्या होगा? यह अत्यंत आपत्तिजनक है।"

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने पूछा महत्वपूर्ण सवाल

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी इस आयोजन पर टिप्पणी करते हुए लिखा: "दिलचस्प बात है कि जब राष्ट्रीय राजधानी में भीषण गर्मी पड़ रही है, तब भारतीय जज और वकील लंदन में बैडमिंटन खेल रहे हैं और चीफ जस्टिस मुख्य अतिथि हैं। जाहिर है कि हर किसी को छुट्टी मनाने का अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस यात्रा में करदाताओं (टैक्स पेयर्स) के पैसे का इस्तेमाल किया गया है?"

वरिष्ठ पत्रकार आवेश तिवारी के चुभते सवाल

वरिष्ठ पत्रकार आवेश तिवारी ने इस इवेंट के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है। आवेश ने लिखा है- ऐसा नहीं है कि बार एंड बेंच टूर्नामेंट पहली बार हो रहा है और माननीय लोग पहली बार सरकारी खर्च पर यानि जनता के पैसे से विदेश यात्रा पर गए हैं। दरअसल साल भर से भी कम समय में इसके दो इंटरनेशनल और एक नेशनल इवेंट हो चुका है। पिछले साल अगस्त माह में यह इवेंट फुकेट थाईलैंड में हुआ था फिर नवंबर में दिल्ली में नेशनल टूर्नामेंट खेला गया फिर जज साहबान मिनिस्ट्री के पैसे से लंदन चले गए। करोड़ों का खर्च जज साहबान की गर्मी को कम करने में कर दिया गया। किरण रिजिजू और मेघवाल संसद में जिस तरह से बोलते हैं लगता है सर्वाधिक नैतिक यही हैं और रामराज्य की अगुआई भी यही कर रहे हैं। भाई लोकतंत्र में जजों को सरकारी खर्च से टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए तैयार करना और जजों का तैयार होना दोनों घोर आपत्तिजनक है। 

वकील कमलेश आनंद के सवाल

वकील कमलेश आनंद ने सोशल मीडिया पर लिखा है-  यह कम से कम दो वजहों से बहुत निराशाजनक और अपमानजनक है- 1. जजों की छुट्टियों पर जनता का पैसा खर्च किया जाता है (मानो उनकी सैलरी कम हो) और 2. इससे न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच ज़रूरत से ज़्यादा करीबी संबंध दिखाई देते हैं।

आम आदमी पार्टी ने भी उठाए सवाल

आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़े सौमिक सेनगुप्ता ने भी सोशल मीडिया पर इस आयोजन की आलोचना की। उन्होंने लिखा: "जब आम नागरिकों को लगातार फिजूलखर्ची रोकने, वित्तीय अनुशासन, त्याग और राष्ट्र निर्माण का पाठ पढ़ाया जा रहा है, तब भारतीय जज और वकील कानून मंत्रालय और कॉर्पोरेट कंपनियों के पैसे से बैडमिंटन टूर्नामेंट खेलने लंदन जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि मितव्ययिता केवल आम टैक्सपेयर्स के लिए है। नियम, नैतिकता, खर्चों में कटौती और कम संसाधनों में अधिक काम करने की सलाह सिर्फ जनता के लिए है। जबकि राजनेता, नौकरशाह, जज, वरिष्ठ वकील और अन्य वीआईपी वर्ग किसी अलग नियम के तहत काम करते दिखाई देते हैं।"

प्रधानमंत्री मोदी की फिजूलखर्ची रोकने की अपील क्या थी

पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से पैदा ऊर्जा संकट के प्रभावों को कम करने के लिए नागरिकों के सामने एक "सात सूत्रीय कार्यक्रम" रखने का सुझाव दिया था। प्रधानमंत्री ने लोगों से निम्नलिखित कदम उठाने की अपील की थी:
  • विदेश यात्राओं को टालना या रद्द करना।
  • डेस्टिनेशन वेडिंग (विदेश या दूरस्थ स्थानों पर होने वाली शादियों) से बचना।
  • कम से कम एक वर्ष तक गोल्ड की खरीदारी को टालना।
  • जहाँ संभव हो, वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) को बढ़ावा देना।
  • उर्वरकों (फर्टिलाइज़र) के उपयोग में 50 प्रतिशत तक कमी लाना।
  • खाद्य तेलों की खपत कम करना।
  • कारपूलिंग, सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को प्रोत्साहित करना।
  • स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देना।

पीएम मोदी की अपील का असर क्या हुआ

पीएम मोदी की इस अपील का बहुत असर हुआ। तमाम केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद-विधायक, जज आदि साइकल, ईरिक्शा, मेट्रो और पैदल नज़र आने लगे। केंद्रीय कानून मंत्री को ईरिक्शा से सफर करते देखा गया। सांसद हेमामालिनी को ऑटो में जाते देखा गया और कुछ देर बाद प्राइवेट वाहन में सवार होते देखा गया। दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा को मेट्रो में जाते देखा गया। कई जज साइकिल चलाते हुए अदालतों में जाते देखा गया। बिहार के सीएम सम्राट चौधरी को पैदल चलते देखा गया। लेकिन बीजेपी के सारे नेताओं का इस तरह सवारी करना नाटक साबित हुआ, क्योंकि, ईरिक्शा, ऑटो, साइकल पर चलाना फोटो खिंचवाने तक सीमित रहा और उसके बाद वो अपने निजी वाहनों में सवार हो गए। प्रधानमंत्री खुद भी इस तरह की नसीहत देने के बाद पांच देशों की यात्रा पर चले गए थे। जिसमें उनकी इटली यात्रा और इटली के पीएम जार्जिया मेलोनी से मुलाकात का फोटो और वीडियो काफी चर्चा में रहा था।
आलोचकों का कहना है कि जब सरकार आम नागरिकों से खर्चों में कटौती, विदेशी यात्राओं से परहेज़ और संसाधनों के संयमित उपयोग की अपील कर रही है, तब सरकारी प्रायोजन से विदेश में आयोजित ऐसे कार्यक्रम स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करते हैं। विशेष रूप से तब, जब इसमें न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्य और बड़ी संख्या में वकील शामिल हों। हालाँकि आयोजन के समर्थकों का तर्क है कि यह एक पेशेवर एवं खेलकूद संबंधी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम Le, जिसका उद्देश्य न्यायिक और कानूनी समुदाय के बीच संवाद और सहभागिता को बढ़ावा देना था। फिर भी, सरकारी प्रायोजन, कॉर्पोरेट भागीदारी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों ने इस आयोजन को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है।