अमेरिका और पाकिस्तान का संयुक्त सैन्य अभ्यास 'इंस्पायर्ड गैम्बिट 2026' खत्म हो गया। लेकिन भारत को बड़ा संकेत दे दिया है। कांग्रेस ने इसे पीएम मोदी की कूटनीति के लिए बड़ा झटका बताया है। ईरान में चाबहार पोर्ट को लेकर नई अनिश्चितताएं पहले से ही हैं।
यूएस पाकिस्तान की सेना ने संयुक्त अभ्यास किया
अमेरिका और पाकिस्तान का संयुक्त सैन्य अभ्यास पूरा होने के बाद कांग्रेस ने इसे मोदी सरकार की विदेश नीति के लिए बड़ा सेटबैक बताया है।
अमेरिकी और पाकिस्तानी सैनिकों ने ‘Inspired Gambit 2026’ नामक दो-सप्ताह के संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास को 8 जनवरी से 16 जनवरी तक पब्बी (पाकिस्तान) में पूरा किया। इस अभ्यास का मुख्य फोकस संयुक्त इन्फैंट्री स्किल, टैक्टिकल कोऑर्डिनेशन और आतंकवाद-विरोधी संचालन रहा। यूएस सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) के बयान के मुताबिक ऐसे अभ्यास पाकिस्तान के साथ रक्षा सम्बन्धों को मजबूत करते हैं और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को भी बढ़ाते हैं।
कांग्रेस ने इस संयुक्त अभ्यास पर मोदी सरकार को निशाना बनाया। पार्टी के महासचिव और संचार प्रमुख जयराम रमेश ने कहा कि यह मोदी सरकार की आत्मघोषित विश्वगुरु कूटनीति को एक और बड़ा झटका है। जयराम रमेश ने याद दिलाया कि जून 2025 में अमेरिका सेंट्रल कमांड प्रमुख ने पाकिस्तान को आतंक-विरोधी क्षेत्र में “अद्भुत साझेदार” बताया था। उसके बाद उसने पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास किया। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तारीफ कई बार की है। लेकिन भारत में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवादी हमलों के संदर्भ में मुनीर नाम सामने है।
विश्लेषकों का कहना है कि चाबहार के बाद यह भारत-अमेरिका संबंधों में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा बन गया है, क्योंकि इससे भारत की क्षेत्रीय रणनीति, विशेषकर पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने की नीति पर प्रभाव पड़ रहा है।
चाबहार का घटनाक्रम और भारत की प्रतिक्रिया
भारत के लिए चाबहार पोर्ट (ईरान) एक रणनीतिक महत्वपूर्ण परियोजना है जो अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पाकिस्तान को बायपास करते हुए सीधे समुद्री मार्ग उपलब्ध कराती है। इसे इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का अहम हिस्सा माना जाता है। लेकिन भारत के इस परियोजना से बाहर निकलने की खबरें मीडिया में हैं। इसकी वजह बताई गई है कि अमेरिका ने चाबहार पोर्ट पर दिए गए प्रतिबंध छूट (sanctions waiver) को अप्रैल 2026 के बाद समाप्त करने की घोषणा की है, जिससे भारत को प्रोजेक्ट पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
भारत अभी भी अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है ताकि इस छूट व्यवस्था को बनाए रखा जा सके और अपने हित सुरक्षित रखे जा सकें। MEA ने कहा है कि वह संयुक्त रूप से समाधान निकालने की कोशिश कर रहा है ताकि भारत चाबहार पोर्ट पर अपनी भागीदारी जारी रख सके।
साथ ही भारत अपनी मौजूदगी की रक्षा के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएँ तलाश रहा है, जैसे कि पोर्ट संचालन के लिए स्थानीय इकाई के साथ समझौता, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों में फँसे बिना भारत की भूमिका बनी रहे।
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि चाबहार प्रोजेक्ट से पूरी तरह निकलना “विकल्प नहीं है” और वह संलग्न देशों के साथ रणनीतिक बातचीत कर रहा है कि प्रोजेक्ट को कैसे संचालित किया जाए।
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने चाबहार पर यूएस राष्ट्रपति के आगे सरेंडर कर दिया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने कहा कि चाबहार कोई साधारण बंदरगाह नहीं है। यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से एक महत्वपूर्ण, सीधा समुद्री संपर्क प्रदान करता है, जिससे हम पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का मुकाबला कर सकते हैं। अब यह सुनकर कि भारत ने अमेरिका के दबाव के पहले संकेत पर ही चाबहार से बिना किसी औपचारिकता के पीछे हट गया है, इस सरकार की विदेश नीति में एक नया निम्न स्तर दिखता है। भारत सरकार कब तक वाशिंगटन को हमारे राष्ट्रीय हितों को निर्धारित करने देगी? इसलिए सवाल चाबहार बंदरगाह या रूसी तेल का नहीं है। सवाल यह है: मोदी अमेरिका को भारत पर दबाव डालने की अनुमति क्यों दे रहे हैं?