सुप्रीम कोर्ट जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए कथित तौर पर फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी और बायोमेट्रिक सर्विलांस के इस्तेमाल की वैधता की जाँच करेगा। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बड़े पैमाने पर फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी से निगरानी रखी गई, जिससे उनके निजता के अधिकार, गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने दायर की है। इसमें दिल्ली पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित रूप से फेशियल रिकग्निशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी और बायोमेट्रिक पहचान तकनीकों के इस्तेमाल को चुनौती दी गई है।
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याचिकाकर्ता ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किया और इससे जुटाया गया डेटा निजी कंपनियों के पास रखा गया।

उन्होंने कहा कि निगरानी के लिए विशेष वाहनों और स्मार्ट ग्लास जैसी तकनीकों का उपयोग किया गया तथा लोगों की अनुमति के बिना उनका बायोमेट्रिक डेटा जुटाया गया। उनका दावा है कि यह प्रक्रिया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन यानी डीपीडीपी नियमों, आपराधिक प्रक्रिया कानून और अन्य कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने फेशियल रिकग्निशन से जुड़ी इस याचिका को 20 जुलाई के 'संसद चलो' प्रदर्शन से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ने का फ़ैसला किया है। इन अन्य याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कथित कार्रवाई, पैलेट गन के इस्तेमाल और हिंसा के आरोपों की भी सुनवाई हो रही है।

याचिका के अनुसार 20 जून से जंतर मंतर पर शुरू हुए धरने के दौरान हजारों प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और आम नागरिकों की लगातार बायोमेट्रिक निगरानी की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह निगरानी कई माध्यमों से की गई, जिनमें सीसीटीवी कैमरे, ड्रोन, मोबाइल कमांड एंड कंट्रोल वाहन, हैंडहेल्ड डिवाइस, 'इक्षणा' नाम का फेशियल रिकग्निशन वाहन, 'AjnaLens' स्मार्ट ग्लास, उंगलियों के निशान लेने के लिए एनसीआरबी का 'अभिज्ञान' ऐप शामिल हैं। याचिका में आरोप है कि इन बायोमेट्रिक जानकारियों का मिलान नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम यानी NAFIS जैसे राष्ट्रीय डेटाबेस से भी किया गया।

क्या मांग की गई है?

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई निर्देश देने की मांग की गई है। इनमें प्रमुख मांगें हैं-
  • शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर फेशियल रिकग्निशन और बायोमेट्रिक निगरानी को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
  • संसद जब तक इस संबंध में स्पष्ट कानून नहीं बनाती, तब तक दिल्ली पुलिस को ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल से रोका जाए।
  • प्रदर्शन के दौरान जुटाया गया बायोमेट्रिक डेटा NAFIS, CCTNS और अन्य सरकारी डेटाबेस से हटाया जाए।
  • लोगों को यह जानने का अधिकार मिले कि उनका बायोमेट्रिक डेटा जुटाया गया या नहीं।
  • यदि डेटा लिया गया है तो उसे हटाने की व्यवस्था बनाई जाए।
  • निजी कंपनियों को भी निर्देश दिए जाएं कि वे प्रदर्शनकारियों का डेटा स्थायी रूप से डिलीट करें और उसका उपयोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या फेशियल रिकग्निशन सिस्टम को प्रशिक्षित करने में न करें।

कानूनी आधार पर भी उठाए सवाल

याचिका में कहा गया है कि भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों की बायोमेट्रिक निगरानी की अनुमति देता हो। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दिल्ली पुलिस के प्रदर्शन संबंधी नियमों में ऐसी निगरानी का प्रावधान नहीं है। इसमें यह भी कहा गया है कि आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर इस तरह की तकनीक लागू करने की अनुमति नहीं देता। याचिका में तर्क दिया गया है कि सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत मिली जानकारी के अनुसार, इस निगरानी से पहले कोई प्राइवेसी इम्पैक्ट असेसमेंट नहीं किया गया।

निजता और अभिव्यक्ति की आज़ादी का हवाला

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के के.एस. पुट्टास्वामी फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी भी तरह की निगरानी तभी वैध मानी जा सकती है जब वह क़ानून के तहत हो, उसका वैध उद्देश्य हो और वह आवश्यक हो। याचिकाकर्ता का कहना है कि बड़े पैमाने पर फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल लोगों में डर का माहौल पैदा करता है और इससे नागरिक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से बच सकते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार को प्रभावित करता है।

निजी कंपनियों को भी बनाया पक्ष

इस जनहित याचिका में दो निजी कंपनियों को भी पक्षकार बनाया गया है। याचिका के अनुसार आदित्य इंफोटेक लिमिटेड ने कथित रूप से 'Ikshana' फेशियल रिकग्निशन वाहन उपलब्ध कराया। डाइमेंशन एनएक्सजी प्राइवेट लिमिटेड ने 'AjnaLens' स्मार्ट ग्लास उपलब्ध कराए। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि इन कंपनियों के पास प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें, फेशियल टेम्पलेट और अन्य संवेदनशील बायोमेट्रिक जानकारी अब भी हो सकती है। साथ ही यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या इन कंपनियों और पुलिस के बीच डेटा साझा करने के लिए कोई कानूनी समझौता या सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी।

अब सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष सुनने के बाद तय करेगा कि जंतर मंतर प्रदर्शन के दौरान फेशियल रिकग्निशन और बायोमेट्रिक निगरानी का इस्तेमाल कानून और संविधान के अनुरूप था या नहीं।