मतदाता सूचियों की विशेष गहन संशोधन यानी एसआईआर के दूसरे चरण में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा नाम काटे गए हैं। दूसरे चरण में मतदाताओं की फाइनल सूची प्रकाशित होने के बाद नौ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल मतदाताओं की संख्या क़रीब 8% कम हो गई है। यानी 1.7 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं। एक वोट से जीत-हार तय होने वाले चुनावों में इतने मतदाता कितना असर डाल सकते हैं, इसका अंदाज़ा भर लगाया जा सकता है।

27 अक्टूबर 2025 को एसआईआर शुरू होने पर इन नौ राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों- गुजरात, छत्तीसगढ़, गोवा, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुल मतदाता 21.45 करोड़ थे। अब अंतिम मतदाता सूची में यह संख्या घटकर 19.75 करोड़ रह गई है। कुल 1.70 करोड़ 28 हजार 514 नाम हटाए गए, जो 7.93% की कमी है। इसमें नए मतदाताओं को जोड़ा भी गया है, लेकिन चुनाव आयोग के अनुसार अयोग्य, मृत, प्रवासी या डुप्लिकेट नामों को हटाने से कुल संख्या घटी है।
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सबसे ज्यादा कटौती गुजरात में क्यों?

  • बीजेपी शासित गुजरात में सबसे ज्यादा नामों की कटौती हुई है। राज्य में 13.40% या 68.12 लाख नाम हटे। पहले 5.08 करोड़ मतदाता थे, अब 4.40 करोड़ सिर्फ़ रह गए।
  • वाम शासित केरल में सबसे कम कटौती सिर्फ 3.22% या 8.97 लाख नाम हटे।
  • केंद्रशासित प्रदेशों में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे ज्यादा 16.87% यानी करीब 52 हजार नाम हटे।
  • लक्षद्वीप में सबसे कम 0.36% कटौती हुई।

अन्य राज्यों की स्थिति

  • छत्तीसगढ़: 11.77% कमी यानी करीब 25 लाख नाम हटे।
  • मध्य प्रदेश: 5.97% कमी यानी करीब 34 लाख नाम हटे
  • राजस्थान: 5.74% कमी यानी करीब 31 लाख नाम हटे
  • गोवा: 10.75% कमी
  • पुडुचेरी: 7.57% कमी

छत्तीसगढ़, गोवा, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और अंडमान-निकोबार की शनिवार को अंतिम सूचियां जारी की गईं। गुजरात की 17 फरवरी, पुडुचेरी और लक्षद्वीप की 14 फरवरी को जारी हुई थीं।

बाकी राज्यों की स्थिति

तमिलनाडु की अंतिम सूची 23 फरवरी को आएगी। उत्तर प्रदेश की 10 अप्रैल को आएगी। यूपी में भी कई बार तारीख बढ़ाई गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पश्चिम बंगाल की सूची 28 फरवरी को आएगी, वह भी पूरी एक साथ नहीं। वोटर लिस्ट की फाइनल पब्लिकेशन के बारे में कोर्ट ने कहा कि जहां तक प्रोसेस पूरा हो चुका है, उसे 28 फरवरी को समय पर पब्लिश किया जाए। बाकी हिस्से को सप्लीमेंट्री लिस्ट के रूप में बाद में जारी किया जा सकता है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर पर न्यायिक निगरानी लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच भरोसे की कमी है, इसलिए अब कोई और रास्ता नहीं बचा। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर्विस में रहने वाले या रिटायर्ड एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज लेवल के जजों को नियुक्त करें, जो एसआईआर के बाक़ी काम संभालें।
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एसआईआर क्या है और क्यों हो रहा है?

एसआईआर सामान्य सालाना संशोधन से अलग है। इसमें मतदाताओं से नए फॉर्म भरवाए जाते हैं और कुछ को नागरिकता जैसे दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं। इसका मक़सद मतदाता सूची को साफ-सुथरा और सटीक बनाना है। पहले चरण में बिहार में पिछले साल एसआईआर से 6% नाम हटे थे।

यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच विवाद था, जिसे कोर्ट ने सुलझाया और जजों को इसमें शामिल किया।

सही नाम काटे जाने के आरोप

विपक्षी दल एसआईआर के नाम पर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के नाम काटे जाने के आरोप लगा रहे हैं। चाहे वह, पश्चिम बंगाल हो या फिर, गुजरात, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, या फिर कोई अन्य राज्य। कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल आरोप लगाते रहे हैं कि कुछ जगहों पर मुस्लिम वोटरों के नाम ज्यादा हटाए गए या नाम हटाने की अर्जी फॉर्म 7 का गलत इस्तेमाल हुआ। लेकिन चुनाव आयोग का कहना है कि यह सिर्फ साफ-सफाई का काम है। कोई योग्य वोटर बाहर नहीं होना चाहिए और कोई गलत नाम नहीं रहना चाहिए।
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सवाल है कि क्या योग्य मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया गया है? फॉर्म 7 के ग़लत इस्तेमाल का आरोप लगातार लगता रहा है। कई राज्यों में ऐसे मामले आए जहाँ जिंदा लोगों को मृत बताकर नाम काटने के लिए फॉर्म 7 भर दिया गया। लेकिन लोग सबूतों के साथ पहुँच गए कि वे ज़िंदा हैं।

चुनाव आयोग का बयान

चुनाव आयोग ने कहा है कि मतदाता सूची अपडेट करना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। नाम जोड़ने, हटाने या बदलाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख तक फॉर्म भरे जा सकते हैं। बाकी 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर की तैयारी जल्द शुरू होगी जो अप्रैल 2026 से संभावित है।