सोनिया गांधी के लेख की खास बातें

  • सोनिया गांधी ने कहा कि खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी उसकी विदेश नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।
  • उन्होंने कहा कि किसी विदेशी नेता की टारगेट हत्या अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और सिद्धांतों को कमजोर करती है।
  • सोनिया गांधी ने अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर सरकार के रुख पर चर्चा के लिए संसद में बिना टालमटोल बहस की मांग की है।

कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या पर चुप्पी साधने के लिए तीखी आलोचना की है। उन्होंने इसे 'तटस्थता' नहीं, बल्कि 'कर्तव्य से पलायन' (abdication) करार दिया और कहा कि इससे भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

सोनिया गांधी ने द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में लिखा कि 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर सैयद अली हुसैनी खामेनेई की 28 फरवरी (शनिवार) को अमेरिका और इसराइल द्वारा किए गए टारगेट हमलों में हत्या कर दी गई। उन्होंने कहा, "ईरान-अमेरिका बातचीत के बीच एक राज्य प्रमुख की हत्या समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में गंभीर दरार पैदा कर गई है।"

उन्होंने मोदी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा, "भारत सरकार ने इस हत्या की निंदा करने या ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई टिप्पणी करने से परहेज किया है।" उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख पर हमला करते हुए लिखा कि पीएम ने ईरान के यूएई पर जवाबी हमले की निंदा की, लेकिन उससे पहले हुए अमेरिका-इसराइल हमलों को नजरअंदाज किया। बाद में मोदी ने 'गहरी चिंता' और 'संवाद व कूटनीति' की बात की, जो पहले से चल रही थी।

सोनिया गांधी ने कहा, "जब विदेशी नेता की टारगेट हत्या पर हमारा देश संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट बचाव नहीं करता और निष्पक्षता छोड़ देता है, तो इससे हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा होता है। इस मामले में चुप्पी तटस्थ नहीं है।"

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का हवाला देते हुए कहा कि यह किसी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग को प्रतिबंधित करता है। ऐसी घटनाएं सामान्य कैसे हो सकती हैं। क्या यूएन सिद्धांतों के संदर्भ में इस घटन पर आपत्ति नहीं होना चाहिए।

पीएम मोदी की हालिया इसराइल यात्रा (25-26 फरवरी 2026) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हत्या से महज 48 घंटे पहले पीएम ने बेंजामिन नेतन्याहू सरकार के प्रति स्पष्ट समर्थन दोहराया, जबकि ग़ज़ा संघर्ष में नागरिकों, खासकर महिलाओं और बच्चों की मौतों पर वैश्विक आक्रोश है। यह नैतिक स्पष्टता की कमी दर्शाता है।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद किया। अप्रैल 2001 में तेहरान यात्रा के दौरान वाजपेयी ने भारत-ईरान के बहुत पुराने और समकालीन संबंधों को दोहराया था। 1998-2004 को भारत-ईरान संबंधों का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, जिसमें तेहरान घोषणा और चाबहार पोर्ट सहयोग शामिल था। सोनिया गांधी ने कहा कि वर्तमान सरकार को यह सब प्रासंगिक नहीं लगता।

वाजपेयी ने 2001 में ईरान का दौरा किया और तेहरान घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी 2003 के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि थे, और नई दिल्ली घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने प्रधानमंत्री वाजपेयी के नेतृत्व में भारत से ऊर्जा सहयोग का रास्ता साफ किया।
उन्होंने कहा कि भारत के इसराइल के साथ रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी में बढ़ते संबंधों के बावजूद, दोनों देशों (ईरान और इसराइल) से संबंध होने के कारण भारत के पास संयम बरतने की अपील करने की कूटनीतिक जगह है, लेकिन यह विश्वसनीयता पर निर्भर है। यह रणनीतिक आवश्यकता है, क्योंकि खाड़ी में लगभग 1 करोड़ भारतीय काम करते हैं। अतीत में (गल्फ वॉर, यमन, इराक, सीरिया) भारत की नागरिकों की सुरक्षा इस स्वतंत्र भूमिका पर टिकी थी, न कि किसी प्रॉक्सी की।

उन्होंने कहा कि "इस घटना के परिणाम जियो पॉलिटिक्स से परे हैं। इस त्रासदी की लहरें कई महाद्वीपों में दिखाई दे रही हैं। और भारत का रुख इस त्रासदी का मौन समर्थन करने का संकेत दे रहा है।"
सोनिया गांधी ने ईरानी धरती पर बमबारी और टारगेट हत्याओं की स्पष्ट निंदा की है, इसे खतरनाक बताया है। सोनिया गांधी ने मांग की कि जब संसद का बजट सत्र का दूसरा हिस्सा इस महीने शुरू होगा, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के टूटने पर सरकार की 'चिंताजनक चुप्पी' पर खुली बहस हो, बिना टालमटोल के।

उन्होंने कहा कि हमें 'नैतिक शक्ति' को फिर से खोजना होगा और इसे स्पष्टता व प्रतिबद्धता से व्यक्त करना होगा।