चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा, "पुरुष SSC अधिकारी यह उम्मीद नहीं कर सकते कि स्थायी कमीशन केवल पुरुषों तक ही सीमित रहेगा। महिला SSC अधिकारियों को स्थायी कमीशन से वंचित रखना मूल्यांकन की जड़ में बसी भेदभावपूर्ण व्यवस्था का नतीजा है।"
कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों का मूल्यांकन दोषपूर्ण और भेदभावपूर्ण ढांचे के तहत किया गया, जिसमें मनमाना कैप (सीमा) और अनुचित मूल्यांकन प्रक्रिया शामिल थी। सालाना 250 महिला अधिकारियों की सीमा को कोर्ट ने मनमाना करार दिया और कहा कि इसे पवित्र नहीं माना जा सकता।

मूल्यांकन प्रक्रिया में गंभीर खामियां

पीठ ने वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACRs) के मूल्यांकन में गंभीर खामियां पाईं। कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारियों की ACRs लापरवाही से तैयार की गईं, बिना उचित मनन के और इस पूर्वधारणा पर कि वे कभी स्थायी कमीशन की पात्र नहीं होंगी। इससे उनकी तुलनात्मक योग्यता का ध्यान नहीं रखा गया और वे पुरुष समकक्षों की तुलना में नुकसान में रह गईं।
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कोर्ट ने टिप्पणी की, "महिला अधिकारियों की ACRs इस धारणा के साथ तैयार की गईं कि वे कभी स्थायी कमीशन की पात्र नहीं होंगी। इससे उनका मूल्यांकन प्रभावित हुआ। मानदंडों ने उन्हें पुरुष से बराबरी की तुलना में नुकसान पहुंचाया। ACRs कभी भी सारी प्वाइंट्स पर तुलनात्मक योग्यता को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गईं।"

पेंशन का प्रावधान

कोर्ट ने 2019, 2020 और 2021 के सिलेक्शन बोर्डों के माध्यम से दिए गए स्थायी कमीशन को बरकरार रखा। एक बारगी उपाय के तौर पर, इन बोर्डों में विचाराधीन सभी SSC अधिकारियों (जिन्हें अयोग्य घोषित किया गया हो, उनको भी) को 20 वर्ष की योग्य सेवा पूरी मान ली जाएगी। उन्हें पेंशन और अन्य परिणामी लाभ मिलेंगे, सिवाय बकाया वेतन के। यह पेंशन 20 वर्ष की काल्पनिक सेवा के आधार पर 1 नवंबर 2025 से तय की जाएगी। हालांकि, यह उपाय जज एडवोकेट जनरल (JAG) और आर्मी एजुकेशन कोर (AEC) कैडर की महिला SSC अधिकारियों पर लागू नहीं होगा।
नौसेना के मामले में, एक बारगी उपाय के तहत पात्र महिला अधिकारियों को मेडिकल फिटनेस के अधीन स्थायी कमीशन दिया जाएगा। 2009 के बाद भर्ती हुई महिला अधिकारियों को भी स्थायी कमीशन का अधिकार होगा। कोर्ट ने नौसेना के 'डायनामिक वैकेंसी मॉडल' को तर्कसंगत और गैर-मनमाना माना।

पारदर्शिता की कमी पर चिंताः कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय और नौसेना की आलोचना की कि उन्होंने चयन मानदंड और अंक सार्वजनिक नहीं किए, जिससे खासकर पुरुष अधिकारियों के मामले में जटिलताएं पैदा हुईं।

आगे के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सशस्त्र बलों में मूल्यांकन पद्धति और ACR प्रणाली की व्यापक समीक्षा का निर्देश दिया ताकि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद स्थायी कमीशन के पात्र बनी महिला अधिकारियों पर किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। कोर्ट का उद्देश्य था कि पिछला भेदभाव आगे महिला अधिकारियों के करियर को नुकसान न पहुंचाए।
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यह फैसला सशस्त्र बलों में लिंग समानता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे हजारों महिला SSC अधिकारियों को राहत मिलने की उम्मीद है और भविष्य में मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनेगी।