सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग (ईसीआई) के स्वतंत्र कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए कानून न बना पाने पर लगातार सरकारों की विफलता पर अफसोस जताया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने याचिकाकर्ता संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण से पूछा- “बरनवाल जजमेंट से पहले संसद ने कानून क्यों नहीं बनाया?”
अदालत 2023 के अपने फैसले अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार एवं अन्य का जिक्र कर रही थी, जिसमें चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को शामिल किया गया था। अदालत के सवाल के जवाब में भूषण ने कहा कि हर सरकार ने चुनाव आयोग की आज़ादी के लिए कानून न होने का फायदा उठाया। उन्होंने कहा- “क्योंकि हर सरकार ने इसका फायदा उठाया। ताकि नियुक्तियों में नियमों का दुरुपयोग किया जा सके। जब लोग विपक्ष में होते है, तब वे चुनाव आयोग की आज़ादी की मांग करते है, लेकिन सत्ता में आने के बाद वो इसकी चिंता करना छोड़ देते हैं।”
इस पर जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की, “मुझे ‘गैर-निर्वाचितों की तानाशाही’ वाली बात याद आ रही है। इसकी तुलना ‘चुने गए लोगों की तानाशाही’ से की जानी चाहिए।” इसमें जस्टिस शर्मा ने जोड़ा, “बहुमत की तानाशाही।” जस्टिस दत्ता ने आगे कहा- “जो भी सत्ता में आता है, वही काम करता है। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। मैंने डॉ. आंबेडकर पर बीबीसी का एक वीडियो देखा था। संविधान लागू होने के तीन साल के भीतर उन्होंने कहा था कि इस देश में लोकतंत्र काम नहीं कर रहा है।”
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इसके बाद भूषण ने कहा, “कई समस्याएं हैं। इस अदालत ने व्यवस्था सुधारने के लिए बहुत प्रयास किए। विपक्ष में रहते हुए वे इसकी बात करते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही भूल जाते हैं।” अदालत ने इससे सहमति जताते हुए कहा, “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण।” अदालत में दायर याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती दी गई है।
इस कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता वाली चयन समिति अधिकृत है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह कानून स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन है क्योंकि इसमें चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए “स्वतंत्र तंत्र” नहीं दिया गया है। याचिका में कहा गया है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार फैसले का उल्लंघन है क्योंकि इसमें चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया से सीजेआई को बाहर कर दिया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर प्रधानमंत्री और उनके नामित सदस्य ही नियुक्तियों में हमेशा “निर्णायक” बने रहेंगे तो इससे सुप्रीम कोर्ट का फैसला (बरनवाल जजमेंट) कमज़ोर पड़ जाएगा। भारत के चुनाव आयोग को पूरी आज़ादी मिलना चाहिए। उसे इससे निकाला जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि बरनवाल जजमेंट में तय की गई व्यवस्था संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक के लिए एक अस्थायी व्यवस्था थी। उसने कहा- “अनूप बरनवाल फैसला अंतरिम अवधि के लिए था, जब तक संसद कानून न बना दे। क्या फैसले में कहीं यह कहा गया था कि संसद जब कानून बनाए तो हमारी टिप्पणियों को ध्यान में रखे? वे ऐसा कह सकते थे। चयन समिति में सीजेआई की मौजूदगी केवल उस समय तक के लिए थी जब तक कोई व्यवस्था नहीं थी…।” लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सिद्धांत रूप में सीजेआई को सरकार की चयन समिति में रखा जाना चाहिए था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने जवाब दिया, “लेकिन यही संवैधानिक ढांचा है… मैं यह नहीं कह रहा कि अदालत कानून बनाए। लेकिन जब कानून बनता है तो अदालत यह जांचती है कि संवैधानिक मानकों का पालन करता है या नहीं। बरनवाल जजमेंट सिर्फ चयन समिति के ढांचे की बात नहीं करता, उसने यह भी कहा कि संवैधानिक ज़रूरत क्या है।” इस बहस में हस्तक्षेप करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने कहा, “जब यह विधेयक पारित हुआ, तब विपक्ष के 141 सांसद निलंबित थे।”
अदालत ने कहा, “अधिनियम की धारा 7 और 8 की वैधता को चुनौती देने वाली कोई स्पष्ट दलील नहीं है। फरासत का यह दावा कि इतने सदस्य मौजूद नहीं थे, वह किस याचिका में है?” फरासत ने कहा कि यह उनकी याचिका में है। प्रशांत भूषण ने भी कहा कि यह बात उनकी याचिका में दर्ज है।
जब हंसरिया ने चयन समिति पर एक अन्य फैसले का हवाला दिया, तो अदालत ने कहा, “फैसले में कहीं यह नहीं कहा गया कि कानून किसी विशेष तरीके से बनाया जाए। अगर पांच-न्यायाधीशों की पीठ (अनूप बरनवाल में) यह कहती कि कानून बनाते समय संसद को हमारे फैसले को ध्यान में रखना चाहिए, तब बात अलग होती। लेकिन ऐसा भी नहीं कहा गया।” इस पर हंसरिया ने कहा, “संवैधानिक आवश्यकता एक स्वतंत्र चुनाव आयोग की है। पहले राष्ट्रपति कैबिनेट की सलाह पर नियुक्ति करते थे। अब केवल प्रधानमंत्री… अब कैबिनेट को भी हटा दिया गया। क्या यह कॉलेजियम है?”
अदालत ने फिर कहा, “धारा 6 सर्च कमेटी से संबंधित है। कानून की यह आवश्यकता नहीं है कि सर्च कमेटी सभी नाम चयन समिति को भेजे। लेकिन आपने कहा कि 200 नाम भेजे गए आदि।” 

हंसरिया ने जवाब दिया, “सरकार विधि विभाग के सचिव ने 200 नाम भेजे थे, यह कहते हुए कि चयन समिति ने नाम अंतिम नहीं किए हैं। उसी दिन जब बैठक हुई, सर्च कमेटी ने छह नाम भेजे, जिनमें ज्ञानेश कुमार और एक अन्य सज्जन का नाम शामिल था। इसका मतलब है कि स्क्रीनिंग हुई और उसी दिन बैठक भी कर ली गई।”

इस पर अदालत ने टिप्पणी की, “काश जजों की नियुक्ति में भी यही तेजी बनी रहे। चुनाव आयुक्त सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर हैं।”  हंसरिया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने 14 मार्च 2024 को दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति इसलिए जल्दबाजी में की क्योंकि उसे पता था कि अगले दिन यानी 15 मार्च को सुप्रीम कोर्ट इस नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने वाला है।
अदालत ने पूछा कि क्या वास्तव में प्रक्रिया में जल्दबाजी हुई थी। “क्या आप यह कहे बिना कोई आरोप लगा सकते हैं कि केंद्र सरकार को पता था कि मामला 15 तारीख को आएगा? आप यह कह रहे हैं कि 15 मार्च को स्थगन आवेदन पर सुनवाई होने की जानकारी उन्हें थी और उसी को विफल करने के लिए 14 मार्च को बैठक की गई। जब आप यह तर्क दे रहे हैं, तो आपको हमें संतुष्ट करना होगा कि केंद्र सरकार को भी यह जानकारी थी।”

सरकार ने ओवैसी की आपत्तियों का जवाब नहीं दियाः प्रशांत भूषण

इसके बाद प्रशांत भूषण ने अपनी दलीलें शुरू कीं। उन्होंने कहा, “इस विशेष कानून पर बहस के दौरान विपक्ष के अधिकांश सांसद निलंबित थे। सांसद ओवैसी ने कहा था कि यह कानून अनूप बरनवाल फैसले के अनुरूप नहीं है। सरकार का जवाब सिर्फ इतना था कि अनूप बरनवाल ने हमें कानून बनाने को कहा था, इसलिए हमने कानून बना दिया। और फिर इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।” अदालत को बताया गया कि उस समय विपक्ष के 95 सांसद निलंबित थे। भूषण ने कहा, “यह एक मजाक था। कोई सार्थक बहस नहीं हुई। मंत्री ने ओवैसी की ठोस आपत्तियों का जवाब नहीं दिया।”

प्रशांत भूषण की आशंका

उन्होंने आगे कहा, “सिर्फ यह कि हटाने की प्रक्रिया महाभियोग से होगी, इससे स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होती। स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए यह भी जरूरी है कि नियुक्ति प्रक्रिया सत्ताधारी दल के नियंत्रण में न हो। सरकार स्पष्ट रूप से चुनावों में स्टेकहोल्डर है। आप ऐसा कानून लाते हैं जो अनूप बरनवाल फैसले की बुनियाद को ही खत्म कर देता है… अगर वे इसे खत्म करने के लिए संवैधानिक संशोधन भी लाते, तब भी यह संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन होता। एनजेएसी मामले में संशोधन को इसी आधार पर रद्द किया गया था। यहां स्पष्ट रूप से सरकार का प्रभुत्व है। यह मामला कम से कम पांच संविधान पीठ के फैसलों से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।” भूषण ने यह चिंता भी जताई कि अगर अदालत इस संशोधन को रद्द भी कर दे, तब भी केंद्र सरकार किसी दूसरे रूप में इसे वापस ला सकती है।

कुछ और भी दलीलें

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने स्वतंत्र चुनाव आयोग के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तभी संभव हैं जब चुनाव आयोग स्वतंत्र हो। लोकतंत्र का भविष्य इसी मामले पर निर्भर करता है।” उन्होंने कहा कि चुनौती दी गई व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करती है। पश्चिम बंगाल के एक सांसद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता फरासत ने तर्क दिया कि संविधान की मांग है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति ऐसी समिति से न हो जिस पर कार्यपालिका का प्रभुत्व हो। उन्होंने कहा, “कार्यपालिका-प्रभुत्व से मुक्त चयन समिति ही मूल संवैधानिक सिद्धांत है। आप प्रक्रिया का इस्तेमाल करके संविधान की मूल शर्त का उल्लंघन नहीं कर सकते… संविधान की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति स्वतंत्र प्रक्रिया से हो।”
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फरासत ने कहा कि अगर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से समझौता हुआ तो लोकतंत्र प्रभावित होगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि चुनाव आयोग चयन समिति के फैसले बहुमत से नहीं बल्कि आमराय से होने चाहिए। फरासत ने कहा- “अगर सीजेआई को प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच किसी एक पक्ष का समर्थन करना पड़े, तो यह आदर्श स्थिति नहीं होगी। माननीय न्यायालय को यह भी विचार करना होगा कि फैसला सर्वसम्मति से हो, बहुमत से नहीं।”
इस पर अदालत ने सुझाव दिया कि सीजेआई को सदस्य बनाने के बजाय पैनल का एक सदस्य ऐसा हो सकता है जिसे सीजेआई से परामर्श के बाद नामित किया जाए। अदालत ने कहा, “प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के अलावा तीसरा सदस्य ऐसा हो सकता है जिसे प्रधानमंत्री और सीजेआई से परामर्श के बाद नामित किया जाए।” फरासत ने जवाब दिया, “उसे संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में दो-तिहाई बहुमत से भी चुना जा सकता है।”
मामले की अगली सुनवाई 14 मई को होगी।