सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया पर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि चयन समिति में एक केंद्रीय मंत्री को शामिल करना स्वतंत्र नियुक्ति का सिर्फ दिखावा भर है। कोर्ट ने पूछा कि आखिर लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्था की नियुक्ति में इतना एग्जीक्यूटिव का नियंत्रण क्यों?

अदालत ने कहा कि समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक यूनियन कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने टिप्पणी की कि मंत्री प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ जा नहीं सकते लिहाजा फैसला 2-1 के बहुमत से हो जाएगा और जिसमें सरकार का पक्ष ही भारी रहेगा। कोर्ट ने पूछा, 'स्वतंत्र नियुक्ति का यह दिखावा क्यों?'

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सुनवाई के दौरान सख्त सवाल उठाए। उन्होंने कहा, 'सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) शामिल होते हैं। वहां हम कह सकते हैं कि कानून-व्यवस्था या रूल ऑफ़ लॉ की बात है। लेकिन लोकतंत्र बनाए रखने और शुद्ध, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए CJI क्यों नहीं हो सकते? क्या लोकतंत्र कम महत्वपूर्ण है?'
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कोर्ट ने आगे कहा कि चुनाव आयोग की नियुक्ति और भी ज़्यादा अहम है क्योंकि यह सीधे लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से जुड़ा है। जस्टिस दत्ता ने कहा, 'हम यह नहीं कह रहे कि CJI ज़रूर शामिल हों, लेकिन कोई स्वतंत्र सदस्य क्यों नहीं हो सकता? क्यों कोई मिनिस्ट्री का व्यक्ति होना चाहिए?'

'एग्जीक्यूटिव ही सब कुछ नियंत्रित कर रहा है'

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि जब जवाब देने में हिचकिचाए तो जस्टिस दत्ता ने साफ़ कहा, 'आज प्रधानमंत्री एक नाम चुनते हैं, विपक्ष का नेता दूसरा। अगर असहमति हुई तो तीसरा सदस्य मंत्री किस तरफ जाएगा? व्यवहार में तो वो प्रधानमंत्री के पक्ष में ही जाएगा।' जस्टिस दत्ता ने कहा, 'तो फिर एग्जीक्यूटिव ही सब कुछ नियंत्रित कर रहा है।'

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संसद क़ानून बना सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट अंतिम व्याख्या करने वाला है। कोर्ट को क़ानून की व्याख्या करने का पूरा अधिकार है।

'चुनाव आयोग को निष्पक्ष दिखना भी जरूरी'

सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग को न सिर्फ निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसे निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए यह बेहद ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा कि पिछले कई फ़ैसलों के बावजूद संसद ने इस प्रक्रिया को क्यों नहीं बदला, यह भी सोचने वाली बात है।

सीईसी नियुक्ति पैनल पर विवाद

यह सुनवाई मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी याचिकाओं पर हो रही है। पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले में कहा गया था कि नियुक्ति में CJI की अध्यक्षता वाली समिति होनी चाहिए, लेकिन बाद में सरकार ने नया कानून बनाकर समिति में कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया।
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पिछली सुनवाई में SC ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह 7 मई को कहा था कि संसद ने चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने में दशकों तक देरी की। आखिरकार 2023 में अदालत के आदेश के बाद ही कानून बना। कोर्ट ने इसे 'चुनकर आए लोगों की तानाशाही' बताया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। इसमें 2023 के नए कानून को चुनौती दी गई है।

नया क़ानून क्या है?

2023 का कानून Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act बनाया गया ताकि नियुक्ति का साफ नियम हो। लेकिन इस कानून की भी आलोचना हो रही है क्योंकि इसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से हटा दिया गया। उनकी जगह अब प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक यूनियन कैबिनेट मंत्री को रखा गया है। फरवरी 2025 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी मिले थे, तब मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति हुई। राहुल गांधी ने इस प्रक्रिया पर लिखित विरोध जताया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक नियुक्ति टाल दी जाए।

पहले चुनाव आयुक्त कैसे बनते थे?

संविधान के अनुच्छेद 324(2) में कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार होगी। लेकिन 1991 का पुराना कानून सिर्फ वेतन, कार्यकाल आदि के बारे में था। नियुक्ति की कोई प्रक्रिया नहीं थी। इसलिए नियुक्ति पूरी तरह सरकार के हाथ में थी। कानून मंत्रालय नामों की सूची बनाता था। प्रधानमंत्री को सुझाव दिया जाता था। फिर राष्ट्रपति नियुक्त करते थे। ज्यादातर मामलों में आईएएस अधिकारी ही चुनाव आयुक्त बनते थे और सबसे सीनियर वाले मुख्य चुनाव आयुक्त बन जाते थे।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

2022 में अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकार खुद ही आयुक्त चुन रही है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। नवंबर 2022 में सुनवाई के दौरान अचानक एक IAS अधिकारी अरुण गोयल को एक दिन में ही नियुक्त कर दिया गया। कोर्ट ने इसे देखकर हैरानी जताई। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था दी- जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति 3 सदस्यीय समिति की सलाह पर राष्ट्रपति करेंगे। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे। अगर विपक्ष का नेता न हो तो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता शामिल होता था। लेकिन बाद में मोदी सरकार ने क़ानून बनाकर सीजेआई को नियुक्ति पैनल से हटा दिया।

बहरहाल, कोर्ट की इस ताज़ा टिप्पणी से राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को लेकर बेहद अहम है। कोर्ट का संदेश है कि चुनाव आयोग लोकतंत्र का सबसे अहम स्तंभ है। इसकी नियुक्ति में स्वतंत्रता का सच्चा भाव होना चाहिए, सिर्फ दिखावा नहीं। एग्जीक्यूटिव का पूर्ण नियंत्रण लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने वाला है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।