सुप्रीम कोर्ट ने पशुओं के प्रति समाज के विरोधाभासी रवैये पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि लोग अक्सर दूध या आर्थिक उपयोगिता खत्म होने के बाद पशुओं को सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं और उनकी सुरक्षा की परवाह नहीं करते, लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपनी या अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए उनका भोजन के रूप में इस्तेमाल करता है, तो लोग इसे बेहद आपत्तिजनक मानते हैं।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने आवारा पशुओं से होने वाले सड़क हादसों के गंभीर मुद्दे पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

आदर्श दुनिया और कड़वी सच्चाई की तरफ कोर्ट का इशारा

अदालत ने कहा, "एक आदर्श दुनिया में ऐसा नहीं होना चाहिए। जो भी किसी पशु को घर लाता है, उसे जीवनभर उसकी देखभाल करनी चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हम एक कमियों भरी इंसानी दुनिया में रहते हैं।" अदालत ने कहा, "शायद इस दुनिया की एक अजीब खासियत है कि एक तरफ हम पशुओं की सुरक्षा की परवाह किए बिना उन्हें सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ देते हैं, और दूसरी तरफ अगर कोई व्यक्ति अपना या अपने परिवार का पेट भरने के लिए उनका इस्तेमाल करता है, तो लोग इसे अत्यधिक आपत्तिजनक मानते हैं।"

पालतू पशु और आर्थिक उपयोगिता वाले पशुओं में अंतर

अदालत ने स्पष्ट किया कि पालतू जानवरों (Pets) और अन्य पशुओं में अंतर होता है। सड़कों पर भटकने वाले अधिकांश मवेशी आर्थिक लाभ के उद्देश्य से पाले जाते हैं। जब उनकी उत्पादकता खत्म हो जाती है, तो उन्हें लावारिस छोड़ दिया जाता है। पीठ ने नोट किया कि देश के 24 राज्यों में गोहत्या के खिलाफ कानून लागू हैं, लेकिन उनके संरक्षण और देखभाल से जुड़े प्रावधानों को सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों और सड़कों पर भटकते पशुओं पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि मवेशी सड़कों पर "प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर" की तरह इस्तेमाल होने के लिए नहीं हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में आवारा पशुओं से जुड़ी घटनाओं में हर साल 1,300 से अधिक लोग अपनी जान गंवाते हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों के लिए मुख्य सिफारिशें

सार्वजनिक सड़कों पर हादसों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निम्नलिखित कदम उठाने की सलाह दी है:

  • मुआवजा तंत्र: आवारा पशुओं के हमलों या हादसों के शिकार लोगों और उनके परिवारों के लिए मुआवजा देने की एक स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
  • टैगिंग (Tagging) अनिवार्य हो: सभी मवेशियों पर पहचान टैग लगाना अनिवार्य किया जाए, ताकि उनके मालिकों की जवाबदेही तय की जा सके।
  • मालिकों की जिम्मेदारी: यदि मालिक अपने पशु को छोड़ना चाहता है, तो उसे अधिकृत आश्रय स्थलों (Animal Shelters) में सुरक्षित स्थानांतरित करने की जिम्मेदारी उसी की होगी।
  • नोडल अधिकारियों की नियुक्ति: पशुओं की टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और गौशालाओं/आश्रय स्थलों के कामकाज की निगरानी के लिए नोडल अधिकारी तैनात किए जाएं।
  • कानूनों का सख्त पालन: राज्यों में मौजूद पशु संरक्षण कानूनों का सही और प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।

संगरूर सांड़ हमले से जुड़े मामले में 15 लाख का मुआवजा

यह ऐतिहासिक फैसला संगरूर (पंजाब) की रहने वाली एक महिला (निशा बनाम नगर परिषद संगरूर, Citation: 2026 LiveLaw (SC) 746) की याचिका पर आया। वर्ष 2007 में महिला के पति की एक आवारा सांड़ (Bull) के हमले में मौत हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता विधवा महिला की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें ₹15 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने इस व्यक्तिगत मामले का दायरा बढ़ाते हुए देश में आवारा पशुओं से जुड़ी व्यापक समस्याओं और सार्वजनिक सुरक्षा पर दूरगामी सिफारिशें जारी कीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले और अपनी सिफारिशों की एक-एक प्रति देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों (Chief Secretaries) को भेजने का निर्देश दिया है।