क्या केंद्र सरकार ने इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 69ए से परे जाकर एक्स खातों को ब्लॉक किया है? जिस राष्ट्रीय सुरक्षा, शांति-व्यवस्था के नाम पर ब्लॉक करने के आदेश दिए गए, वे ज्यादातर कंटेंट उसमें आते ही नहीं? एक पोस्ट पर आपत्ति थी तो पूरे यूज़र अकाउंट को कैसे बंद कर दिया गया? और सुनवाई का मौक़ा क्यों नहीं मिला? कम से कम एक्स तो ऐसा ही मानता है।
मशहूर पैरोडी अकाउंट 'डॉ. नीमो यादव' सहित 12 एक्स खातों को ब्लॉक किए जाने के मामले में एक्स ने ऐसी ही आपत्ति जताई है। अदालत में हलफनामा देकर एक्स ने कहा है कि इसने 19 मार्च को केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पत्र लिखकर आपत्ति जताई थी। इस पत्र में कहा गया कि 18 मार्च को जारी किया गया ब्लॉकिंग आदेश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69ए का पालन नहीं करता है।
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यह जानकारी दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल एक हलफनामे से सामने आई है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार एक्स ने यह हलफनामा न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव के समक्ष दायर किया था। यह हलफनामा 'डॉ. निमो यादव' अकाउंट को चलाने वाले प्रतीक शर्मा द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में पेश किया गया था। अदालत में पूरा घटनाक्रम कैसे चला, यह जानने से पहले यह जान लें कि ब्लॉक करने वाला आदेश क्या था और इसमें सरकार ने क्या कहा था।

पोस्ट पर सरकार की आपत्ति क्या?

18 मार्च 2026 को केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय यानी एमईआईटीवाई ने इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 69ए के तहत आदेश जारी करके एक्स को इन 12 खातों को भारत में ब्लॉक करने को कहा था। इनमें प्रतीक शर्मा द्वारा चलाया जा रहा पैरोडी अकाउंट @DrNimoYadav प्रमुख है।
सरकार का आरोप है कि इस अकाउंट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने वाले विवादास्पद पोस्ट किए। इन पोस्टों में फोटो, वीडियो और एआई से बनाई गई सामग्री का इस्तेमाल करके प्रधानमंत्री पर अयोग्यता का आरोप लगाया गया और उन्हें 'बैड टेस्ट' में यानी छवि ख़राब करने के तौर पर दिखाया गया। कुछ पोस्टों में सरकार पर सवाल उठाए गए और झूठे नैरेटिव फैलाए गए।
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एक्स ने क्या कहा?

एक्स ने जो आपत्ति जताने वाला पत्र लिखा और जो हलफनामा दिया, उसमें साफ़ लिखा कि इन खातों के ज़्यादातर कंटेंट धारा 69ए के दिए गए आधारों में नहीं आते। इसलिए पूरे अकाउंट को ब्लॉक करना गलत है और यह नियम के अनुसार नहीं है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार एक्स ने कहा, "पोस्ट को ब्लॉक नहीं कर, अकाउंट को ही ब्लॉक करना सही नहीं है। यह क़ानून के तहत अनिवार्य 'सबसे कम दखल देने वाला उपाय' नहीं है।"

एक्स के ख़त में कहा गया कि अकाउंट होल्डर्स को सुनवाई का कोई मौक़ा नहीं दिया गया। ब्लॉकिंग आदेश में यह नहीं दिखाया गया कि किस व्यक्ति की सामग्री को ब्लॉक किया जा रहा है और उसके लिए क्या ठोस प्रयास किए गए।

एक्स ने कहा है कि पूरे अकाउंट को ब्लॉक करने से अकाउंट होल्डर भारत में एक्स का इस्तेमाल हमेशा के लिए नहीं कर पाएगा, जो उसके अधिकारों पर बहुत ज्यादा असर डालता है। इसने आगे लिखा कि अगर कोई पोस्ट गलत है तो सिर्फ उसी पोस्ट को रोकना काफी है। पूरे अकाउंट को ब्लॉक करना जरूरत से ज्यादा सख्त कदम है।
एक्स ने सरकार से अनुरोध किया, 'हम अपने अधिकार सुरक्षित रखते हुए कहते हैं कि कम से कम इन 12 अकाउंट्स के मामले में ब्लॉकिंग आदेश पर फिर से विचार करें।' एक्स ने यह भी साफ़ किया कि यह जवाब देने का मतलब यह नहीं है कि वे किसी अधिकार को छोड़ रहे हैं और वे जरूरत पड़ने पर अदालत में चुनौती दे सकते हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई

यह मामला प्रतीक शर्मा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव के सामने आया है। एक्स की तरफ से वकील अंकित परिहार पेश हुए। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर, नकुल गांधी, अपार गुप्ता और सौतिक बनर्जी पेश हुए। एमईआईटीवाई की तरफ से वकील अवश्रेया रुडी ने पक्ष रखा।
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बोलने की आज़ादी पर हमला?

एक्स ने कोर्ट को बताया कि सरकार का आदेश धारा 69ए का पालन नहीं करता। कानून में राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था आदि के लिए ब्लॉकिंग का प्रावधान है, लेकिन यहां ज्यादातर कंटेंट उसमें नहीं आता। एक्स का तर्क है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बिना जरूरी वजह के सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
यह मामला सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी, पैरोडी अकाउंट्स और सरकार द्वारा ब्लॉकिंग के अधिकार को लेकर फिर से बहस छेड़ रहा है। कई लोग इसे व्यंग्य पर हमला बता रहे हैं, जबकि सरकार का पक्ष है कि इन अकाउंट्स ने प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुँचाया और झूठी जानकारी फैलाई। अभी कोर्ट में यह याचिका लंबित है।