चीन के नए निर्यात नियमों (डिक्री 834 और 835) से भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो सेक्टर में चिंता है। क्योंकि भारतीय कंपनियाँ अपने उत्पादन के लिए चीन से कल-पुर्जे मंगाती थी। जिनपर चीन के नये नियमों से कई तरह की पाबंदियाँ लग जाएँगी।
चीन ने सप्लाई चेन पर नये निर्यात नियम लगाकर भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को बड़ा झटका दे दिया है। भारत ने आत्मनिर्भरता का नारा दिया, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियाँ लगाईं, 120 हज़ार करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का लक्ष्य रख लिया, लेकिन इसके लिए ज़रूरी कल-पुर्जे के लिए निर्भरता चीन पर बनी रही। कल-पुर्जे मंगाकर एसेंबलिंग कर सामान बेच ही रहे थे कि अब चीन ने इन कल-पुर्जों की सप्लाई चेन पर नये निर्यात नियम लगाकर बड़ी चिंता पैदा कर दी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का जो बड़ा सपना पाला गया था वो अब टूटता दिख रहा है।
ये सपना ऐसे नहीं देखा गया था। इसके लिए भारत के पास एक आधार था। पिछले पाँच-छह वर्षों में भारत ने खुद को दुनिया का अगला बड़ा फैक्ट्री हब बनाने की कोशिश की। चीन से कंपनियाँ उत्पादन शिफ्ट करके भारत आ रही थीं। एपल जैसी कंपनियों के सप्लायर्स ने यहाँ फैक्ट्रियाँ बढ़ाईं, सेमीकंडक्टर प्लांट्स की घोषणा हुई और नए इंडस्ट्रियल पार्क बनाने का वादा किया गया। इस प्रयास से अच्छे नतीजे भी आए। भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 2015 में सिर्फ 8.6 अरब डॉलर था जो बढ़कर 2025 में रिकॉर्ड 47 अरब डॉलर हो गया। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय का लक्ष्य है कि 2026 के अंत तक यह निर्यात 120 बिलियन डॉलर यानी 120 हज़ार करोड़ रुपये तक पहुँच जाए। लेकिन जब भारत मैन्युफैक्चरिंग को तेजी से बढ़ा रहा है, ठीक इसी समय चीन ने उन सप्लाई चेन पर नकेल कस दी है। इन सप्लाई चेन पर ही ये फैक्ट्रियाँ चल रही हैं।
चीन के सख्त नए नियम
बीजिंग की सरकार ने State Council Decree 834 और 835 जारी किए हैं। इन नियमों के तहत अहम मशीनरी, कंपोनेंट्स, क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के निर्यात पर पाबंदियां लगा दी गई हैं। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर में इस ख़बर से काफी चिंता फैल गई है। उद्योग के लोगों का कहना है कि चीन की इन पाबंदियों से नई फैक्ट्रियाँ लगाने की योजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं, निवेश में देरी हो सकती है और भारत की चीन पर निर्भरता एक बार फिर सामने आ गई है। सवाल यह है कि यदि फैक्ट्रियाँ बनाने के लिए ज़रूरी मशीनें और टूल्स ही चीन के हाथ में हैं तो भारत वाक़ई मैन्युफैक्चरिंग को कितने बड़े पैमाने पर बढ़ा पाएगा?
ऑटो सेक्टर में 26% कंपोनेंट्स आयात चीन से
ऑटो सेक्टर में वित्त वर्ष 2025 में भारत ने जो कंपोनेंट्स आयात किए, उनमें से क़रीब 26% चीन से आए। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स में अभी भी चीन की मशीनरी और कच्चे माल पर भारी निर्भरता है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स में चीन से भारत का आयात काफी अधिक है। भारत अभी भी इन क्षेत्रों में चीन पर बहुत निर्भर है, भले ही स्मार्टफोन असेंबली में भारत काफ़ी आगे बढ़ा हो।
इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट
चीन से 2024 में कुल आयात क़रीब लगभग 47.67 बिलियन डॉलर का था। भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स आयात 2025-26 में 116 बिलियन डॉलर के क़रीब पहुंचा, जिसमें चीन की हिस्सेदारी क़रीब 40-43% है। चीन इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स chips, displays, PCBs आदि का प्रमुख स्रोत है।
स्मार्टफोन और कंपोनेंट्स
फिनिश्ड स्मार्टफोन 2025 में कुल 260 मिलियन डॉलर का आयात हुआ जिसमें 58.8% चीन से। स्मार्टफोन कंपोनेंट्स कुल 7.15 बिलियन डॉलर का आयात, 51.7% चीन से। इसके अलावा स्मार्टफोन पार्ट्स अलग से 764 मिलियन डॉलर का आयात होता है जिसमें से 55% से ज़्यादा चीन से आयात होता है।
भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादक है और US में सप्लाई के मामले में चीन को पीछे छोड़कर टॉप एक्सपोर्टर बन गया है, लेकिन डिस्प्ले, चिप्स, बैटरी आदि जैसे कंपोनेंट्स अभी भी ज्यादातर चीन से आते हैं।
इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरियां
लिथियम-आयन बैटरीज़: एच1 2025 में क़रीब 1.85 बिलियन डॉलर का आयात हुआ जिसमें 75-94% चीन से आयात हुए।
उद्योग जगत की चिंता क्या?
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के अधिकारियों ने चीनी सप्लायर्स से बातचीत शुरू कर दी है। वे समझने की कोशिश कर रहे हैं कि नए नियमों से कैपिटल इक्विपमेंट और ज़रूरी पार्ट्स की सप्लाई पर क्या असर पड़ेगा। उद्योग जगत ने केंद्र सरकार को भी चेतावनी दी है और इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय यानी MeitY को इसकी जानकारी दी है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार ऑटो सेक्टर के विशेषज्ञ मुस्तफा सिंगापुरवाला कहते हैं, 'आज की गाड़ी में 3000 तक चिप्स लग सकते हैं। अगर सप्लाई प्रभावित हुई तो सिर्फ कीमतें नहीं बढ़ेंगी, नई गाड़ियों की लॉन्चिंग देरी से होगी, ग्राहकों को इंतजार करना पड़ेगा और फीचर्स भी कम हो सकते हैं।'
उन्होंने चेतावनी दी कि चीन अब सिर्फ़ व्यापार नहीं कर रहा, बल्कि कंपनियों और उनके अधिकारियों पर व्यक्तिगत सजा का प्रावधान रखकर प्रोडक्शन को चीन से बाहर ले जाने पर रोक लगाना चाहता है। रिपोर्ट के अनुसार NXTCELL Mobility के CEO अतुल विवेक कहते हैं, 'यह याद दिलाता है कि भारत को मज़बूत घरेलू सप्लाई नेटवर्क और मज़बूत सप्लाई चेन बनाने की ज़रूरत है।'
'सिर्फ़ असेंबलिंग से काम नहीं चलेगा'
इंडस्ट्री के जानकार कहते हैं कि कल-पुर्जे मंगाकर सिर्फ़ असेंबलिंग से काम नहीं चलेगा, क्योंकि इससे पूरी तरह निर्भरता सप्लाई चेन वाले देश पर बनी रहती है। रिपोर्ट के अनुसार लेडएक्स टेक्नोलॉजी के एमडी संकेत रामभिया ने कहा, 'एक ही देश पर इतनी ज्यादा निर्भरता अब टिकाऊ नहीं है। भारत को सिर्फ असेंबलिंग का काम नहीं, बल्कि पार्ट्स और कंपोनेंट्स बनाने का पूरा इकोसिस्टम तैयार करना होगा।' सरकार क्या कर रही है?
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा है कि सरकार अलग-अलग सेक्टर के लिए खास निवेश योजनाएँ बना रही है ताकि अहम सप्लाई चेन में कुछ खास देशों पर निर्भरता कम की जा सके। सरकार 33660 करोड़ रुपये की भारत औद्योगिक विकास योजना यानी Bhavya चला रही है। इसके तहत अगले तीन साल में 50 नए इंडस्ट्रियल पार्क बनाए और चालू किए जाएंगे।
बहरहाल, चीन के नए नियम भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी हैं। भारत का 120 बिलियन डॉलर का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात लक्ष्य अब सिर्फ मेहनत पर नहीं, बल्कि स्मार्ट नीतियों, घरेलू टेक्नोलॉजी विकास और वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने पर भी निर्भर करेगा। सरकार और उद्योग को मिलकर काम करना होगा ताकि चीन पर निर्भरता कम हो और भारत वाकई दुनिया का विश्वसनीय मैन्युफैक्चरिंग हब बन सके।