इसराइल-यूएस ईरान युद्ध लंबा खिंचा तो कच्चे तेल की कमी को कैसे झेलेगा भारत? भारत के पास क्या विकल्प हैं और इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर कैसा होगा?
इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए। ईरान ने बदला लिया। सऊदी अरब व कतर की तेल फैसिलिटी को नुकसान पहुंचाया। और भुगत पूरी दुनिया रही है। इसमें भी भारत के सामने अब कच्चे तेल की बहुत बड़ी चुनौती सामने आ गई है। सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि दुनिया का अहम रास्ता स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज बंद हो गया है। इस रास्ते से बहुत सारा कच्चा तेल दुनिया भर में जाता है। इस वजह से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं और ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया।
अब सवाल यह है कि अगर यह युद्ध कई महीनों तक चला तो भारत के सामने कच्चे तेल की कमी की किस तरह की चुनौती सामने आएगी और वह इससे कैसे निपटेगा? भारत के पास क्या स्टॉक है, क्या विकल्प हैं। आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा?
इसका असर जानने से पहले यह जान लें कि युद्ध का असर तेल की सप्लाई पर कैसा पड़ा है और भारत पर इसका असर कितना है। खाड़ी में तनाव बढ़ने पर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है। बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को तो चिंता में डाल ही दिया है, भारत के लिए भी यह बड़ा संकट है। इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए हैं और ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की है। इस झगड़े का असर भारत पर भी पड़ता दिख रहा है, क्योंकि भारत अपनी ज़रूरत का करीब 90% कच्चा तेल बाहर से मंगाता है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य कितना अहम?
हॉर्मुज जलडमरूमध्य मध्य पूर्व में एक बहुत अहम समुद्री रास्ता है। यह फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित है और दुनिया के 20-25% कच्चे तेल का यहीं से गुजरना होता है। यह रास्ता क़रीब 100 मील लंबा है, लेकिन सबसे संकरी जगह पर सिर्फ 21 मील चौड़ा है। यहाँ पानी की गहराई भी कम है, जिससे जहाजों को ख़तरा रहता है।
उत्तर की तरफ ईरान है, जबकि दक्षिण में संयुक्त अरब अमीरात और ओमान हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में वोर्टेक्सा एनालिटिक्स फर्म के डेटा से पता चलता है कि पिछले साल यहां से रोजाना औसतन 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल, कंडेंसेट और रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स गुजरे। सऊदी अरब, ईरान, यूएई, कुवैत और इराक जैसे ओपेक के कई देश एशियाई बाजारों में तेल सप्लाई के लिए इसी हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं।
भारत की हॉर्मुज पर कितनी निर्भरता?
केप्लर नाम की ग्लोबल डेटा और एनालिटिक्स कंपनी के मुताबिक़, भारत ने हाल ही में मध्य पूर्व से ज्यादा तेल खरीदना शुरू किया है, जिससे हॉर्मुज से जुड़े जोखिम बढ़ गए हैं। केप्लर के अनुसार, भारत की हॉर्मुज से जुड़ी निर्भरता हाल के महीनों में बढ़ी है। उनकी वेसल ट्रैकिंग डेटा से पता चलता है कि भारत के क़रीब 2.5-2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन कच्चे तेल के आयात इसी जलडमरूमध्य से होकर आते हैं। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 50% है। ये तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आते हैं। पिछले 2-3 महीनों में भारत ने रूसी तेल से थोड़ा मुंह मोड़ा है और मध्य पूर्व के तेल पर ज्यादा जोर दिया है। इससे भारत में गल्फ देशों का आयात बढ़ा है, जो हॉर्मुज में किसी रुकावट से ज्यादा प्रभावित हो सकता है।'
भारत के पास कितना स्टॉक है?
रिपोर्ट है कि सरकार के पास कुछ दिनों तक की ख़पत के लिए तेल का स्टॉक है। सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि कच्चे तेल का स्टॉक 25 दिन का है जो शोधित नहीं है। इसके अलावा शोध करने के बाद तैयार पेट्रोल और डीजल का स्टॉक 25 दिन का है। यानी कुल 50 दिन का स्टॉक है। एक सूत्र ने कहा, 'कच्चे तेल के मामले में हम काफी अच्छी स्थिति में हैं।'यह 25 दिन का स्टॉक स्पेशल पेट्रोलियम रिजर्व यानी एसपीआर को शामिल नहीं करता। एसपीआर अलग से रखा गया इमरजेंसी स्टॉक है। अगर उसे भी जोड़ दें तो देश के पास और ज्यादा दिन का कच्चा तेल है।
एलपीजी और एलएनजी की स्थिति
एलएनजी का स्टॉक 2-3 हफ्ते का है। दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी उत्पादक कतर ने हमलों के बाद उत्पादन रोक दिया है, लेकिन भारत उससे लगातार संपर्क में है और देख रहा है कि कितने दिन तक रुकावट रहेगी। एलपीजी को भारत पहले ही दूसरे देशों से खरीदना शुरू कर चुका है। एक सूत्र ने कहा, 'दुनिया में बड़े-बड़े स्रोत उपलब्ध हैं। भले ही वे दूर हों, लेकिन हैं तो सही।'
भारत के पास क्या-क्या विकल्प हैं?
सरकार ने कई कदम पहले ही उठा लिए हैं। वैकल्पिक देशों रूस, अमेरिका, अफ्रीकी देशों और दूसरे जगहों से तेल लाने की कोशिश तेज कर दी गई है। जरूरत पड़ी तो इमरजेंसी स्टॉक खोला जाएगा। पेट्रोलियम मंत्रालय ने 24 घंटे का कंट्रोल रूम बना दिया है। हर दिन स्टॉक की जांच हो रही है। मंत्रालय ने कहा है कि उपभोक्ताओं के हित सबसे ऊपर हैं। हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। अगर जरूरी हुआ तो चरणबद्ध तरीके से कदम उठाए जाएंगे।
अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
सरकार कह रही है कि हम अच्छी स्थिति में हैं। आम लोगों को पेट्रोल-डीजल, एलपीजी या सीएनजी की कमी नहीं होने वाली है। अगर युद्ध लंबा खिंचा तो कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और घरेलू गैस के दाम थोड़े ऊपर जा सकते हैं। इससे महंगाई बढ़ सकती है।
कारखाने, ट्रक, टैक्सी, किसान और आम आदमी को थोड़ा महंगा पड़ सकता है। लेकिन सरकार का कहना है कि हम सतर्क लेकिन आशावादी हैं। 50 दिन का बफर है, वैकल्पिक सप्लाईर तैयार हैं, इसलिए बड़ा झटका नहीं लगेगा।
सरकार का संदेश है कि 'हमने कोई ऐसा फैसला नहीं लिया है जो आम जनता के हितों को नुकसान पहुंचाए। सरकार हर चीज के लिए वैकल्पिक स्रोत तलाश रही है।
अभी भारत कच्चे तेल की कमी को आसानी से झेल सकता है। 50 दिन का स्टॉक, एसपीआर का अतिरिक्त भंडार और दूसरे देशों से तेल लाने की तैयारी भी है। लेकिन यदि युद्ध लंबा चला तो सरकार के सामने दिक्कत आएगी। तब स्थिति इस पर निर्भर करेगी कि सरकार ने वैकल्पिक तैयारी कितनी मुस्तैदी से की है।