भारत की बैंकिंग व्यवस्था में छोटे और बड़े कर्जदारों के साथ कथित तौर पर अलग-अलग व्यवहार को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मनी लाइफ और इकोनॉमिक टाइम्स की अलग-अलग रिपोर्टों से इस बात की जानकारी सामने आई है। मनी लाइफ ने एक आरटीआई के हवाले से बताया कि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा के बड़े डिफॉल्टरों के लिखे-बट्टे कर्ज की वसूली दर करीब 15 फीसदी रही, जबकि 1 करोड़ रुपये से कम के छोटे कर्जदारों के मामले में यह दर करीब 74 फीसदी रही। दूसरी ओर, इकोनॉमिक टाइम्स अखबार ने बताया कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने मीडिया कारोबारी और जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के 22,006.57 करोड़ रुपये के कर्ज को महज़ 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान वाली योजना में मंजूरी दे दी है। अब दोनों रिपोर्टों को जोड़कर देखें- बड़े लोगों के बड़े-बड़े कर्ज किस तरह माफ हो रहे हैं, वो सामने है। दूसरी तरफ छोटे कर्जदारों से वसूली का डंडा चलाया जाता है। हालांकि लोन फिर लोन है, लेना है तो वापस करना ही होता है। बस नियम सभी के लिए समान नहीं हैं।
दोनों घटनाएं अलग-अलग मामलों से जुड़ी हैं, लेकिन इनके आंकड़े बैंकिंग क्षेत्र में कर्ज की वसूली, बड़े डिफॉल्टरों को मिलने वाली राहत, बैंकिंग पारदर्शिता और सार्वजनिक धन की जवाबदेही को लेकर एक बड़ा सवाल सामने रखते हैं।

सेंट्रल बैंक के आंकड़ों में बड़ा अंतर

आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलणकर द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने बताया कि वित्त वर्ष 2016-17 से 2025-26 के बीच 100 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया रखने वाले बड़े डिफॉल्टरों के 26,701.55 करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया। इनमें से बैंक केवल 3,874.41 करोड़ रुपये ही वसूल पाया। यानी रिकवरी करीब 14.5 प्रतिशत रही और 85 प्रतिशत से ज्यादा रकम की वसूली नहीं हो सकी।
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इसके उलट 1 करोड़ रुपये से कम कर्ज वाले छोटे कर्जदारों के मामले में इसी अवधि में 6,774.23 करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाला गया, लेकिन बैंक ने 5,004.28 करोड़ रुपये की वसूली की। यहां रिकवरी दर करीब 74 प्रतिशत रही। यानी बैंक के अपने आंकड़ों के मुताबिक बड़े कर्जदारों से वसूली की दर छोटे कर्जदारों की तुलना में करीब पांच गुना कम रही।

किन वर्षों में कितना कर्ज बट्टे खाते में गया?

बड़े डिफॉल्टरों के मामले में वित्त वर्ष 2018-19 सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में रहा। इस दौरान बैंक ने 7,002.58 करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाला, जबकि सिर्फ 761.01 करोड़ रुपये की वसूली हुई। वित्त वर्ष 2024-25 में बड़े डिफॉल्टरों के 2,255.61 करोड़ रुपये के कर्ज को राइट ऑफ किया गया, लेकिन वसूली सिर्फ 53.42 करोड़ रुपये रही। वित्त वर्ष 2021-22 में इस श्रेणी में बैंक ने न तो कोई राइट-ऑफ और न ही रिकवरी दर्ज की।
छोटे कर्जदारों के मामले में तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। वित्त वर्ष 2022-23 में 1,856.87 करोड़ रुपये के छोटे कर्ज राइट ऑफ किए गए और उसी साल 1,395.11 करोड़ रुपये की वसूली हुई। वित्त वर्ष 2023-24 में 3,845.54 करोड़ रुपये राइट ऑफ किए गए और 3,481.32 करोड़ रुपये की वसूली हुई।

बड़े डिफॉल्टरों के नाम बताने से बैंक का इनकारः आरटीआई कार्यकर्ता विवेक वेलणकर ने बैंक से उन कर्जदारों के नाम भी मांगे थे, जिनके 100 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज वित्त वर्ष 2016-17 से 2025-26 के बीच राइट ऑफ किए गए। उन्होंने प्रत्येक कर्जदार के लिए राइट ऑफ की गई रकम की जानकारी भी मांगी थी। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने यह जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि मांगी गई सूचना थर्ड पार्टी से संबंधित है और उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।

वेलणकर ने उन कर्जदारों के नाम भी मांगे जिनके मामलों का निपटारा NCLT या इसी तरह के मंचों के जरिए बैंक द्वारा हेयरकट स्वीकार करके किया गया था। बैंक ने इन मामलों में भी नाम और व्यक्तिगत हेयरकट की रकम बताने से इनकार किया। जब उनसे वित्त वर्ष 2017-18 से 2025-26 तक हर साल बैंक द्वारा लिए गए कुल हेयरकट और उसके मुकाबले हुई रिकवरी की जानकारी मांगी गई, तो बैंक ने जवाब दिया कि प्रश्न स्पष्ट नहीं है, इसलिए उसका जवाब नहीं दिया जा सकता।

छोटे कर्जदारों पर सख्ती, बड़े कर्जदारों पर नरमी का आरोप

विवेक वेलणकर ने इस अंतर पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जब बैंक के आंकड़े खुद दिखाते हैं कि बड़े डिफॉल्टरों से केवल करीब 15 प्रतिशत रकम ही वापस आई, जबकि छोटे कर्जदारों से करीब 74 प्रतिशत रिकवरी हुई, तब बड़े कर्जदारों की पहचान छिपाना सार्वजनिक जवाबदेही का सवाल बन जाता है। उनका आरोप है कि बैंक छोटे कर्जदारों के नाम सार्वजनिक करने, नोटिस देने और उनकी संपत्तियां बेचने में ज्यादा तत्पर दिखाई देते हैं, जबकि बड़े कर्जदारों के मामले में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया जाता है।
उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि बड़े कर्जों को मंजूरी देने तथा बाद में उनकी वसूली न कर पाने के लिए बैंक के बोर्ड की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

सुभाष चंद्रा के मामले ने बहस को और तेज किया

इसी बहस के बीच NCLT का सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया से जुड़ा फैसला महत्वपूर्ण हो गया है। NCLT ने करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत कर्ज दावों के मुकाबले केवल 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान वाली पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है। इसका अर्थ है कि कर्जदाताओं को लगभग 99.97 प्रतिशत का हेयरकट स्वीकार करना होगा। यानी कर्जदाताओं को उनके स्वीकृत दावों का करीब 0.03 प्रतिशत ही वापस मिलेगा।

LIC Housing Finance ने किया था विरोध

इस योजना का विरोध करने वाले प्रमुख कर्जदाताओं में LIC Housing Finance शामिल था। उसने दलील दी थी कि करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले लगभग 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान और 25 लाख रुपये की प्रक्रिया लागत का प्रावधान इतना कम है कि योजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। LIC Housing Finance का खुद का स्वीकृत दावा 1,322.39 करोड़ रुपये था, जबकि प्रस्तावित भुगतान उसके लिए केवल 38,09,294 रुपये, यानी उसके दावे का लगभग 0.028 प्रतिशत, था। कर्जदाताओं ने यह भी तर्क दिया कि योजना में 6.5 करोड़ रुपये की रकम को अंतिम और निश्चित भुगतान के बजाय संकेतात्मक बताया गया था, जिससे योजना की निश्चितता पर सवाल उठता है।

दो सदस्यीय NCLT बेंच में आया था मतभेद

इस मामले में पहले NCLT की दो सदस्यीय बेंच में मतभेद सामने आया था। दोनों सदस्यों के अलग-अलग फैसले के बाद NCLT के अध्यक्ष ने मतभेद दूर करने के लिए तीसरे सदस्य के तौर पर Nilesh Sharma को नियुक्त किया। शर्मा ने तीसरे सदस्य के तौर पर योजना को मंजूरी देते हुए कर्जदाताओं की आपत्तियों को खारिज कर दिया। योजना को कर्जदाताओं के 80.81 प्रतिशत वोटिंग शेयर का समर्थन मिला था। विरोध करने वाले कर्जदाताओं के पास कुल वोटिंग शेयर का 20 प्रतिशत से कम हिस्सा था।

NCLT ने क्यों मंजूर की इतनी कम रकम?

NCLT के मुताबिक समाधान पेशेवर द्वारा किए गए मूल्यांकन में चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति की कीमत प्रस्तावित भुगतान से काफी कम थी। ट्रिब्यूनल ने माना कि अगर योजना खारिज होती और चंद्रा दिवालिया हो जाते, तो विरोध करने वाले कर्जदाताओं के लिए इससे ज्यादा रकम हासिल करना मुश्किल हो सकता था। NCLT ने यह भी कहा कि योजना मंजूर होने और व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया खत्म होने के बाद चंद्रा दोबारा आर्थिक गतिविधियों में लौट सकेंगे और इससे कर्जदाताओं को मूल कर्जदारों से अपनी रकम वसूलने की बेहतर संभावना मिल सकती है।
ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी भूमिका कर्जदाताओं के कारोबारी फैसले की जगह अपना फैसला रखना नहीं है। उसका काम कानूनी ढांचे के भीतर योजना की निगरानी और न्यायिक समीक्षा करना है, न कि कर्जदाताओं की व्यावसायिक समझ का स्थान लेना।

विरोध करने वाले कर्जदाताओं पर भी योजना लागू होगी

NCLT ने कहा कि IBC की धारा 114 के तहत योजना मंजूर होने के बाद धारा 115 के अनुसार यह सभी कर्जदाताओं पर बाध्यकारी होगी। इसका मतलब है कि जिन कर्जदाताओं ने योजना का विरोध किया था, वे भी योजना से बाहर जाकर अपने पूरे पुराने कर्ज की स्वतंत्र रूप से वसूली नहीं कर सकते। NCLT ने कहा कि अगर विरोध करने वाले कर्जदाताओं को पूरी रकम की अलग से वसूली की अनुमति दी जाती है तो इससे IBC की पूरी व्यवस्था और कर्जदाताओं के बीच समानता का सिद्धांत प्रभावित होगा।

एक ही तस्वीर के दो पहलू

सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के आरटीआई आंकड़े और सुभाष चंद्रा का NCLT मामला सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं। फिर भी दोनों मामलों से बैंकिंग और दिवाला व्यवस्था के सामने एक ही बुनियादी सवाल उभरता है—क्या बड़े कर्जदारों के मामलों में सार्वजनिक धन की वसूली पर्याप्त प्राथमिकता है?
एक तरफ बैंक के आंकड़े बताते हैं कि 26,701.55 करोड़ रुपये के बड़े कर्ज राइट ऑफ किए जाने के बावजूद सिर्फ 3,874.41 करोड़ रुपये की रिकवरी हुई। दूसरी तरफ व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया में 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों के सामने सिर्फ 6.5 करोड़ रुपये की भुगतान योजना को कानूनी मंजूरी मिल गई। बैंकिंग व्यवस्था के लिए चुनौती यह है कि ऐसे मामलों में कानूनी रूप से सही समाधान और सार्वजनिक हित में पर्याप्त रिकवरी—इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
साथ ही यह सवाल भी बना हुआ है कि बड़े डिफॉल्टरों के नाम, राइट ऑफ और हेयरकट से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए, खासकर तब जब बैंकों में जमा धन का बड़ा हिस्सा आम नागरिकों की बचत से आता है। यही वजह है कि बड़े कर्जदारों की कम रिकवरी, भारी हेयरकट और छोटे कर्जदारों की अपेक्षाकृत अधिक वसूली के आंकड़े अब सिर्फ बैंकिंग का तकनीकी मुद्दा नहीं रह गए हैं। यह पारदर्शिता, समान व्यवहार और सार्वजनिक धन की जवाबदेही से जुड़ा व्यापक सवाल बन गया है।