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ट्रंप को खुश करने के लिए मोदी अमेरिका को देंगे कई रियायतें, बदले में क्या मिलेगा?

राष्ट्रवाद की बातें करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के भारत दौरे के मौके पर अमेरिका को कई तरह की अतिरिक्त रियायतें देने का फ़ैसला कर लिया है। लेकिन अमेरिका इसके बदले भारत को इस तरह की कोई ख़ास छूट नहीं देने जा रहा है।
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अमेरिका को क्या मिलेगा?

ट्रंप के भारत आने के पहले ही यह तय किया जा चुका है कि भारत अमेरिका को डेरी उत्पाद, कृषि उत्पाद और दूसरे कई तरह के सामान बेचने के लिए अतिरिक्त छूट देगा और अपना बाज़ार उसके लिए खोल देगा। अमेरिका के बहुचर्चित मोटर साइकिल ब्रांड हार्ले डेविडसन के लिए बाज़ार खोला जाएगा और आयात कर में छूट दी जाएगी। 

भारत क्रैनबेरी, ब्लूबेरी, पीकैन नट्स और एवोकैडो जैसे कृषि उत्पादों के लिए आयात शुल्क कम कर देगा। इथेनॉल से निकलने वाले उत्पाद डिस्टिल्ड ग्रेन्स सॉल्यूबल, अल्फाल्फा की भूसी जैसे चारा उत्पादों के आयात की मंजूरी दे देगा।
भारत डेरी उत्पादों के आयात की छूट भी देने को राजी हो गया है। इसके अलावा मेडिकल उपकरणों की उच्चतम कीमत तय करने के मामले में भी भारत अमेरिका को छूट देने को तैयार हो गया है। 

अमेरिका भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह अमेरिकी मास्टर कार्ड और वीज़ा जैसे कार्ड को ख़ास तरजीह दे। इसी तरह अमेरिका अमेज़ॉन जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों और वॉल मार्ट जैसी शॉपिग मॉल कंपनियों के लिए भी विशेष छूट चाहता है।
भारत ने अब तक इन मामलों पर अंतिम फ़ैसला नहीं लिया है, पर वह वॉशिंगटन के दबाव में है। 

भारत को क्या मिलेगा?

अमेरिका इसके बदले भारत को छोटी-मोटी रियायतें ही देने को तैयार हुआ है। वह भारत से आयात किए जाने वाले आम, अंगूर जैसे फलों पर आयात शुल्क कम करने को राज़ी है।
अमेरिका अल्युमिनियम उत्पादों, इस्पात उत्पादों जैसी ज़्यादा कीमती चीजों पर आयात शुल्क कम करने की बात तो दूर, इन उत्पादों के आयात की छूट तक देने को तैयार नहीं है।

जीपीएस से भारत बाहर

अमेरिका ने बीते साल भारत को जीपीएस या जनरलाइज्ड प्रीफरेंस सिस्टम से बाहर कर दिया था। इसका मतलब यह हुआ कि भारत को कुछ उत्पादों के अमेरिका को निर्यात करने की छूट थी, कुछ  उत्पादों पर कम शुल्क लगता था। वह सुविधा बंद हो चुकी है। भारत चाहता है कि अमेरिका उसे जीपीएस सिस्टम में फिर ले आए, यानी ये सुविधाएँ बहाल कर दे। 

बीते दिनों वॉशिंगटन ने भारत को विकासशील देशोें की सूची से बाहर कर दिया और इसे विकसित देशों की सूची में डाल दिया। इससे भारत को कुछ उत्पादों के निर्यात पर कम शुल्क देना होता था, वह सुविधा उसे नहीं मिलेगी। इससे भारत को नुक़सान है। भारत चाहता है कि ट्रंप प्रशासन भारत को ये सुविधाएँ देता रहे।

भारत और अमेरिका के बीच बीते साल 88 अरब डॉलर का दोतरफा व्यापार हुआ। व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है यानी भारत ने अमेरिका से जितना आयात किया, उसकी तुलना में 17 अरब डॉलर अधिक का निर्यात उसे किया। 

ट्रंप का उग्र राष्ट्रवाद!

व्यापार असंतुलन से अमेरिका ख़फ़ा है। इसकी मूल वजह यह है कि यह डोनल्ड ट्र्ंप के उग्र राष्ट्रवादी नारा अमेरिका फ़र्स्ट में फिट नहीं बैठता है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि कई देशों ने व्यापार समझौते में उससे ग़लत छूट ले रखी है, जिससे अमेरिका को नुक़सान होता है।
अमेरिका का मानना है कि उसे ऐसे व्यापार क़रार ख़त्म कर देना चाहिए या उन देशों से बराबरी के आधार पर अधिक रियायत की माँग की जानी चाहिए। 

इसी नीति के तहत अमेरिका ने कनाडा, मेक्सिको और चीन जैसे देशों की बांहें मरोड़ी, अब वह ऐसा ही भारत के साथ करना चाहता है। अमेरिका की यह यात्रा उसी मक़सद से हो रही है। 

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