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सेवा क्षेत्र सात महीने के न्यूनतम स्तर पर

देश की अर्थव्यवस्था बुरे दौर में है और अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी हो चुकी है। एक के बाद एक तमाम इंडीकेटर यही संकेत दे रहे हैं। ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, सेवा क्षेत्र का विकास दर अप्रैल महीन में गिर कर सात महीनों के न्यूनतम स्तर तक पहुँच गया।

सोमवार को जारी मासिक आर्थिक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है। निकेई इंडिया सर्विस बिज़नेस एक्टिविटी इनडेक्स अप्रैल के अंत में गिर कर 51 अंक पर पहुँच गया। यह पिछले साल के सितंबर के अंक से भी नीचे है। इसकी एक वजह चुनाव की वजह से सेवा क्षेत्र के कामकाज में आई अड़चन मानी जाती है, पर चुनाव अकेला कारण नहीं है। समझा जाता है कि यह दिखाता है कि पूरी अर्थव्यवस्था ही धीमी रफ़्तार से चल रही है।

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महंगाई का दबाव कम

जानकारों का यह भी कहना है कि सेवा क्षेत्र में लागत और कीमत दोनों ही पहले से कमज़ोर हैं, इसे मंदी के लक्षण के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि महंगाई दर का दबाव पहले से कम है, यानी महंगाई की दर कम हो रही है।
दरअसल मामला यह है कि अर्थव्यवस्था बुरे दौर में काफ़ी समय से है, तमाम इंडीकेटर इस ओर ही इशारा करते हैं। लेकिन इसमें सुधार होने के बजाय यह और धीरे धीरे नीचे की ओर ही जा रही है। 

सेवा क्षेत्र यह संकेत देता रहता है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े दूसरे क्षेत्र कैसा काम कर रहे हैं क्योंकि वे तमाम क्षेत्र किसी न किसी रूप में सेवा क्षेत्र से जुड़े होते हैं। इसमें गिरावट अधिक चिंताजनक है।

दोपहिए-चारपहिए की बिक्री गिरी

बीते कुछ दिन पहले दोपहिए और चार पहिए वाली गाड़ियों की बिक्री में भी कमी आई थी। इसे भी अर्थव्यवस्था की मंदी के संकेत के रूप में देखा गया था। मोटरगाड़ी उद्योग की हालत इतनी बुरी है कि पिछले दो साल में गाड़ी बेचने वाले सेक्टर को 2,000 करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ है। इस दौरान 300 से ज़्यादा डीलरों को अपना कामकाज बंद कर देना पड़ा है और कम से कम 3,000 लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं। 

उपभोक्ता सामानों की माँग घटी

इसके पहले यह ख़बर आई थी कि तेल-साबुन और खाने-पीने जैसे उपभोक्ता सामान की माँग घट गयी है। नीलसन की रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्काल खपत उपभोक्ता माल यानी एफ़एमसीजी उद्योग की वृद्धि दर धीमी होकर इस साल 11-12 प्रतिशत रह जाने की संभावना है। यह वर्ष 2018 के मुकाबले क़रीब दो प्रतिशत कम होगा। इसे अर्थव्यवस्था के धीमी होने या विकास की रफ़्तार के कम होने का संकेत माना जाता है। इसका साफ़ अर्थ यह हुआ कि सामान ख़रीदने की लोगों की क्षमता कम हुई है। इससे यह भी पता चलता है कि लोगों की आय में गिरावट आयी है। 

सरकार ने माना, अर्थव्यवस्था धीमी

इन तमाम ख़बरों के बीच सरकार लगातार इससे इनकार करती रही है कि अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है। लेकिन बीते दिनों जब वित्त मंत्रालय की मासिक रिपोर्ट आई तो सरकार को मानना पड़ा कि अर्थव्यवस्था वाकई धीमी रफ़्तार से चल रही है।

वित्त मंत्रालय ने मार्च के माहवारी रिपोर्ट में यह कहा है कि निजी खपत कम होने, निवेश गिरने और निर्यात कम होने की वजह से अर्थव्यवस्था सुस्त हो गई है। अर्थव्यवस्था के जानकार, उद्योग जगत और मीडिया यह बात काफ़ी पहले से कह रहे हैं। वे यह बता रहे हैं कि किस तरह अर्थव्यवस्था के तमाम इंडीकेटर यह दिखा रहे हैं कि अर्थव्यवस्था धीमी चल रही है, पर सरकार यह मानने को तैयार नहीं थी। वह तरह तरह के तर्क देती रही है, बहाने बनाती रही है और तमाम खबरों और रिपोर्टो को खारिज करती रही है। पहली बार मोदी सरकार ने माना है कि अर्थव्यवस्था धीमी है।

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