भारत-अमेरिका ट्रेड डील की फैक्टशीट में पहले ‘डिजिटल सर्विसेज टैक्स खत्म’ करने की बात कही गई और अब इस दावे को हटा लिया गया? आख़िर यह बदलाव क्यों?
यूएस भारत ट्रेड डील पर फैक़्टशीट में 'कुछ दालों' को लेकर जैसी असमंजस की स्थिति बनी, अब वैसी ही स्थिति डिजिटल सर्विसेज टैक्स को लेकर भी बनी है। एक दिन पहले ही व्हाइट हाउस की फ़ैक्टशीट में दावा किया गया था कि 'भारत डिजिटल सर्विसेज टैक्स ख़त्म करेगा', वहीं अब नयी फ़ैक्टशीट में इस दावे को हटा दिया गया है। अब सिर्फ डिजिटल व्यापार नियमों पर बातचीत की बात कही गई है। भारत पहले ही विदेशी कंपनियों पर लगने वाली इक्वलाइजेशन लेवी को हटा चुका है। तो क्या दोनों देश डिजिटल व्यापार को आसान बनाने की कोशिश में डिजिटल सर्विसेज टैक्स पर बड़ा बदलाव कर रहे हैं? आख़िर यह डिजिटल सर्विसेज टैक्स क्या है और अमेरिका इस पर इतना जोर क्यों दे रहा है?
इसे समझने के लिए पहले यह जान लीजिए कि अमेरिका ने डिजिटल सर्विसेज टैक्स को लेकर हाल में क्या कहा है। अमेरिका ने सोमवार को दावा किया कि भारत-अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते के तहत भारत अपना डिजिटल सर्विसेज टैक्स यानी डीएसटी हटा देगा। लेकिन भारत के आधिकारिक बयान में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं था। यह दावा पिछले हफ्ते हुए व्यापार समझौते के बाद आया था, जिसमें अमेरिका ने भारतीय सामानों पर अपना टैरिफ 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति दी थी।
अमेरिका ने पहले क्या कहा था?
व्हाइट हाउस ने सोमवार को अपनी फ़ैक्टशीट में लिखा था, 'भारत अपने डिजिटल सर्विसेज टैक्स हटाएगा और दोनों देश मिलकर मज़बूत द्विपक्षीय डिजिटल व्यापार नियमों पर बातचीत करेंगे। ये नियम डिजिटल व्यापार में भेदभावपूर्ण या बोझिल नियम-कायदों और अन्य बाधाओं को दूर करेंगे, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने का नियम भी शामिल है।'
लेकिन भारत की तरफ़ से जारी बयान में डिजिटल सर्विसेज टैक्स हटाने की कोई बात नहीं कही गई। भारत ने सिर्फ़ डिजिटल व्यापार की बाधाओं को कम करने की बात की है। खास बात यह है कि भारत ने पहले ही अपना इक्वलाइजेशन लेवी को हटा दिया है। यह लेवी अमेरिका के लिए बड़ी चिंता का विषय थी।
डिजिटल सर्विसेज टैक्स क्या होता है?
यह एक ऐसा टैक्स है जो गूगल, मेटा, अमेजन जैसी ऑनलाइन सेवा देने वाली विदेशी कंपनियों पर लगाया जाता है। किसी देश के यूजरों से डिजिटल सर्विसेज के ज़रिए कमाई की जाती है, भले ही उनका कोई ऑफिस उस देश में न हो। ऑनलाइन विज्ञापन, ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटप्लेस के लिए विदेशी कंपनियों पर टैक्स लगाया जाता है। यह टैक्स गूगल, मेटा, अमेजन जैसी बड़ी टेक कंपनियों को प्रभावित करता है।
इक्वलाइजेशन लेवी क्या था?
भारत में इक्वलाइजेशन लेवी 2016 में फाइनेंस एक्ट के तहत शुरू की गई। शुरू में सिर्फ विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय बिजनेस को दिए जाने वाले ऑनलाइन विज्ञापन पर 6 प्रतिशत लेवी लगती थी। 2020 में इसे बढ़ाया गया। विदेशी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स द्वारा बेचे या सुविधा दिए गए सामान या सेवाओं पर 2 प्रतिशत लेवी लगाई गई।
अमेरिका को क्यों आपत्ति थी?
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव यानी यूएसटीआर ने 2021 में एक रिपोर्ट में कहा कि भारत का यह टैक्स अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण है। भारतीय कंपनियों को छूट है, लेकिन विदेशी कंपनियों पर टैक्स लगता है। इससे अमेरिकी कंपनियों को सालाना 30 मिलियन डॉलर से ज़्यादा का नुक़सान हो सकता था। यह अंतरराष्ट्रीय टैक्स नियमों के ख़िलाफ़ भी था और डबल टैक्सेशन की समस्या पैदा करता था।
भारत ने लेवी कब और कैसे हटाई?
लेवी लगाए जाने के बाद जब आपत्ति आने लगी तो भारत ने इसे कई चरणों में ख़त्म किया-
- 1 अगस्त 2024 से ई-कॉमर्स पर 2 प्रतिशत लेवी हटा दी गई।
- 1 अप्रैल 2025 से ऑनलाइन विज्ञापन पर 6 प्रतिशत लेवी पूरी तरह ख़त्म कर दी गई।
और इस तरह भारत का स्टैंडअलोन डिजिटल सर्विसेज टैक्स रिजीम पूरी तरह ख़त्म हो गया। यह क़दम वैश्विक टैक्स नियमों से मेल खाने और अमेरिका जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ संघर्ष को कम करने के लिए उठाया गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 26 के बजट में 6 प्रतिशत लेवी हटाने की घोषणा की थी, खासकर ट्रंप प्रशासन के जवाबी टैरिफ की चिंता के बीच।
अमेरिकी टेक कंपनियों को क्या फायदा?
गूगल, मेटा और अमेजन जैसी कंपनियाँ भारत के डिजिटल विज्ञापन बाज़ार में क़रीब 65 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती हैं। इसका बाजार मूल्य क़रीब 5.82 अरब डॉलर है। लेवी हटने से विज्ञापनदाताओं की लागत कम हुई, जिससे इन प्लेटफॉर्म्स की कमाई और मार्जिन बेहतर हुई।
क्या विदेशी डिजिटल कंपनियां अब भारत में बिना टैक्स के हैं? इक्वलाइजेशन लेवी हटने का मतलब यह नहीं कि कोई टैक्स नहीं लगेगा। 2018 से सिग्निफिकेंट इकोनॉमिक प्रेजेंस यानी SEP फ्रेमवर्क है, जो भारत में ज़्यादा कमाई या यूजरों वाली विदेशी कंपनियों पर टैक्स लगाता है। जीएसटी के तहत ओआईडीएआर यानी ऑनलाइन इंफॉर्मेशन एंड डेटाबेस एक्सेस या रिट्रीवल सर्विसेज पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगता है। यह नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, एडोब, माइक्रोसॉफ्ट 365, ऑनलाइन गेमिंग, क्लाउड सर्विसेज आदि पर लागू होता है।
बाक़ी देशों पर अमेरिका का क्या रुख?
अमेरिका डिजिटल सर्विस टैक्स यानी डीएसटी को गूगल, फ़ेसबुक, अमेज़न जैसी अमेरिकी बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण और अंतरराष्ट्रीय कर सिद्धांतों के विपरीत मानता है। इसलिए वह ऐसे टैक्स लगाने वाले देशों पर टैरिफ़ जैसा दबाव डालता है।
फ्रांस, इटली, स्पेन, ऑस्ट्रिया, यूके और तुर्की जैसे देशों ने डीएसटी लगाया है। अमेरिका ने 2019-2020 में इन पर सेक्शन 301 जांच शुरू की और 25% तक टैरिफ लगाने की धमकी दी। बाद में ओईसीडी के Pillar 1 समझौते के कारण अस्थायी समझौते हुए, जहाँ टैरिफ़ रोके गए और डीएसटी को Pillar 1 लागू होने तक सीमित रखा गया। लेकिन 2025 में ट्रंप प्रशासन ने फिर से जाँच शुरू करने और टैरिफ़ की धमकी दी है।कनाडा ने 2024 में डीएसटी लगाया, लेकिन अमेरिकी टैरिफ़ के दबाव के बाद 2025 में इसे वापस ले लिया। अमेरिका ने यूएसएमसीए यानी अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा समझौता के तहत विवाद भी शुरू किया। मलेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, इक्वाडोर जैसे कई विकासशील देशों ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों में डीएसटी न लगाने या अमेरिकी कंपनियों पर भेदभाव न करने का वादा किया। अमेरिका ने इन देशों से ऐसे समझौते किए जहां डीएसटी पर रोक लगी।
क्यों विरोध करता है अमेरिका?
डीएसटी मुख्य रूप से अमेरिकी कंपनियों पर लगता है, क्योंकि बड़ी डिजिटल कंपनियां अमेरिका की हैं। अमेरिका मानता है कि यह डबल टैक्सेशन पैदा करता है और अनुचित है। वह ओईसीडी के Pillar 1 के तहत वैश्विक समाधान चाहता था, लेकिन अब एकतरफा कार्रवाई कर रहा है।
कुल मिलाकर, अमेरिका डीएसटी को अमेरिकी कंपनियों पर जबरन वसूली मानता है और ऐसे देशों पर व्यापारिक प्रतिबंध या टैरिफ से दबाव बनाता है। कई देशों ने इसी दबाव में डीएसटी को कमजोर किया या हटा दिया है।