शरतचंद्र के साहित्य का सबसे बड़ा विषय है समाज बनाम व्यक्ति। उनके पात्र अक्सर उस व्यवस्था से टकराते हैं जिसे उन्होंने स्वयं नहीं बनाया। एक तरफ समाज के नियम हैं और दूसरी तरफ मनुष्य की इच्छाएं। एक तरफ परिवार की प्रतिष्ठा है और दूसरी तरफ प्रेम।
भारतीय साहित्य में ऐसे रचनाकार कम हैं जिनकी लोकप्रियता का भूगोल उनकी भाषा की सीमाओं से इतना आगे निकल गया। शरत चंद्र उन बिरले साहित्यकारों की जमात में अपनी अलग आभा के साथ 150 साल बाद भी चमक रहे हैं। 2026 शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का 150वाँ जयंती वर्ष है। यह मौका सिर्फ एक बहुत लोकप्रिय बंगाली लेखक को याद करने का नहीं, बल्कि यह देखने का भी है कि उन्होंने किस गहराई और सादगी से लिखते हुए भारतीय समाज, स्त्री-पुरुष संबंधों, प्रेम, जाति, विवाह, नैतिकता और सामाजिक रूढ़ियों को भाषा और भूगोल की सीमाएँ लांघते हुए समूचे भारतीय साहित्य के केंद्र में ला दिया।
शरतचंद्र ने बांग्ला में लिखा, लेकिन उनके पात्र और उनकी समस्याएं बंगाल तक सीमित नहीं रहीं। प्रेम, विवाह, जाति, वर्ग , स्त्री की अस्मिता, सामाजिक प्रतिष्ठा, गरीबी, नैतिकता और मनुष्य की कमजोरियां—ये सब भारतीय समाज के साझा अनुभव थे। इसलिए देवदास, परिणीता, श्रीकांत, चरित्रहीन, दत्ता, गृहदाह, बिराज बहू, पथेर दाबी जैसे उपन्यास और उनकी अनेक कहानियां बांग्ला से निकलकर भारतीय भाषाओं के पाठकों और बाद में सिनेमा के दर्शकों तक पहुंचीं।
शरतचंद्र का जन्म 15 सितंबर 1876 को हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ था । आर्थिक अभाव के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं हो सकी। बचपन का एक बड़ा हिस्सा भागलपुर में बीता और बाद में रोजी-रोटी की तलाश उन्हें बर्मा, यानी आज के म्यांमार, ले गई। वहां उन्होंने अलग-अलग नौकरियां कीं। जीवन का यह भटकाव उनके साहित्य के लिए किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं था। उन्होंने केवल भद्रलोक समाज को नहीं देखा; मजदूरों, गरीबों, निम्नवर्गीय लोगों और समाज के हाशिए पर पड़े स्त्री-पुरुषों के जीवन को भी बहुत नज़दीक से देखा।यही कारण है कि शरतचंद्र के साहित्य में समाज किसी अमूर्त अवधारणा की तरह नहीं आता। वह परिवार के भीतर मौजूद है, विवाह में मौजूद है, जाति में मौजूद है, प्रेम में मौजूद है और सबसे बढ़कर मनुष्य के भीतर मौजूद है।
गरीबी से निकले लेखक ने हाशिए पर पड़े लोगों पर लिखा
शरतचंद्र का जीवन स्वयं उनके साहित्य की तरह सीधा नहीं था। उनके पिता मोतीलाल साहित्यिक रुचि रखते थे, लेकिन परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझता रहा। शरतचंद्र की औपचारिक शिक्षा अधूरी रह गई। बाद में उन्होंने नौकरी की तलाश में बर्मा का रुख किया और वहां लंबे समय तक रहे। 1916 में वे हावड़ा लौटे और धीरे-धीरे पूर्णकालिक लेखक के रूप में स्थापित हुए।उनका पहला प्रकाशित उपन्यास बड़दीदी था, जिसने उन्हें लगभग रातोंरात पहचान दिलाई। इसके बाद परिणीता, पल्ली समाज, देवदास, चरित्रहीन, दत्ता, श्रीकांत, गृहदाह, देना-पावना, पथेर दाबी और शेष प्रश्न जैसी रचनाएं सामने आईं। उनकी भाषा सहज थी और कथानक पाठक को बांधे रखते थे। यही सरलता उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक शक्ति बनी।
शरतचंद्र की लोकप्रियता केवल इसलिए नहीं थी कि वे प्रेम और भावनाओं की कहानियां लिखते थे। उनके प्रेम में समाज हमेशा मौजूद रहता है। प्रेम करने वाले दो लोग केवल दो व्यक्ति नहीं होते- उनके पीछे जाति, परिवार, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा, धर्म और लैंगिक नैतिकता खड़ी होती है। इसीलिए उनका साहित्य प्रेम-कथाओं से कहीं अधिक है।
शरतचंद्र के साहित्य का सबसे बड़ा विषय है समाज बनाम व्यक्ति। उनके पात्र अक्सर उस व्यवस्था से टकराते हैं जिसे उन्होंने स्वयं नहीं बनाया। एक तरफ समाज के नियम हैं और दूसरी तरफ मनुष्य की इच्छाएं। एक तरफ परिवार की प्रतिष्ठा है और दूसरी तरफ प्रेम। एक तरफ स्त्री से अपेक्षित आदर्शवादी 'चरित्र' है और दूसरी तरफ उसकी अपनी इच्छाएं। एक तरफ जाति और वर्ग की दीवारें हैं और दूसरी तरफ मनुष्य की समानता। शरतचंद्र इन संघर्षों का फैसला हमेशा किसी आदर्शवादी समाधान के रूप में नहीं करते। कई बार उनके पात्र हारते हैं। कई बार वे टूट जाते हैं। कई बार आत्म-विनाश की ओर चले जाते हैं। इसका देवदास से ज्यादा लोकप्रिय उदाहरण और कहाँ मिलेगा। पितृसत्ता, परिवार , जाति , वर्ग की बेड़ियों में जकड़ा हुआ , हारा हुआ , कायर , अहंकार, संकोच का मारा हुआ नाकाम प्रेमी , पछतावे की आग में खुद को झुलसाता हुआ, अपने अधूरे प्रेम की स्मृति में भटकता हुआ , आत्मविनाश की ओर बढ़ता हुआ एक कमज़ोर इंसान। लेकिन शरत चंद्र की कलम से पैदा हुआ वही देवदास भारतीय समाज में हर पीढ़ी के नौजवान के लिए एक साँचा है प्रेमी का , जिसके चेहरे में वह कभी न कभी अपना अक्स भी देखता है। भारतीय सिनेमा के लिए तो शरत चंद्र जैसे देवदास के रूप में एक ऐसा किरदार थमा गये हैं जो फिल्म बनाने वालों , अभिनेताओं और दर्शकों सबका बहुत चहेता नायक है पिछले लगभग सौ सालों से। उसकी पीड़ा और छटपटाहट से हमदर्दी न हो ऐसा हो नहीं सकता।
यह शरत चंद्र के लेखन की, उनकी मानवीय दृष्टि की बहुत बड़ी ताकत है।
'देवदास': केवल असफल प्रेम की कहानी नहीं
रवींद्र नाथ टैगोर, विभूति शरण बंदोपाध्याय की तरह शरतचंद्र भी एक ऐसे लेखक हैं जिनकी रचनाओं ने साहित्य से सिनेमा की स्वाभाविक यात्रा की है। एक दौर था जब साहित्य और सिनेमा का संबंध केवल कहानी लेने तक सीमित नहीं था। फिल्मकार साहित्य से सामाजिक दृष्टि भी ग्रहण करते थे। हिंदी सिनेमा में शरतचंद्र को सबसे गंभीरता से अपनाने वाले फिल्मकारों में विमल रॉय का नाम सबसे ऊपर आता है। विमल रॉय ने शरत चंद्र के तीन उपन्यासों -परिणीता , बिराज बहू और देवदास - पर फिल्में बनाई। यह महज तीन लोकप्रिय उपन्यासों का फिल्मी रूपांतरण नहीं था।
दरअसल, शरतचंद्र की मनुष्य-केंद्रित दुनिया और विमल रॉय का यथार्थवादी सिनेमा एक-दूसरे के लिए असाधारण रूप से उपयुक्त थे। बिराज बहू में घरेलू जीवन और स्त्री की नियति को कामिनी कौशल ने बेहतरीन अभिनय से जीवंत किया है , परिणीता में अशोक कुमार और मीना कुमारी के माध्यम से प्रेम और सामाजिक-संपत्ति संबंध और देवदास में दिलीप कुमार, सुचित्रा सेन , वैजयंती माला और मोतीलाल के ज़रिये प्रेम, परिवार, जाति, वर्ग, पितृसत्ता, पुरुष अहंकार , पश्चाताप, आत्मविनाश के विषय विमल रॉय के सिनेमाई यथार्थवाद के लेंस से ऐसे प्रस्तुत हुए कि कालजयी, क्लासिक सिनेमा जगमगाते नगीने बन गए। साहित्य के औसत पाठकों के लिये शरतचंद्र की सबसे लोकप्रिय रचना देवदास है। लेकिन देवदास को केवल असफल प्रेम की कहानी समझना उसके सामाजिक अर्थ को सीमित कर देना है। देवदास और पार्वती के बीच प्रेम है, लेकिन उनके बीच सामाजिक स्थिति की दीवार भी है। देवदास निर्णय लेने में असमर्थ है।
पार्वती सामाजिक व्यवस्था के भीतर रहते हुए अपना रास्ता खोजने की कोशिश करती है। चंद्रमुखी वेश्या है, समाज की नज़रों में 'गिरी हुई' मानी जाने वाली स्त्री है, लेकिन कहानी में उसकी मनुष्यता और संवेदना देवदास की नैतिक कमजोरी से कहीं अधिक गहरी दिखाई देती है। 'चरित्र' की सामाजिक परिभाषा पर भी शरतचंद्र प्रश्न खड़ा करते हैं। देवदास की स्थायी शक्ति शायद यही है कि इसमें कोई एक खलनायक नहीं है। सामाजिक व्यवस्था है, परिवार है, वर्ग है, अहंकार है, संकोच है और सबसे बढ़कर मनुष्य की अपनी कमजोरी है। देवदास में वर्गीय अंतर, सामाजिक रूढ़ि और व्यक्तिगत चुनाव के बीच का तनाव एक शानदार फ़िल्मी पटकथा समाये हुए है । उपन्यास का नायक देवदास पितृसत्ता, परिवार , जाति , वर्ग की बेड़ियों में जकड़ा हुआ , हारा हुआ , कायर , अहंकार, संकोच का मारा हुआ नाकाम प्रेमी , पछतावे की आग में खुद को झुलसाता हुआ, अपने अधूरे प्रेम की स्मृति में भटकता हुआ , आत्मविनाश की ओर बढ़ता हुआ एक कमज़ोर इंसान है । लेकिन शरत चंद्र की कलम से पैदा हुआ वही देवदास भारतीय समाज में हर पीढ़ी के नौजवान के लिए एक साँचा है प्रेमी का , जिसके चेहरे में वह कभी न कभी अपना अक्स भी देखता है।
भारतीय सिनेमा के लिए तो शरत चंद्र देवदास के रूप में एक ऐसा किरदार थमा गये हैं जो फिल्म बनाने वालों , अभिनेताओं और दर्शकों सबका बहुत चहेता है पिछले लगभग सौ सालों से। उसकी पीड़ा और छटपटाहट से हमदर्दी न हो ऐसा हो नहीं सकता। इसीलिए देवदास बार-बार फिल्म में रूपांतरित होता है और हर पीढ़ी उसे सिनेमा के परदे पर अपने तरीके से पढ़ती है। कुंदनलाल सहगल से दिलीप कुमार और फिर शाहरुख खान तक देवदास का चेहरा बदलता रहा, लेकिन उसका बुनियादी किरदार नहीं बदला। देवदास , पारो और चंद्रमुखी के त्रिकोणीय प्रेम की इस त्रासद कहानी में प्रेम से ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रेम का पूरा न हो पाना। भारतीय रोमांटिक कल्पना में अधूरा प्रेम अक्सर पूर्णता पा चुके प्रेम से कहीं अधिक गहरा , मारक और स्थायी होता है। बकौल ग़ालिब - वो खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
देवदास की दिक्कत यह नहीं है कि समाज उसे पारो से प्रेम करने या मिलने नहीं देता। उसका संकट उसकी अपनी सोच है , उसकी अपनी कमज़ोरी जिसकी वजह से वह निर्णायक क्षणों में निर्णय नहीं ले पाता और बाद में जीवन भर खुद को पछतावे की आग और शराब के नशे में डुबो कर अंततः नष्ट हो जाता है। एक कमज़ोर से इंसान की कहानी को यूँ बयान करना कि वह एक महान प्रेमी की त्रासदी में बदल जाये, यह शरतचंद्र की ताकत है।
विमल रॉय की देवदास के कई दशकों बाद देवदास फिर बड़े पैमाने पर हिंदी सिनेमा में लौटा। संजय लीला भंसाली की 2002 की देवदास में शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित थे। यह विमल रॉय के अपेक्षाकृत यथार्थवादी संसार से बिल्कुल अलग भड़कीली दृश्य-भाषा वाली फिल्म थी। शरतचंद्र की कहानी भव्यता, रंग, संगीत और स्टारडम की चमकदमक में खो गई । इसी तरह प्रदीप सरकार की परिणीता , जिसमें सैफ अली खान और विद्या बालन थे, ने शरतचंद्र की कहानी को नई पीढ़ी के दर्शकों के सामने रखा। यहां एक दिलचस्प सांस्कृतिक प्रक्रिया दिखाई देती है—हर पीढ़ी शरतचंद्र को अपने समय के सौंदर्यशास्त्र और सामाजिक प्रश्नों के साथ दोबारा खोजती है। उनकी रचनाओं पर भारतीय भाषाओं में बड़ी संख्या में फिल्में बनी हैं। देवदास अकेले ही अनेक भारतीय भाषाओं में बार-बार फिल्माया गया है; श्रीकांत, चरित्रहीन, बिराज बहू, दत्ता, निष्कृति, बड़ी दीदी, मझली दीदी, परिणीता, पथेर दाबी और दूसरी रचनाओं ने भी सिनेमा को लगातार सामग्री दी।
स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश करती महिलाएं शरतचंद्र के साहित्य की असली शक्ति
शरतचंद्र को याद करते समय उनके स्त्री पात्रों को नजरअंदाज करना नामुमकिन है। देवदास में पार्वती और चंद्रमुखी , बिराज बहू में बिराज, परिणीता में ललिता, श्रीकांत में राजलक्ष्मी और अभया, चरित्रहीन की स्त्रियां, सभी अपने-अपने समय की सामाजिक सीमाओं से, बेड़ियों से जूझती , अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश करती महिलाएं हैं।शरतचंद्र को भारतीय साहित्य में स्त्री-जीवन का अत्यंत संवेदनशील लेखक माना जाता है। उनके समय में स्त्री का जीवन मुख्यतः परिवार, विवाह और सामाजिक प्रतिष्ठा की सीमाओं में परिभाषित किया जाता था।
उन्होंने स्त्री को केवल प्रेमिका, पत्नी या मां के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसके भीतर की इच्छा, असहमति, आत्मसम्मान और विद्रोह को भी साहित्य का विषय बनाया। उनके साहित्य में सामाजिक भेदभाव, रूढ़ियों और धर्म के नाम पर चलने वाली कुरीतियों के खिलाफ स्पष्ट स्वर मिलता है।हालाँकि उनकी प्रगतिशील लगती दृष्टि अपने समय की सीमाओं , पूर्वाग्रहों और पुरुषवादी सोच से पूरी तरह मुक्त नहीं थी। उनके लेखन में जाति और लैंगिक दृष्टिकोण में मौजूद अंतर्विरोधों की झलक भी है। जहां वे सामाजिक रूढ़ियों और स्त्री पर होने वाले अन्याय के तीखे आलोचक दिखाई देते हैं, वहीं उनके यहां जाति और पितृसत्ता के प्रति एक ढुलमुल रवैया भी मौजूद है।
राष्ट्रवाद और 'पथेर दाबी'
शरतचंद्र को केवल प्रेम और सामाजिक उपन्यासों का लेखक समझना भी उनके कद को छोटा करना होगा। शरतचंद्र भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थक थे और बंगाल कांग्रेस से जुड़े रहे। 1921 के असहयोग आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और वे हावड़ा जिला कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। चित्तरंजन दास और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं से उनके घनिष्ठ संबंध थे। शरतचंद्र की विशेषता यह है कि उनका राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक नारा नहीं बनता। वह मनुष्य की स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति के प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। उनके उपन्यास पथेर दाबी में यह राजनीतिक चेतना सीधे दिखाई देती है। ब्रिटिश सरकार ने इसके क्रांतिकारी तेवर के कारण इसे प्रतिबंधित कर दिया था। पथेर दाबी पर बांग्ला निर्देशक सृजित मुखर्जी की फिल्म एंपरर वर्सेज़ शरत चंद्र संभवत: शरत चंद्र की 150वीं सालगिरह के साल में दुर्गा पूजा के दौरान परदे पर आ जाये। यह शरत को एक नए तरीके से याद करना होगा।रवींद्र नाथ टैगोर और शरतचंद्र: गुरु-चेले लेकिन मतभेदों के साथ
शरतचंद्र रवींद्र नाथ टैगोर को अपना गुरु मानते थे और खुद को उनका परम शिष्य कहते थे । टैगोर उम्र में शरत से 15 साल बड़े थे। शरत चंद्र की शुरुआती रचना "बड़ दीदी" आने तक टैगोर नोबेल पुरस्कार पा चुके थे। उन्होंने बड़ दीदी को पढ़ कर शरत चंद्र को एक असाधारण शक्तिशाली लेखक के रूप में सराहा था। उधर , शरत चंद्र ने हमेशा अपनी साहित्यिक सफलता को काफी हद तक टैगोर की रचनाओं के अध्ययन का नतीजा माना। दोनों में एक दूसरे के लिए बहुत सम्मान था लेकिन वैचारिक और राजनीतिक मतभेद भी थे। शरत चंद्र खादी पहनते थे और सूत कातते थे लेकिन उन्होंने महात्मा गांधी और टैगोर दोनों से कहा था कि आज़ादी चरखा नहीं दिलाएगा , सैनिक दिलाएंगे। इस मामले में शरत चंद्र सुभाष चंद्र बोस के नज़दीक थे।
शरत चंद्र हथियारबंद क्रांति के समर्थक थे और क्रांतिकारियों की मदद करते रहते थे।गुरु-चेले के इस रिश्ते में ‘पथेर दाबी’ को लेकर काफी तनाव आ गया था। जब अंग्रेज़ सरकार ने ‘पथेर दाबी’ पर प्रतिबंध लगाया तब शरत चंद्र ने इसके खिलाफ टैगोर से मदद मांगी लेकिन टैगोर ने एक लम्बा पत्र लिख कर मना कर दिया। टैगोर का तर्क था कि जब राज्य से टकराव मोल लिया है तो जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए। टैगोर ने यह भी कहा था कि ब्रिटिश सरकार ने सिर्फ किताब पर पाबन्दी लगायी है, शरत को जेल नहीं भेजा जो सरकार की उदारता है। शरत को इससे ठेस पहुंची थी। उन्हें बुरा लगा कि "राष्ट्र कवि" लेखक का समर्थन करने के बजाय सरकार की उदारता की तारीफ कर रहे हैं।टैगोर और शरतचंद्र दोनों अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक हलचलों से गहरे जुड़े थे, दोनों मानवतावादी थे, दोनों राष्ट्रवाद पर विचार करते थे, लेकिन उनकी साहित्यिक दृष्टि, मनुष्य को देखने का नजरिया और राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की परिकल्पना काफी अलग थी।
टैगोर की दृष्टि में एक अभिजातीयता है । वह ऊपर से नीचे और बाहर की ओर फैलती है—व्यक्ति से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व-मानवता तक। शरतचंद्र की दृष्टि नीचे से ऊपर उठती है- परिवार, प्रेम, स्त्री, गरीब, वंचित और आम मनुष्य से समाज और राष्ट्र तक। टैगोर टैगोर के लिए 'राष्ट्र' एक सांस्कृतिक अवधारणा था। टैगोर का राष्ट्रवाद जटिल है। वे राष्ट्र की स्वतंत्रता के समर्थक थे, लेकिन राष्ट्रवाद को मनुष्य से बड़ा बनाने के विरोधी थे। 1905 के बंग-भंग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने स्वदेशी की भावना को सांस्कृतिक रूप देने के लिए गीत लिखे, राखी-बन्धन जैसे प्रतीकात्मक आयोजनों को बढ़ावा दिया। लेकिन बाद में उन्होंने उस राष्ट्रवाद की आलोचना की जो संकीर्णता, हिंसा या दूसरे के प्रति घृणा पैदा करता है। उनके लेखन में पश्चिमी राष्ट्र-राज्य की मशीनरी और उसके आक्रामक राष्ट्रवाद की आलोचना मिलती है। इसलिए टैगोर का भारत केवल राजनीतिक सीमाओं से बना राष्ट्र नहीं था। वह सभ्यताओं, भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के सह-अस्तित्व का विचार था।
उनके लिए भारतीयता का अर्थ पश्चिम से नफरत करना भी नहीं था। वे भारतीय संस्कृति को विश्व-संस्कृति के साथ संवाद में देखते थे। यहीं से उनका विश्वभारती का विचार निकलता है—भारत विश्व से कटकर नहीं, बल्कि विश्व के साथ संवाद करके अपनी सांस्कृतिक पहचान मजबूत करे। उधर, बोहेमियन जीवन शैली वाले शरतचंद्र का राष्ट्रवाद जमीन से ज्यादा जुड़ा है। शरतचंद्र के यहां राष्ट्र कोई अमूर्त दार्शनिक अवधारणा नहीं है। उनका भारत देवदास, पारो, बिराज, ललिता, श्रीकांत, राजलक्ष्मी और उन असंख्य सामान्य लोगों का भारत है, जिनकी ज़िंदगी सामाजिक रूढ़ियों, गरीबी, जाति, लैंगिक असमानता और पारिवारिक सत्ता से प्रभावित होती है।इसीलिए शरतचंद्र के लिए राष्ट्र की मुक्ति का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं हो सकता। उनके साहित्य की ध्वनि है जिस समाज में व्यक्ति स्वतंत्र नहीं है, उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।
टैगोर 'मनुष्य' को राष्ट्र से ऊपर रखते हैं; शरतचंद्र 'मनुष्य' के जीवन में राष्ट्र को खोजते हैं
यह शायद दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण फर्क है। टैगोर पूछते हैं: राष्ट्र मनुष्य के लिए है या मनुष्य राष्ट्र के लिए? और उनका उत्तर स्पष्ट है—मनुष्य राष्ट्र से बड़ा है। शरतचंद्र भी मूलतः इसी तरफ हैं, लेकिन उनकी पद्धति अलग है। वे कोई दार्शनिक व्याख्यान नहीं देते। वे दिखाते हैं कि जब समाज व्यक्ति पर अपनी इच्छाएं थोपता है तो क्या होता है। देवदास में प्रेम पर सामाजिक प्रतिष्ठा हावी होती है। परिणीता में विवाह, संपत्ति और सामाजिक स्थिति प्रेम के बीच दीवार बनते हैं। बिराज बहू में स्त्री का जीवन परिवार और आर्थिक परिस्थितियों से नियंत्रित होता है। चरित्रहीन में समाज की नैतिकता और स्त्री की वास्तविक मनुष्यता के बीच संघर्ष है। यानी टैगोर विचार के स्तर पर मनुष्य को मुक्त करते हैं; शरतचंद्र कथा के स्तर पर उसकी बेड़ियां दिखाते हैं। टैगोर की भारतीयता समावेशी और विश्वमुखी है।
टैगोर के लिए भारतीय संस्कृति की शक्ति उसकी विविधता में है। उनके यहां भारत हिंदू भारत नहीं है, बंगाली भारत नहीं है और न ही केवल राजनीतिक भारत।यह एक ऐसी सभ्यता है जिसमें अनेक परंपराएं साथ-साथ विकसित हुई हैं। गोरा इसका शानदार उदाहरण है। गोरा शुरू में एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी पहचान से जुड़ा हुआ है। लेकिन उपन्यास के अंत में उसकी पहचान की पूरी जमीन बदल जाती है। उसे एहसास होता है कि भारत किसी एक धर्म, जाति या संप्रदाय की संपत्ति नहीं है। यहीं टैगोर की राष्ट्रीय चेतना का गहरा सांस्कृतिक अर्थ सामने आता है। शरतचंद्र में भी सांप्रदायिक संकीर्णता के विरुद्ध स्वर है, लेकिन उनका रास्ता अलग है। शरतचंद्र की राष्ट्रीय चेतना ज्यादा भावनात्मक और जनसाधारण के अनुभव से निर्मित होती है। पथेर दाबी इसका सबसे राजनीतिक उदाहरण है। इसमें औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ क्रांतिकारी चेतना दिखाई देती है जिस वजह से ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित भी किया था। लेकिन शरतचंद्र के राष्ट्रवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे सामाजिक अन्याय को राष्ट्र की समस्या से अलग नहीं करते। उनके लिए स्वतंत्रता का सवाल व्यक्ति के जीवन से जुड़ा हुआ है। दोनों की स्त्री-दृष्टि में भी एक दिलचस्प अंतर है। टैगोर के स्त्री पात्र—बिमला (घरे-बाइरे), चारुलता (नष्टनीड़), मृणाल (स्त्रीर पत्र)—आधुनिक स्त्री चेतना और आत्मनिर्णय के सवाल उठाते हैं। लेकिन टैगोर अक्सर स्त्री की स्वतंत्रता को बौद्धिक और नैतिक आत्मनिर्णय के सवाल से जोड़ते हैं। शरतचंद्र की स्त्रियां ज्यादा सीधे सामाजिक जीवन से टकराती हैं। उनके लिए प्रश्न है: वह स्त्री जिसे समाज 'चरित्रवान' या 'चरित्रहीन' कहता है, क्या वह स्वयं अपने जीवन का निर्णय कर सकती है? इसलिए शरतचंद्र की स्त्री-दृष्टि अधिक लोकप्रिय और भावनात्मक असर पैदा करती है।
टैगोर का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद 'उच्च संस्कृति' से लेकर लोक संस्कृति तक
टैगोर केवल साहित्यकार नहीं थे। वे संगीतकार, चित्रकार, शिक्षाविद और सांस्कृतिक संस्थान निर्माता भी थे। उन्होंने गीत, नृत्य, शिक्षा, रंगमंच, चित्रकला और साहित्य को एक व्यापक सांस्कृतिक परियोजना की तरह देखा। 'जन गण मन' और 'आमार सोनार बांग्ला' दो अलग राष्ट्रों के राष्ट्रीय गीत बने—यह अपने आप में उनकी सांस्कृतिक पहुंच की असाधारण मिसाल है। उनकी राष्ट्रीय चेतना में संस्कृति राजनीति का विकल्प नहीं, बल्कि राजनीति को मानवीय बनाने का माध्यम है। शरतचंद्र की सांस्कृतिक शक्ति इसके विपरीत मुख्यतः कथा और पात्रों से आती है। उन्होंने कोई विश्वभारती नहीं बनाई; उन्होंने भारतीय समाज के भीतर के मनुष्य को साहित्य में जगह दी।यहां दोनों के बीच एक बहुत दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। टैगोर राष्ट्रवाद से विश्वमानववाद की ओर जाते हैं। जबकि शरतचंद्र आम मनुष्य से राष्ट्र की ओर जाते हैं। टैगोर पूछते हैं: “भारत विश्व को क्या दे सकता है?” शरतचंद्र जैसे पूछते हैं: “भारत अपने ही लोगों को न्याय और गरिमा कब देगा?” और दोनों सवाल अंततः एक ही जगह पहुंचते हैं—मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा। इसलिए दोनों को 'राष्ट्रवादी लेखक' कह देना उनका एकांगी परिचय है। टैगोर को केवल राष्ट्रगीत के रचयिता और राष्ट्रवादी कवि के रूप में देखना उनकी पूरी वैचारिक दुनिया को छोटा करना है। इसी तरह शरतचंद्र को केवल देवदास के लेखक के रूप में देखना भी उनके साहित्य के साथ अन्याय है। टैगोर की सबसे बड़ी चिंता थी:ऐसा समाज और ऐसी सभ्यता जिसमें मनुष्य भय से मुक्त होकर सोच सके। शरतचंद्र की सबसे बड़ी चिंता थी:ऐसा समाज जिसमें मनुष्य सामाजिक रूढ़ियों के कारण अपना जीवन न गंवाए।
एक ने स्वतंत्रता को चेतना की स्वतंत्रता के रूप में देखा। दूसरे ने उसे जीवन की स्वतंत्रता के रूप में महसूस कराया। और शायद दोनों को साथ पढ़ने का सबसे सार्थक निष्कर्ष यही है: टैगोर हमें बताते हैं कि भारत क्या बन सकता है; शरतचंद्र हमें दिखाते हैं कि भारत को वहां पहुँचने से कौन रोक रहा है। टैगोर की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना आकाश की ओर खुलती है—विश्वमानव तक। शरतचंद्र की चेतना जमीन पर उतरती है—घर, परिवार, स्त्री, प्रेम और सामाजिक न्याय तक। इसीलिए भारतीय आधुनिकता को समझने के लिए दोनों जरूरी हैं। टैगोर भारत की आत्मा का दार्शनिक विस्तार हैं, तो शरतचंद्र उसके सामाजिक अंतःकरण की बेचैनी।
शरतचंद्र का सबसे बड़ा साहित्यिक गुण: सरल भाषा में मनुष्य के मन की जटिलता की कहानी कहना
शरतचंद्र की भाषा में दिखावटी साहित्यिकता नहीं है। वह पाठक को प्रभावित करने के लिए कठिन शब्दों का सहारा नहीं लेते। उनकी भाषा बोलचाल के करीब है। लेकिन इस सरल भाषा के भीतर मनुष्य के मन की जटिलता मौजूद है। यही कारण है कि उनके साहित्य का अनुवाद संभव हुआ। 1919 में बिराज बहू का हिंदी अनुवाद प्रकाशित हुआ और इसके बाद उनकी रचनाएं मराठी, गुजराती और दूसरी भारतीय भाषाओं में पहुँचती गईं। श्रीकांत का पहला अंग्रेजी अनुवाद 1922 में प्रकाशित हुआ। इस अर्थ में शरतचंद्र केवल बंगाली साहित्य के लेखक नहीं रहे। वे आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच एक सांस्कृतिक सेतु बन गए।शरत चंद्र के लेखन की प्रतिष्ठा, उसकी कीर्ति और उसका प्रभाव इतना व्यापक था कि महात्मा गांधी भी उससे अछूतों नहीं रह सके थे। उन्होंने अपने सचिव महादेव देसाई से शरत चंद्र की कुछ रचनाओं का गुजराती में अनुवाद कराया ताकि गुजरात का पाठक उन्हें आसानी से पढ और समझ सके।
'चरित्रहीनता' और नैतिकता का सवाल
शरतचंद्र के समय में 'चरित्र' शब्द विशेष रूप से स्त्रियों के लिए सामाजिक नियंत्रण का हथियार था। उनका उपन्यास ‘चरित्रहीन’ इसी नैतिक व्यवस्था पर सवाल उठाता है। कौन चरित्रहीन है? वह स्त्री जो सामाजिक नियम तोड़ती है? या वह समाज जो स्त्री की इच्छाओं को मान्यता देने से इंकार करता है? शरतचंद्र की रचनाओं में वेश्याएं, विधवाएं, प्रेम करने वाली स्त्रियां और सामाजिक मानकों से अलग जीवन जीने वाले पात्र बार-बार आते हैं। वे उन्हें केवल नैतिक दोष के प्रतीक के रूप में नहीं देखते। उनकी मनुष्यता को सामने लाते हैं। इसलिए उनकी स्त्री-दृष्टि आज भी बहस पैदा करती है।शरतचंद्र अपनी रचनाओं में 'भद्रलोक' की नैतिकता पर भी उंगली उठाते हैं। यहाँ उनका लेखन, उनका नज़रिया टैगोर से काफी अलग है। शायद इसलिये भी कि दोनों का जीवन और उससे उपजे अनुभव काफी अलग थे। शरत चंद्र के किरदारों में उनके अपने जीवन के प्रतिबिंब मिलते हैं। विष्णु प्रभाकर ने शरत की सबसे प्रामाणिक जीवनी ‘आवारा मसीहा’ में उनके रहन-सहन, सोच, भटकाव, अकेलापन, नशा, वेश्याओं से संपर्क का वर्णन किया है। ‘श्रीकांत’ में शरतचंद्र छद्म नाम से अपने आप को ही प्रस्तुत करते हैं । शरतचंद्र का साहित्य बंगाल के उस भद्रलोक समाज की भी आलोचना है जिसने आधुनिक शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा तो हासिल कर ली थी, लेकिन अपने निजी जीवन में जाति, पितृसत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा की पुरानी दीवारों को काफी हद तक बनाए रखा। उनके पात्र इन्हीं अंतर्विरोधों के बीच रहते हैं। वे आधुनिक होना चाहते हैं, लेकिन समाज उन्हें पुराना रहने के लिए मजबूर करता है। वे प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन जाति और परिवार रोकते हैं। स्त्री शिक्षा और स्वतंत्रता की बात होती है, लेकिन स्त्री की स्वतंत्र इच्छा अस्वीकार्य रहती है। यही कारण है कि शरतचंद्र का साहित्य अपने समय के सामाजिक परिवर्तन का दस्तावेज भी है।शरतचंद्र ने मनुष्य को उसके विरोधाभासों के साथ देखा। देवदास कमजोर है, लेकिन अपनी ही प्रेम कहानी का खलनायक नहीं। चंद्रमुखी समाज की नजर में 'गिरी हुई' है, लेकिन उसमें चारित्रिक दृढ़ता है, वह भीतर से अत्यंत संवेदनशील है। राजलक्ष्मी के भीतर प्रेम भी है और स्वाभिमान भी। ललिता सामाजिक व्यवस्था की शिकार है, लेकिन निष्क्रिय नहीं। उनकी दुनिया में अच्छे और बुरे मनुष्य की रेखा हमेशा साफ नहीं होती। यही उनकी कथा-कला को सामाजिक उपदेश से साहित्य में बदल देती है।
उनकी लोकप्रियता का रहस्य क्या है? शरतचंद्र की लोकप्रियता को समझने के लिए तीन शब्द पर्याप्त हैं— सरलता, संवेदना और संघर्ष। उनकी भाषा सरल है। उनकी संवेदना मनुष्य के पक्ष में है। और उनके पात्र हमेशा किसी न किसी संघर्ष में हैं। इसलिए उनका पाठक केवल कहानी नहीं पढ़ता; वह पात्रों के दुख में अपना दुख खोजता है। शरतचंद्र की मृत्यु 1938 में हो गई, लेकिन उनकी लोकप्रियता उसके बाद निरंतर बढ़ती गई। उनकी रचनाओं का अनुवाद होता रहा, फिल्में बनती रहीं, टेलीविजन धारावाहिक बने और नई पीढ़ियां उनके पात्रों को अपने समय के संदर्भ में फिर पढ़ती रहीं।150 साल बाद शरतचंद्र को पढ़ना इसलिए जरूरी नहीं है कि वे महान लेखक थे—हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं। उन्हें पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि जिन सवालों से वे जूझ रहे थे, उनमें से बहुत से सवाल आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। अंतरजातीय विवाह पर परिवार की आपत्ति आज भी है। स्त्री की स्वतंत्रता पर सामाजिक निगरानी आज भी है। विधवा और तलाकशुदा स्त्री को लेकर पूर्वाग्रह आज भी हैं। प्रेम और परिवार की प्रतिष्ठा का संघर्ष आज भी है। जाति और वर्ग की दीवारें आज भी हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—समाज आज भी अक्सर व्यक्ति के जीवन का फैसला उसकी अपनी इच्छा से ज्यादा सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर करता है। इसलिए देवदास केवल बीते जमाने के प्रेमी की कहानी नहीं है। परिणीता केवल औपनिवेशिक बंगाल की प्रेम-कहानी नहीं है। चरित्रहीन केवल एक स्त्री पर केंद्रित रचना नहीं है। ये हमारे समाज की मानसिक संरचनाओं की कहानियां हैं। और शायद यही शरतचंद्र की सबसे बड़ी विरासत है रवींद्रनाथ ठाकुर ने मनुष्य और प्रकृति, आत्मा और आधुनिकता, राष्ट्र और विश्व के प्रश्नों को विराट दार्शनिक धरातल पर उठाया। बंकिमचंद्र ने उपन्यास को आधुनिक बंगाली साहित्य में एक मजबूत रूप दिया। शरतचंद्र ने दूसरी दिशा में काम किया। उन्होंने घर के भीतर के मनुष्य को साहित्य का नायक बनाया। उन्होंने उस स्त्री को आवाज दी जिसकी आवाज परिवार की चारदीवारी में दब जाती थी। उस युवक को जगह दी जो सामाजिक अपेक्षाओं और अपनी इच्छाओं के बीच फँस जाता था।
उस गरीब को देखा जिसकी ज़िंदगी भद्रलोक साहित्य में अक्सर पृष्ठभूमि बनकर रह जाती थी। और उन्होंने यह सब ऐसी भाषा में किया जिसे आम पाठक समझ सके। यही वजह है कि शरतचंद्र का साहित्य बंगाल की सीमाओं से बाहर निकलकर भारतीय साहित्य और सिनेमा का हिस्सा बन गया। उनकी रचनाओं पर तमाम भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों की संख्या चाहे जितनी भी हो, तथ्य यह है कि भारतीय सिनेमा में शरतचंद्र की उपस्थिति असाधारण रूप से लंबी और व्यापक रही है। और देवदास इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कुंदन लाल सहगल से दिलीप कुमार और शाहरुख खान तक, पारो और चंद्रमुखी के अनेक रूपों तक, सिनेमा ने हर दौर में शरतचंद्र को फिर से गढ़ा है। लेकिन हर बार मूल प्रश्न वहीं लौटता है: क्या मनुष्य को अपने जीवन का चुनाव करने की स्वतंत्रता है, या समाज उसके लिए पहले ही तय कर चुका है कि उसे कैसे जीना है? शायद यही वह सवाल है जो शरतचंद्र को 150 साल बाद भी प्रासंगिक बनाता है। इसलिए शरतचंद्र की सबसे बड़ी विरासत उनकी किताबों की संख्या या उन पर बनी फिल्मों की संख्या नहीं है। शरतचंद्र एक लोकप्रिय लेखक से आगे भारतीय समाज के अंतर्विरोधों के कथाकार हैं। उनकी असली विरासत है—मनुष्य के पक्ष में खड़ी हुई वह करुणा, जो सामाजिक नैतिकता से पहले व्यक्ति की पीड़ा को देखती है। और यही कारण है कि शरतचंद्र के पात्र आज भी हमारे घरों, हमारे प्रेम-संबंधों, हमारे परिवारों और हमारी सामाजिक नैतिकता के बीच कहीं न कहीं जीवित हैं।