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सर्वे: बेरोज़गारी मुद्दा बनी तो बीजेपी होगी मुश्किल में

अगर अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी के मसले पर वोट डाले गये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी को बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। हो सकता है कि वह दुबारा प्रधानमंत्री न बनें। शायद यही कारण है कि मोदी 11 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के चुनाव से ठीक पहले अपनी सरकार की उपलब्धियों की जगह राष्ट्रवाद, पुलवामा हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक और हिंदू-मुसलिम विवाद को मुद्दा बनाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं।

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सीएसडीएस-लोकनीति-द हिंदू-तिरंगा टीवी-दैनिक भास्कर के चुनाव पूर्व सर्वे में यह बात बिलकुल साफ़ उभर कर आयी है कि बेरोज़गारी का मुद्दा गंभीर रूप ले चुका है। इस सर्वे से यह साफ़ है कि रोज़गार देने के मसले पर मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड मनमोहन सिंह सरकार के रिपोर्ट कार्ड की तुलना में ख़राब है। 24 मार्च से 31 मार्च के बीच 19 राज्यों में किये गये इस सर्वेक्षण में यह तथ्य उभरकर आया है कि 47 फ़ीसदी लोग यह मानते हैं कि पिछले तीन-चार सालों में नौकरी पाना मुश्किल हो गया है। 18 से 35 साल की उम्र वालों के बीच यह आँकड़ा 50 फ़ीसदी है, जबकि कॉलेज से पढ़कर निकले युवाओं में यह संकट और बड़ा है। इस तबक़े के बीच क़रीब 53 फ़ीसदी लोग यह मानते हैं कि नौकरी पाना एक बड़ी समस्या है।

ऐसा नहीं है कि बेरोज़गारी की दिक्कत भारत के किसी एक क्षेत्र में है, उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम, सब जगह बेरोज़गारी एक बड़ा सिर दर्द बन गयी है।

उत्तर भारत में यदि 46 फ़ीसदी लोग यह कहते हैं कि नौकरी पाना मुश्किल हो गया है तो पूरब में भी 46 फ़ीसदी लोग बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं। जबकि दक्षिण में 44 फ़ीसदी, पश्चिम और मध्य भारत में 51 फ़ीसदी लोग बेरोज़गारी से त्रस्त हैं। इन आँकड़ों से साफ़ है कि कॉलेज से पढ़कर निकले युवाओं को नौकरी के लाले पड़े हुए हैं। लेकिन मोदी सरकार यह मानने को तैयार नहीं है कि बेरोज़गारी कोई मुद्दा भी है।

बता दें कि 2014 लोकसभा चुनाव के समय मोदी ने वादा किया था कि वह हर साल 2 करोड़ लोगों को रोज़गार देंगे। इसके उलट हाल के आँकड़े बताते हैं कि बेरोज़गारी पिछले 45 साल में ऊँचे पायदान पर खड़ी है।

मोदी सरकार एनएसएसओ और सीएमआईई जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के बेरोज़गारी के आँकड़ों को मानने के लिए तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी जहाँ पकौड़ा बनाने को भी रोज़गार से जोड़ दे रहे हैं तो उनके दूसरे मंत्री बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं कि पिछले पाँच साल में कई करोड़ रोज़गार पैदा किये गये हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बेरोज़गारी की यह समस्या मोदी जी के गले की हड्डी बनेगी?

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अर्थव्यवस्था पर भी अच्छी राय नहीं

सीएसडीएस-लोकनीति-द हिंदू-तिरंगा टीवी-दैनिक भास्कर का सर्वे अर्थव्यवस्था की स्थिति की भी अच्छी तसवीर नहीं पेश करता। सिर्फ़ 34 फ़ीसदी लोग यह मानते हैं कि अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है। जबकि 58 फ़ीसदी लोग अर्थव्यवस्था की स्थिति से बहुत संतुष्ट नहीं हैं। 58 फ़ीसदी में 33 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि अर्थव्यवस्था बस ऐसे ही चल रही है, जबकि 25 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि अर्थव्यवस्था की स्थिति ख़राब हुई है।

कृषि संकट में, लेकिन बीजेपी नहीं

पिछले पाँच सालों में खेती-किसानी का मुद्दा भी बहुत तेज़ी से ऊपर आया है। मध्य प्रदेश के मंदसौर में पुलिस की गोली से आंदोलन कर रहे छह किसानों की मौत हुई थी। कई बार देश के दूसरे हिस्सों से दिल्ली आकर किसानों ने अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया और धरने पर बैठे। महाराष्ट्र के किसान पदयात्रा कर मुंबई पहुँच कर अपनी माँग बुलंद की। लेकिन सीएसडीएस का यह सर्वे बड़ा चौंकाने वाला आँकड़ा पेश करता है। सर्वे में यह बात निकलकर सामने आयी कि किसान वाक़ई में तकलीफ में हैं, लेकिन इस वजह से प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी को बहुत परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।

सर्वे के आँकड़े कहते हैं कि जो किसान अपनी दुर्दशा के लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं उनमें से 41 फ़ीसदी इस पक्ष में हैं कि मोदी सरकार दुबारा सत्ता में आये। जबकि 47 फ़ीसदी इस राय के हैं कि दुबारा मौक़ा नहीं मिलना चाहिए।

सरकार में आने से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सबका साथ और सबका विकास’ का नारा दिया था। पिछले पाँच सालों में इस मसले पर उनकी जमकर आलोचना हुई और यह आरोप भी लगा कि उनकी सरकार अल्पसंख्यक तबक़े की परवाह नहीं करती। इस सर्वे में जब अलग-अलग धर्मों के लोगों से पूछा गया कि क्या वाक़ई मोदी सरकार सबका विकास कर रही है तो आँक़ड़े बहुत चौंकाने वाले नहीं दिखाई दिये। जहाँ हिंदू समाज के लोग मोदी सरकार की राय से सहमत दिखे वहीं अल्पसंख्यक तबक़ा मानता है कि मोदी के विकास मॉडल सबको साथ लेकर नहीं चलता। हिंदुओं में ऊँची जाति के लोग सबसे ज़्यादा संतुष्ट दिखे। 55 फ़ीसदी लोगों की राय है कि मोदी सबको साथ लेकर विकास कर रहे हैं। जबकि पिछड़ों में यह आँकड़ा 49 फ़ीसदी, दलितों में 41 फ़ीसदी और आदिवासियों में 32 फ़ीसदी है। सिर्फ़ 33 फ़ीसदी मुसलमान मानते हैं कि मोदी सरकार सबका विकास कर रही है जबकि ईसाइयों में यह आँकड़ा 26 और सिखों में 14 फ़ीसदी है।

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