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'रिपब्लिक टीवी देखता था, पुलिस कमिश्नर को धमकी दी'

हाल में यह बहस का मुद्दा रहा है कि क्या कुछ टीवी चैनलों की नफ़रत ने युवाओं के दिमाग़ में हिंसा की प्रवृत्ति को जन्म दिया है? मुंबई पुलिस कमिश्नर के साथ जो एक घटना घटी वह इसी तर्क को पुष्ट करती है। दरअसल, एक एमबीबीएस का छात्र मुंबई के पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के परिवार को मैसेज भेजकर कमिश्नर को धमकी दे रहा था। मुंबई पुलिस ने दावा किया कि जब छात्र को हिरासत में लिया गया तो उसने कहा कि वह सुशांत सिंह राजपूत की मौत मामले में रिपब्लिक टीवी के कार्यक्रमों से प्रभावित था। मुंबई पुलिस के बयान से ऐसा लगता है जैसे वह छात्र सुशांत सिंह मामले में मुंबई पुलिस की कार्रवाई से ख़ुश नहीं था और वह कुछ टीवी चैनलों पर चलाई जाने वाली रिपोर्टों को ही वह सही मानता था। 

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जो छात्र धमकी देने वाला मैसेज भेजता था उसके परिवार की सामाजिक स्थिति काफ़ी अच्छी है और उसके परिवार के लोग अच्छे-अच्छे पदों पर हैं। ऐसे परिवार से होने के बावजूद वह छात्र उन लोगों में से है जो हाल के दिनों में पुलिस कमिश्नर को धमकी वाले मैसेज भेजते रहे हैं। मुंबई मिरर की रिपोर्ट के अनुसार एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि पिछले कुछ हफ़्तों से मुंबई पुलिस कमिश्नर और उनके परिवार के सदस्यों को सोशल मीडिया और फ़ोन पर अलग-अलग तरह के मैसेज मिल रहे हैं। वे ऐसे मैसेज पर ध्यान नहीं दे रहे थे। पुलिस के अनुसार 'हाल के कुछ दिनों में एक व्यक्ति पुलिस कमिश्नर के नज़दीकी रिश्तेदार को सोशल मीडिया पर धमका रहा था कि वह पुलिस कमिश्नर को समझाएँ कि वह (पुलिस कमिश्नर) चुप रहें नहीं तो उन्हें चुप कराने के दूसरे तरीक़े भी वह जानता है।'

पुलिस के अनुसार, इस बीच जब औपचारिक तौर पर शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही थी तभी मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उसको पकड़ लिया। पुलिस को पता चला कि वह नवी मुंबई में एक मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस का छात्र है। मुंबई मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस अधिकारी ने कहा, 'जब हमने उससे पूछताछ की तो पता चला कि उसकी बहन चार्टर्ड एकाउंटेंट यानी सीए हैं, उसके पिता केमिकल इंजीनियर हैं जो एक फ़ैक्ट्री चलाते हैं।' रिपोर्ट के अनुसार छात्र के पिता ने कहा कि उनके बेटे की ग़लती थी और वह बहक गया था। बिना कार्रवाई के ही बेटे को छोड़ने के लिए उन्होंने पुलिस कमिश्नर का शुक्रिया अदा किया। 

इस मामले को लेकर मुंबई पुलिस कमिश्नर ने कहा,

परिवार के बैकग्राउंड और उसके भविष्य को देखते हुए हमने उसे छोड़ दिया। उसने हमें बताया कि वह पिछले कुछ दिनों से रिपब्लिक टीवी देख रहा था। यह लोगों की आँखें खोलने वाला होना चाहिए कि कैसे कुछ चैनलों पर ज़हरीली कवरेज कैसे युवाओं के दिमाग़ को प्रभावित कर रही है...।


परमबीर सिंह, मुंबई पुलिस कमिश्नर

मुंबई के पुलिस कमिश्नर जिन कुछ चैनलों की नफ़रत फैलाने वाली रिपोर्टों और युवाओं के दिमाग़ पर पड़ने वाले इसके असर का ज़िक्र कर रहे हैं, वह दरअसल, काफ़ी पहले से हो रहा है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत और रिया चक्रवर्ती का मामला तो अभी ताज़ा है लेकिन इससे पहले भी सुदर्शन टीवी के 'यूपीएससी जिहाद' कार्यक्रम, कोरोना के दौरान तब्लीग़ी जमात का मुद्दा, पालघर में साधुओं की हत्या जैसे कई मामलों में नफ़रत की भाषा कुछ टीवी चैनलों पर दिखी। 

कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त टिप्पणी भी की। सुदर्शन टीवी के 'यूपीएससी जिहाद' कार्यक्रम को लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूरे उस मीडिया के लिए संदेश दिया था जो किसी न किसी समुदाय को निशाना बनाते रहते हैं। 

अदालत ने कहा था कि वह पत्रकारिता के बीच में नहीं आना चाहती है लेकिन यह संदेश मीडिया में जाए कि किसी भी समुदाय को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।

टीवी के लिए बहस का मुद्दा क्या?

सुदर्शन टीवी के उस विवादित कार्यक्रम के मामले में हस्तक्षेप करने वाली लेखिका और शोधकर्ता डॉ. कोटा नीलीमा ने रिपब्लिक टीवी के अर्णब गोस्वामी और टाइम्स नाउ की नविका कुमार की बहसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को एक रिपोर्ट दी है। 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के अनुसार वकील सुनील फर्नांडीस के माध्यम से दाखिल अपनी रिपोर्ट में उन्होंने अर्णब गोस्वामी के 32 दिनों, 55 घंटों के कार्यक्रम और 76 बहसों के न्यज़ू कंटेंट का विस्तृत विश्लेषण पेश किया है। इसी तरह उन्होंने नविका कुमार के 24 दिनों, 20 घंटों के कार्यक्रम और 32 बहसों का विश्लेषण पेश किया है। उस रिपोर्ट के अनुसार अर्णब गोस्वामी द्वारा 31 जुलाई से 15 सितंबर तक कराई गई बहसों में से 65 फ़ीसदी और नविका कुमार द्वारा 16 जून से 6 अक्टूबर के बीच कराई गई बहसों में से 69 फ़ीसदी बहसें सिर्फ़ एक मुद्दे- सुशांत सिंह राजपूत पर थीं। 

हाल के दिनों में देश भर में टेलीविजन डिबेट में इस्तेमाल होने वाली भाषा और चीखने-चिल्लाने पर भी बहस तेज़ हुई है। कहा यह जाने लगा है कि टीवी में भाषा का स्तर इसलिए गिर रहा है कि कई टीवी चैनलों के लिए टीआरपी के खेल में पत्रकारिता मायने नहीं रखती है। डिबेट में चीखने-चिल्लाने की भाषा, नफ़रत फैलाने वाली रिपोर्टें और सांप्रदायिक मुद्दों को भड़काने वाले विषयों ने एक ऐसा घालमेल तैयार किया है जो न सिर्फ़ टीवी डिबेट में शामिल होने वाले कई लोगों को गालियों के लिए उकसाता है, बल्कि ऐसे दर्शक भी तैयार कर रहा है जो ऐसे टीवी चैनलों को टीआरपी देते हैं। 

इन्हीं सब के घालमेल ने अब ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि मानो 'सेक्युलर' होना ही ग़लत हो गया हो!

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