क्या यह न्यायसंगत नहीं होगा कि प्रशांत भूषण द्वारा एक रुपये का जुर्माना भरकर मुक्त होने को करोड़ों लोगों की ओर से जनहित के मामलों में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने से तीन वर्षों के लिए वंचित हो जाने की पीड़ा भुगतने से बच जाने के रूप में लिया जाए?
हम इस कठिन समय में न तो प्रशांत भूषण से गांधी जी जैसा महात्मा बन जाने या किसी अनुपम खेर से प्रशांत भूषण जैसा व्यक्ति बन जाने की उम्मीद कर सकते हैं।
प्रशांत भूषण की सजा अगर सिर्फ़ इतने तक सीमित रहती कि या तो वे एक रुपये का जुर्माना भरें या तीन महीने की जेल काटें तो निश्चित रूप से वे कारावास को प्राथमिकता देना चाहते।
प्रशांत भूषण का इस पूरे विवाद से सम्मानपूर्वक बाहर निकलना इसलिए ज़रूरी था क्योंकि नागरिकों की ज़िंदगी और उनके अधिकारों से जुड़े कई बड़े काम सुप्रीम कोर्ट से बाहर भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
जिस तरह की परिस्थितियाँ इस समय देश में हैं उसमें तीन साल तक एक ईमानदार वकील के मुँह पर ताला लग जाना यथा-स्थितिवाद विरोधी कई निर्दोष लोगों के लिए लम्बी सज़ाओं का इंतज़ाम कर सकता था। किन्ही दो-चार लोगों के आत्मीय सहारे के बिना तो केवल वे ही सुरक्षित रह सकते हैं, जो शासन-प्रशासन की ख़िदमत में हर वक्त हाज़िर रहते हैं।