भगवती चरण वर्मा की कहानी है ‘वसीयत’। उसमें पंडित चूड़ामणि मिश्र के परिवार के लोग जीते जी उनकी उपेक्षा करते हैं लेकिन उनकी मृत्यु के उपरांत धन के लालच में वसीयत पढ़े जाते समय प्रेम और सम्मान का दिखावा करते हैं। जिस उत्तराधिकारी की आलोचना होती है वह कुढ़ता है और जब कुछ मिल जाता है तो वह प्रशंसा करने लगता है। बाद में वसीयत में पंडित तोते के स्वर में अपने शिष्य जनार्दन जोशी से कहते हैं तुम मूर्ख हो और मैं पंडित। कहीं ऐसा न हो कि होमो सेपियन्स की मानव प्रजाति अपने निधन के बाद जो वसीयत छोड़ जाए उसको लेकर उसकी संतानें कुछ वैसा ही नाटक करें और जो नैतिकता की बात करे उसे बुद्धू बता दिया जाए।
इसराइल के मशहूर इतिहासकार युआल नोवा हरारी अपनी पुस्तक नेक्सस में कहते हैं कि हमारी प्रजाति बहुत बुद्धिमान है। क्योंकि उसने बेइंतहा तरक्की की है। लेकिन वह मूर्ख भी है क्योंकि वह अपने विनाश के उपकरण लगातार जमा करती जा रही है। वे कहते हैं कि जर्मनी ने एक अधिनायकवादी उपकरण खड़ा किया और तकरीबन एक करोड़ लोगों की जान ली। आख़िर में वह खुद भी धराशायी हो गया। लेकिन अब विनाश के उपकरण सार्वभौमिक हो गए हैं। वे मानव के नियंत्रण से बाहर निकलने को छटपटा रहे हैं। सर्वसत्तावाद सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं है। वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में पैदा हुई लोकतंत्र की लहर को शांत करता हुआ झूठ, अनैतिकता, सत्तालोलुपता, अफवाह, दुर्भावनापूर्ण सूचनाएँ, युद्ध और विनाश के नए औजारों को बाँटते हुए नई सृष्टि का सृजन कर रहा है। इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संपन्न सभ्यता नए क़िस्म की मूर्खताओं की ओर अग्रसर हो रही है।
जो लोग दूसरों को मूर्ख और स्वयं को अधिक बुद्धिमान समझते हैं वे कितने क़िस्म की मूर्खताएँ करते हैं उसकी तमाम कहानियाँ हमारी लोककथाओं में बिखरी पड़ी हैं। जैसे तीन जगह गंदगी लगने वाली कहानियाँ। उसकी एक झलक हाल में दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट सम्मिट 2026’ में दिखाई पड़ी। जो सम्मेलन एआई से जुड़े मानव प्रजाति के गंभीर सवालों पर चर्चा के लिए आयोजित हुआ था और जिस पर भारतीय मीडिया में तमाम पन्ने और घंटे खर्च भी किए वह कुल मिलाकर कुछ नेताओं के अहंकार और कुछ संस्थाओं के झूठ और मूर्खताओं का आयोजन बनकर रह गया।
संभव है कुछ अच्छी बातें हुई हों और कुछ सवाल उठे हों लेकिन बाहर जो संदेश गया वो यही गया कि गलगोटिया विश्वविद्यालय ने ओरियो (एक कुत्ता) नाम के एक रोबो को अपने केंद्र में विकसित बताकर दर्शाया और उसे आईटी मंत्री ने अपने ट्विटर खाते पर प्रचारित किया लेकिन बाद में जब चीन और नेटीजन ने यह असलियत उजागर की कि वह तो उनकी यूनीट्री नाम की कंपनी ने जीओ 2 नाम से विकसित किया है तो उन्हें मुंह छुपाने की जगह नहीं मिली।
यानी संसार को मूर्ख बनाने चले खुद ही मूर्ख बन गए। फिर तो एपस्टीन फाइल्स में विवादित माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स के भाषण का न होना और बाद में ओपेन एआई सीईओ सैम आल्टमैन का यह कहना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरा हाथ जबरदस्ती पकड़ कर उठा दिया और मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं।
आल्टमैन और डारियो अमोदेई का हाथ न मिलाना
इसी तरह की एक घटना उस समय भी हुई जब ओपेन एआई के सीईओ आल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई का हाथ मिलवाने की कोशिश हुई और वे दोनों अपनी मुट्ठी ही बांधे रहे। उन्होंने ऊपर उठा हुआ हाथ एक दूसरे से नहीं मिलाया। वे दोनों कंपनियां एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं। पंडित चूड़ामणि मिश्र की संतानों की इस लोभ लालच, पाखंड और फरेब देखकर संदेह होता है कि वे वास्तव में पंडित जी की विरासत के साथ क्या करेंगे। एआई पर होने वाला यह पहला अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन नहीं था और न ही भारत ने इसमें कोई विशेष क़िस्म का नवोन्मेष किया। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने अपने ‘मानव’ संबंधी जुमले के माध्यम से उन नैतिक सवालों को उठाने की एक हद तक कोशिश की जो पहले उठते रहे हैं। जैसा कि हमारी सरकार हर चीज का लोकलुभावन संक्षेपीकरण करती है वैसा इस ‘मानव’ के मामले में भी था। यहाँ एम का अर्थ मॉरल से था, ए से अकाउंटेबिलिटी, एन से नेशनल सावरिनिटी, ए से एक्सेसबल/इनक्लूसिव और वी से वैलिड/ लेजिटिमेट का मतलब था। यानी यह सम्मेलन नैतिकता, राष्ट्रीय संप्रभुता, पहुंच, समावेशिता, वैधता पर केंद्रित था।पहले के एआई सम्मेलनों में क्या हुआ?
इस बारे में पहला सम्मेलन ग्रेट ब्रिटेन के ब्लेटचेली पार्क में 2023 में हुआ था। उसका जोर इस बात पर था कि एआई से पैदा होने वाले खतरे को संभालने के लिए कैसे वैश्विक सहयोग विकसित किया जाए। उसके बाद दूसरा सम्मेलन दक्षिण कोरिया के सिओल में 2024 में हुआ। उस सम्मेलन में 27 देश इस बात पर राजी हुए कि किस प्रकार एआई से सुरक्षित रहने के लिए एक नेटवर्क बनाया जाए जो कि मानक निर्धारित करे। तीसरा सम्मेलन पेरिस में 2025 में हुआ जहां पर यह तय किया गया कि किस प्रकार इसके एकाधिकार को रोकने के लिए पारदर्शी एआई आधारभूत ढांचा बनाया जाए। एआई के बारे में जो गंभीर सवाल हैं क्या वे हमारी चिंताओं में हैं या फिर हम अपने को तकनीकी महाशक्ति दर्शाने या महाशक्तियों के साथ खड़े होने की होड़ में उनकी उपेक्षा करते जा रहे हैं?
एआई के तमाम विशेषज्ञों ने जो सवाल और संदेह खड़े किए हैं उन पर हमें विचार करना ही चाहिए और उनके समाधान की दिशा में बढ़ना चाहिए। सबसे पहले ज्योफ्री हिल्टन जिन्हें एआई का जनक कहा जाता है उनकी चिंताओं को देखना चाहिए। हिल्टन ने साफ़ तौर पर अफसोस जताया है कि काश! मैंने यह आविष्कार न किया होता। यह मानवता के लिए ख़तरा है। क्योंकि एआई अगले 20 वर्षों में मानव जाति की बुद्धिमत्ता को पीछे छोड़ सकती है। यह शैतानी शक्तियो के हाथों में पड़ सकती है और इससे जैविक हथियार बनाए जाने, बड़े पैमाने पर विस्थापन, बेरोजगारी, सामाजिक अस्थिरता और मानव के नियंत्रण के बाहर होने का खतरा है। इसी तरह की चिंता एक और विशेषज्ञ योशुआ बेनजिओ ने भी जताई है। उनका कहना है कि इससे विनाशकारी खतरा है।
एआई से जुड़े नैतिक सवाल वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में भी उठते रहे हैं। जैसे कि बेरोजगारी, असमानता, मानवता, कृत्रिम मूर्खता, नस्ली रोबो, सुरक्षा, शैतानी शक्तियां, अनियंत्रण की चुनौती और रोबो के अधिकार।
एआई के पक्ष में तर्क
अभी एआई के बारे में जो समझाइश दी जा रही है वो यही है कि पहले भी जब नई मशीनें आई थीं तो इसी तरह के तर्क दिए जाते थे कि उनसे मानव का रोजगार छिन जाएगा। लेकिन सभ्यता चली जा रही है और कोई खास दिक्कत नहीं आई। जब एआई मनुष्य ने बनाया है तो वह उसे नियंत्रित करना भी चाहेगा और अगर चाहेगा तो वह नियंत्रित कर लेगा। जो लोग बेरोजगार होंगे वे मानव समाज की सेवा के काम में लगेंगे। एक तरह से मनुष्य के पास रचनात्मक अवकाश होगा। क्योंकि दफ्तरों, शिक्षण संस्थाओं, फैक्टरियों, सेनाओं के काम को तो एआई संभालने जा रहा है। अगर एआई के माध्यम से ट्रक और गाड़ियां चलाने पर कम दुर्घटनाएं होती हैं तो एआई क्यों बुरा है। इससे तो मानवता सुरक्षित होगी।एआई से पैदा होना असली खतरे क्या?
लेकिन एआई से पैदा होने वाले खतरों को हम दुनिया में बढ़ते युद्ध और नवसाम्राज्यवाद के खतरों से अलग करके नहीं देख सकते। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने 20 जनवरी 2026 को वर्ल्ड इकानमिक फोरम की दावोस बैठक में जो बात कही है उस पर ध्यान देना चाहिए। उनका कहना था कि पुरानी विश्व व्यवस्था भीतर से फट गई है। नई विश्व व्यवस्था बननी चाहिए लेकिन वह अभी बन नहीं पाई है। दूसरी ओर अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने म्यूनिख के सुरक्षा सम्मेलन में फरवरी में दिए अपने भाषण में कहा है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो विऔपनिवेशीकरण का दौर चला वह वास्तव में पतन का दौर था। इसलिए अगर हमें पश्चिम की नई सदी कायम करनी है तो विश्व युद्ध से पूर्व के औपनिवेशिक दौर की प्रासंगिकता के बारे में सोचना चाहिए।
एआई के बढ़ते प्रभाव और हजारों किलोमीटर तक मार करने वाली स्वचलित नाभिकीय मिसाइलों के आविष्कार की रोशनी में इन इरादों को देखना चाहिए। कुछ विश्लेषक इसे डाटा साम्राज्यवाद के रूप में भी देखते हैं और कुछ एकाधिकारवाद के रूप में भी देखते हैं। भारत में हुए सम्मेलन में इन बड़े सवालों को कितना संबोधित किया गया कहा नहीं जा सकता। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के दौर में भारत विऔपनिवेशीकरण का अगुआ था। उसकी आजादी से प्रेरित होकर दुनिया के सौ से अधिक देश आजाद हुए थे। क्या आज भारत अपनी उस विरासत को याद रखेगा? या पंडित चूड़ामणि मिश्र की तरह अपनी लालची संतानों को विरासत सौंप कर पूरी मानव जाति के साथ यह कह कर सो जाएगा कि तुम मूर्ख हो और मैं पंडित हूं!