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क्या पीएम की सख़्त टिप्पणी के बाद संभलेंगे बीजेपी नेता?

आज जब ऐसा लगता है कि मोदी एक स्वस्थ प्रशासन देना चाह रहे हैं तो ऐसे में ये घटनाएँ उस ऐतिहासिक ख़तरे की ओर इशारा करती हैं जिसमें पार्टी के द्वितीयक और तृतीयक स्तर के नेता सत्ता उन्माद में ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जो समाज को डराता और चुभता है और तब आती है लोकप्रिय नेता की भूमिका। अगर उसने सही समय पर सख़्ती नहीं अपनाई तो दल को लालू, मुलायम और मायावती की पार्टी बनने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। 
एन.के. सिंह

अच्छा लगा जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरकारी अफ़सरों पर सरेआम “पहले आवेदन, फिर निवेदन और फिर दे दनादन” रणनीति के तहत “बैटिंग” करने वाले युवा बीजेपी विधायक के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक में सख़्त क़दम उठाने की बात कही। इससे सत्ता के नशे में चूर तमाम विधायक और सांसदों को एक सख़्त सन्देश गया है, ठीक वैसे ही जैसे साध्वी व भोपाल की सांसद को गया था। 
घटना के दिन अपनी प्रतिक्रिया में इस युवा विधायक ने बताया कि उसने “सड़क पर न्याय” की नयी पद्धति क्यों अपनाई। दरअसल, वह पहली बार विधायक बना यानी क़ानून बनाने की ताक़त मिली। लेकिन यह ताक़त तो संस्थागत है और तमाम जटिलताओं से और लम्बे काल से गुजर कर मुकम्मल होती है। तो क्या यह उचित नहीं था कि संस्थागत शक्ति के अमल की रफ़्तार बढ़ा कर विधानसभा जाने की जगह सीधे सड़क पर ही क़ानून बनाया जाये और जो उसका पालन न करे उसे वहीं सजा दे दी जाये? 
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“न्याय में देरी यानी न्याय से इनकार” की प्रचलित अवधारणा भारत में हर तीसरे दिन चर्चा में रहती है। तो अगर कोई क़ानून बनाने वाला इस जटिल प्रक्रिया - पहले क़ानून बनाओ, फिर प्रूफ़ के साथ देखो कि उल्लंघन हुआ कि नहीं, फिर उसे दशकों लम्बी और स्तर-दर-स्तर न्यायिक मकड़जाल की भट्टी में तपाओ की जगह सीधे नव-प्रतिपादित “दनादन सिद्धांत” के तहत “बैटिंग” के जरिये हासिल करता है तो क्या हम विश्लेषकों को इस पर गंभीरता से सोचना नहीं चाहिए? क्या ऐसी प्रक्रिया देश भर में नहीं तो जहाँ पार्टी शासन में है वहाँ प्रयोग में नहीं लानी चाहिए?
जो काम गाँधी, नेहरू, अन्ना हजारे आदि तो छोड़िये स्वयं मोदी अभी तक नहीं कर सके हैं वह अगर एक होनहार युवा विधायक कर रहा है तो क्या यह अपेक्षित नहीं है कि इस अवधारणा पर संसदीय दल की बैठक में सकारात्मक ढंग से चर्चा की जाये?
विपक्ष और ख़ासकर कांग्रेस इस युवा बीजेपी विधायक की अवधारणा को समझ गयी। लिहाज़ा, ऐसे ही एक पूर्व मुख्यमंत्री के होनहार पुत्र विधायक ने एक इंजीनियर पर कीचड़ भरी बाल्टी फिंकवाई और बताया कि आगे भी अगर सड़क ठीक नहीं बनी तो यही किया जाएगा। शायद उनका भाव ग़रीब भारत में “बैट” न्याय में लगने वाला बिला वजह ख़र्च बचाने का था और कीचड़ वैसे भी अपने देश में काफी फ़ैल चुका है। इसका दूसरा लाभ भी प्रधानमंत्री भूल गए।  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमाना है। 15 मिनट में यह क्रांतिकारी अवधारणा और इसका प्रायोगिक स्वरुप “दनादन बैटिंग” के फ़ॉर्मेट में पूरे हिंदुस्तान में हीं नहीं अखिल विश्व में लोगों ने देखा। भारत अपने समुन्नत प्रजातंत्र और संस्कृति के लिए जाना जाता है। लिहाज़ा प्रजातंत्र के इस नए फ़ॉर्मेट पर दुनिया के राजनीति-शास्त्र के लोग अभी इस बात का विश्लेषण करेंगे कि कैसे जिस भारत ने दुनिया को अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिती, खगोल-शास्त्र जैसी विद्याएँ, संस्कृत भाषा और गीता जैसे आध्यात्मिक ग्रन्थ ही नहीं दिए, प्रजातंत्र की “वज्जियन संघ” से भी 2500 साल पहले नवाजा, वही एक बार फिर प्रजातंत्र की एक नयी अवधारणा दुनिया को दे रहा है - “दे दनादन” प्रजातंत्र।
इससे प्रजातंत्र तो पुख़्ता होगा ही, भ्रष्टाचार का दानव भी हमेशा के लिए एक कोने में स्थित हो जाएगा और वही इसको अमल में ला सकेगा जो दल का हो, अपनी विचारधारा का हो या जिसे चुने हुए प्रतिनिधि या विचारधारा के अलमबरदार अनुमति दें (पश्चिम बंगाल में दशकों से मार्क्सवादियों ने और अब ममता से इसका प्रयोग “बख़ूबी” किया है)। 

तीसरा, इससे इतर कोई भी अधिकारी अब यह हिमाकत नहीं करेगा कि अगर कोई इमारत भग्नावस्था में खड़ी है और उसके गिराए जाने का आदेश है (यहाँ तक कि अगर अदालती आदेश या सरकारी आदेश हो तो भी) तो अधिकारी ऐसा तब तक नहीं करेंगे जब तक इस नए फ़ॉर्मेट में जन प्रतिनिधि आदेश नहीं देते। 

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अगर राजनीति-शास्त्र के प्रणेता जर्मी बेन्थम, जॉन स्टुअर्ट मिल और जेम्स मिल के ज़माने में ‘‘बैट’’ या ‘‘कीचड़’’ प्रजातंत्र का हथियार बनता तो आज दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी होती। इन दोनों नए प्रयोगों से कितनी आसानी से भ्रष्टाचार सिकुड़ जाएगा, शायद इसका अंदाज़ा हम अकिंचन विश्लेषकों को तो छोड़िये मोदी और अमित शाह सरीखे रणनीतिकारों को भी नहीं है। अभी तक मोदी जी की “समाज-सुधार” की सुई पाँच साल में स्वच्छता से जल-संचयन तक ही खिसक पायी है। मोदी जी, याद कीजिये भारतीय संस्कृति और रामचरित मानस का वह भाग - ज्ञान चाहे कहीं से भी मिले, किसी वय या हैसियत के व्यक्ति से मिले उसे सादर हासिल करना चाहिए।
अगर एक युवा विधायक सबसे बड़े दंश – भ्रष्टाचार को एक झटके में ख़त्म करने का सन्देश दुनिया को दे सकता है तो क्यों न इसे राष्ट्रीयता के मूल मन्त्रों में शामिल किया जाये और लोगों से “वन्दे मातरम” कहलवाने की जगह “वन्दे बैटम” और “दे दनादन” कहलवाया जाये।
इससे पार्टी के 11 करोड़ कार्यकर्ताओं में एक नयी स्फूर्ति का संचरण होगा और देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगा। बैट रहेगा (या कीचड़) तो ये 11 करोड़ कार्यकर्ता 3 करोड़ से ज़्यादा सरकारी अमले को “सुधार” सकेंगे। मंत्री गिरिराज किशोर को किसी को पाकिस्तान भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और मंत्री साध्वी को “रामजादे बनाम ....” की चेतावनी भी नहीं देनी होगी और न ही किसी अन्य सांसद साध्वी को पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की शहादत का “असली कारण” बताना पड़ेगा।

क्या स्थिति बदलेगी?

क्या मोदी की इस सख़्त टिप्पणी के बाद स्थिति बदलने जा रही है? शायद पार्टी स्तर पर ऐसी सोच पनपे। आज जब ऐसा लगता है कि मोदी एक स्वस्थ प्रशासन देना चाह रहे हैं तो ऐसे में ये घटनाएँ उस ऐतिहासिक ख़तरे की ओर इशारा करती हैं जिसमें पार्टी के द्वितीयक और तृतीयक स्तर के नेता सत्ता उन्माद में ऐसा व्यवहार करने लगते हैं जो समाज को डराता और चुभता है और तब आती है लोकप्रिय नेता की भूमिका। अगर उसने सही समय पर सख़्ती नहीं अपनाई तो दल को लालू, मुलायम और मायावती की पार्टी बनने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। और यह जन-अविश्वास इतनी तेज़ी से फैलता है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक दल (राजद) के नेता लालू यादव को पता भी नहीं चलता कि जब उनका विधायक बलात्कार के मामले में जेल की सजा काट रहा होता है और उसकी पत्नी को संसद का टिकट दे दिया जाता है तो स्वयं यादव समाज भी डरने लगता है।
उत्तर प्रदेश में जब समाजवादी झंडा लगाये एक गुंडानुमा व्यक्ति सरेआम थानेदार की वर्दी उतरवाने की धमकी देता था तो भी आम लोग डरते थे और यादवों को भी उनमें राबिनहुड दिखता था। प्रधानमंत्री का यह सख़्त सन्देश शायद देश की विधानसभाओं के 4000 से ज़्यादा विधायकों और 800 के क़रीब सांसदों को ही नहीं पार्टी के पूरे कैडर को और आम जनता को भी सुकूनबख़्श लगा होगा।
एन.के. सिंह
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