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दिल्ली: दंगे होते रहे, चैन की नींद सोते रहे मुसलमानों के ‘हमदर्द’

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में तीन दिन तक दंगों का नंगा नाच चलता रहा। कई जगहों पर पुलिस हमलों में दंगाइयों का साथ देती नज़र आई। लगातार हिंसक झड़पें, पथराव और आगज़नी की ख़बरें आती रहीं। दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ने दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। इस सबके बीच मुसलमानों के मसीहा बनने वाले राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल से लेकर अखिलेश यादव और मायावती तक चुप्पी साधे रहे। प्रियंका गाँधी ज़रूर दंगों के ख़िलाफ़ दिल्ली की सड़कों पर उतरीं। 

सबसे पहले बात करते हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की। दिल्ली का मुख्यमंत्री होने के नाते दिल्लीवासियों का दुख-दर्द समझने और उनके दुख में शरीक होने की पहली ज़िम्मेदारी उन्हीं की बनती है। लेकिन केजरीवाल ख़ुद असहाय नज़र आए। दिल्ली पुलिस की कमान उनके हाथ में नहीं होने की दुहाई देते हुए उन्होंने लाचारी दिखाई। हालाँकि उन्होंने कई बैठकें बुलाईं। केंद्र से दंगों को जल्द क़ाबू में करने की अपील की। सेना की तैनाती की भी मांग की। लेकिन वह आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करते नहीं दिखे। 

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केजरीवाल पर आरोप है कि जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे हो रहे थे तब कुछ लोग मदद की गुहार लगाने के लिये उनके घर गए थे लेकिन वह उन लोगों से नहीं मिले। पुलिस ने बाहर से ही उन्हें खदेड़ दिया। केजरीवाल ने राजघाट जाकर महात्मा गाँधी की समाधि के सामने दंगों को रोकने के लिए प्रार्थना तो की लेकिन दंगा ग्रस्त इलाक़ों का दौरा करने की ज़हमत नहीं उठाई। 

आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला ख़ान और अब्दुल रहमान दंगा पीड़ितों का हालचाल जानने ज़रूर पहुंचे। लेकिन केजरीवाल इससे परहेज ही करते दिखे। दिल्ली चुनाव के कारण शाहीन बाग़ नहीं जाने के आरोपों से घिरे केजरीवाल की साख़ पर अब यह नया बट्टा लगा है।

कहाँ ग़ायब हैं राहुल गाँधी?

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी दिल्ली में दंगों की शुरुआत वाले दिन से ही लापता हैं। दिल्ली में 24 फ़रवरी को दंगों की शुरुआत हुई थी। उसी दिन राहुल गाँधी ने शाम को 6 बजकर 38 मिनट पर एक ट्वीट करके दंगे भड़कने पर चिंता ज़ाहिर की थी। राहुल ने लिखा था, ‘दिल्ली में आज की हिंसा परेशान करने वाली है और इसकी निंदा की जानी चाहिए। शांतिपूर्ण विरोध स्वस्थ लोकतंत्र का प्रतीक है, लेकिन हिंसा को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। मैं दिल्ली के नागरिकों से आग्रह करता हूं कि वे किसी तरह के उकसावे पर भी संयम, करुणा और समझ दिखाएं।’

इस ट्वीट के बाद से राहुल कहीं नज़र नहीं आए। न ट्विटर पर और न ही कहीं सियासत के मैदान में। इस बीच कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक भी हुई और कई प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी। कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को राष्ट्रपति से भी मुलाक़ात की। राहुल गाँधी पार्टी में किसी पद पर नहीं है। लिहाज़ा उनके पार्टी की बैठकों में शामिल नहीं होने पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। लेकिन सांसद होने के नाते वह राष्ट्रपति से मिलने गए प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा तो हो ही सकते थे। हालांकि राहुल ने ट्वीट करके दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर के तबादले का जिक्र करते हुए जस्टिस लोया को याद किया है। 
कांग्रेस में यूं तो पर्दे के पीछे से कांग्रेस की बागडोर राहुल गाँधी ही संभाल रहे हैं। लेकिन ऐसे मौक़ों पर जब पार्टी के नेता उनसे कोई बड़ी भूमिका निभाने की उम्मीद करते हैं तो वह अक्सर ग़ायब हो जाते हैं।

राहुल से ज़्यादा सक्रिय हैं प्रियंका 

राहुल के उलट प्रियंका गाँधी वाड्रा ज़्यादा सक्रिय नज़र आती हैं। हालाँकि प्रियंका पार्टी में महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी भी हैं। लेकिन दिल्ली में वह लगातार सक्रिय रही हैं। नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में भी प्रियंका ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। अब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़कने के बाद भी वह राहुल से ज्यादा सक्रिय नज़र आईं। प्रियंका सिर्फ ट्वीट करने तक ही सीमित नहीं रहीं। प्रियंका ने बुधवार को बाक़ायदा सड़क पर उतर कर शांति मार्च निकाला।

खामोश क्यों रहे अखिलेश, मायावती?

उत्तर प्रदेश में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती मुसलिम वोटों के सबसे बड़े ठेकेदार माने जाते हैं। लेकिन दिल्ली दंगों पर इन दोनों ही नेताओं की खामोशी हैरान करने वाली है। अखिलेश ने 24 फ़रवरी को दिल्ली में दंगे भड़कने के बाद एक ट्वीट करके लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की थी। इसके बाद दिल्ली में तीन दिन तक दंगे हुए। मगर अखिलेश यादव को दिल्ली के हालात पर दूसरा ट्वीट करने तक की फुर्सत नहीं मिली। 

अखिलेश यादव इन दिनों ट्विटर-ट्विटर खेलने के लिए बदनाम हो चुके हैं। ऐसा लगता है कि उनकी सियासत अब ट्वीट करने तक ही सीमित होकर रह गई है।

उत्तर प्रदेश में पुलिसिया अत्याचार

उत्तर प्रदेश में लखनऊ से लेकर अलीगढ़, मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर और आज़मगढ़ तक में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिसिया अत्याचार हुए लेकिन अखिलेश कहीं ज़मीन पर उतनी सक्रियता के साथ नज़र नहीं आए जितना कि पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें दिखना चाहिए था। दिल्ली तो अखिलेश के लिए वैसे भी दूर है। ऐसे में अखिलेश से दिल्ली के हालात पर लिखने, बोलने और ज़मीन पर उतरने की उम्मीद करना ही बेमानी है। 

बसपा प्रमुख मायावती वैसे तो राजनीति में अब ज़मीन पर सक्रिय नहीं रहतीं। लोकसभा चुनाव से पहले वह ट्विटर पर आई थीं। लेकिन वहां भी वह दलितों से जुड़े मुद्दों पर ही ज़्यादा सक्रिय नज़र आती हैं।

दिल्ली में दंगे होने के दो दिन बाद मायावती को शायद इसकी याद दिलाई गई तो 26 फ़रवरी को उन्होंने ट्वीट करके दंगों के लिए जिम्मेदार दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की। ग़ौरतलब है कि मायावती ने यह ट्वीट तब किया जब दिल्ली में दंगों का तांडव काफ़ी हद तक रुक चुका था। दिल्ली में ऐसे आरोप भी लग रहे हैं कि बीजेपी समर्थित कुछ दलित भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगों में शामिल थे। 

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दलित-मुसलिम गठजोड़ की राजनीति करने वाली मायावती की यह ज़िम्मेदारी बनती थी कि वह दलित समाज से दंगों से दूर रहने और मुसलमानों के बचाव में खड़े होने की अपील करतीं। लेकिन मायावती ने ऐसा नहीं किया। जबकि उन्होंने उत्तर प्रदेश में दलितों को नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ सड़कों पर नहीं उतरने की हिदायत दी थी। 

राहुल हों या केजरीवाल या फिर अखिलेश हों या मायावती, दिल्ली दंगों पर सबने ख़ामोश रहकर साबित कर दिया है कि इनका मुसलिम प्रेम सिर्फ़ वोट लेने तक ही सीमित है। जब मुसलमानों को इनके साथ की ज़रूरत पड़ती है तो ये मैदान छोड़कर भाग जाते हैं। इसी वजह से मुसलिम समाज में इनकी साख़ गिरती जा रही है।   

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यूसुफ़ अंसारी
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