वाराणसी में इन दिनों एक अजीब दृश्य है। घाट वही हैं, गंगा वही है, शहर की चाल भी लगभग वैसी ही है। लेकिन जैसे ही आप हवाई अड्डे से शहर की तरफ़ बढ़ते हैं, एक बात बार-बार सामने आती है—हर कुछ दूरी पर एक ही चेहरा। नरेंद्र मोदी। यह केवल प्रचार नहीं लगता; यह जैसे एक निरंतर उपस्थिति है, जो शहर पर फैली हुई है।

दूर से देखने वाले को यह असहज कर सकता है। उसे इसमें लोकतंत्र की जगह सिकुड़ती दिखेगी। लेकिन जिन लोगों ने इस चेहरे को यहाँ तक पहुँचाया है, उनके लिए इसका अर्थ अलग है। उनके लिए यह प्रतिनिधित्व का एक नया रूप है—जैसे पहली बार कोई उनकी भाषा में, उनकी तरफ़ से बोल रहा हो।

इसी बिंदु से एक बात समझ में आने लगती है। यहाँ चुनाव एक घटना नहीं रह गया है जो पाँच साल में एक बार आता है। वह एक निरंतर स्थिति बन चुका है। शासन और चुनाव के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। प्रधानमंत्री का पद केवल प्रशासन का नहीं, एक स्थायी अभियान का केंद्र बन गया है।

संसद में दिया गया भाषण हो या किसी सभा में कही गई बात, दोनों के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम हो गया है। हर वक्त एक संघर्ष का भाव मौजूद रहता है। हर असहमति को सिर्फ़ मतभेद नहीं माना जाता, बल्कि एक स्थिति दे दी जाती है- कौन साथ है, कौन विरोध में है। इसी से वह भाषा बनती है जिसमें विरोधियों को नाम दिए जाते हैं- राष्ट्र-विरोधी, शहरी नक्सल, देश के खिलाफ खड़े लोग।
यह भाषा केवल प्रतिक्रिया नहीं है; यह एक सोच-समझकर बनाई गई संरचना है। इसका उद्देश्य बहस को जीतना नहीं, बहस की शर्तें बदल देना है।

विपक्ष इस बदलाव को देखता है। वह इसका जवाब भी देता है, लेकिन उसी तरीके से जिसे वह लंबे समय से अपनाता आया है। वह आँकड़े रखता है, रिपोर्टें गिनाता है, और मान लेता है कि तथ्यों की अपनी एक शक्ति होती है। वह बताता है कि प्रेस की स्वतंत्रता पर दबाव है, कि V-Dem Institute जैसे संस्थान भारत को लेकर चिंता जता रहे हैं। वह यह भी दिखाता है कि जाँच एजेंसियों की सक्रियता एक दिशा में अधिक दिखाई देती है और मीडिया के स्वामित्व में बदलाव आ रहा है।

फिर Arundhati Roy का मामला सामने आता है—एक पुराना भाषण, और कई साल बाद उस पर क़ानूनी कार्रवाई। इस तरह के उदाहरणों से एक तर्क बनता है। लेकिन यह तर्क उतना असर नहीं करता जितनी उम्मीद की जाती है।

यहीं असली सवाल खड़ा होता है—क्यों?

इसका जवाब यह नहीं है कि लोग समझ नहीं रहे। बल्कि यह है कि वे एक अलग तरह की बात को महत्व दे रहे हैं।

इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। जब देश स्वतंत्र हुआ, तब एक बुनियादी विचार अपनाया गया—कि इतने विविध समाज को एक साथ रखने के लिए उसकी गहरी पहचानें सार्वजनिक जीवन से कुछ दूरी पर रखनी होंगी। राज्य के सामने सभी केवल नागरिक होंगे।

यह विचार अपनी जगह सही था, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी था।

व्यक्ति केवल नागरिक नहीं होता; वह अपनी परंपराओं, स्मृतियों और विश्वासों से बना होता है। जब उससे कहा जाता है कि वह इन सबको सार्वजनिक जीवन से अलग रखे, तो यह उसके भीतर एक तरह की दूरी पैदा करता है।

समय के साथ यह दूरी कई लोगों ने महसूस की।

मोदी ने इसी दूरी को पहचाना। उन्होंने इसे सिद्धांत की भाषा में नहीं, अनुभव की भाषा में समझा। और उसका उत्तर किसी नीति से नहीं, एक स्वीकृति से दिया—जैसे हो, वैसे ही रहो। अपनी पहचान को छिपाने की ज़रूरत नहीं है।

अयोध्या में मंदिर का उद्घाटन

अयोध्या में मंदिर का उद्घाटन इसी का एक प्रतीक बन गया। वहाँ केवल एक निर्माण नहीं हुआ; एक भावना को सार्वजनिक रूप मिला। उस क्षण में बहुत से लोगों को लगा कि उनकी अपनी कहानी को जगह मिली है।

विपक्ष इस स्तर पर संवाद नहीं बना पाया। जब वह आर्थिक समस्याओं—बेरोज़गारी, कृषि संकट—की बात करता है, तो वह सही मुद्दे उठाता है। लेकिन उसकी भाषा उस भावनात्मक धरातल को नहीं छू पाती जिस पर राजनीति खड़ी हो चुकी है।

इसके साथ एक और बदलाव हुआ है। जिन संस्थाओं पर पहले भरोसा किया जाता था—अदालत, मीडिया, अंतरराष्ट्रीय आकलन—उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए गए हैं। ऐसे में उनके द्वारा कही गई बात बहुतों के लिए प्रमाण नहीं रह जाती, बल्कि एक पक्ष की राय बन जाती है।
यहीं सत्ता की बढ़त बनती है। बाहर से आने वाली आलोचना भीतर समर्थन में बदल जाती है। जब कोई विपक्षी नेता विदेश में जाकर सरकार की आलोचना करता है—जैसे राहुल गांधी—तो उसे अलग तरह से पढ़ा जाता है।

इस तरह “राष्ट्र-विरोधी” जैसे शब्द केवल आरोप नहीं रहते; वे एक भावनात्मक प्रतिक्रिया बन जाते हैं।

विपक्ष की कठिनाई क्या?

विपक्ष की कठिनाई यह है कि वह उसी ढाँचे को पुनर्जीवित करना चाहता है, जिस पर लोगों का भरोसा कम हो चुका है। वह पुनर्स्थापन की बात करता है, जबकि ज़रूरत एक नई कल्पना की है।

लोग अब यह नहीं पूछ रहे कि पहले क्या था। वे यह जानना चाहते हैं कि आगे क्या होगा।

यहीं एक नया वर्ग सामने आता है—वह व्यक्ति जो अपनी पहचान को लेकर आश्वस्त है, लेकिन अपने जीवन की वास्तविकताओं से संतुष्ट नहीं है। उसे गर्व है, पर वह यह भी देखता है कि नौकरी मिलना कठिन है, जीवनयापन महँगा है, और अवसर सीमित हैं।

यह विरोधाभास धीरे-धीरे गहराता है। और इतिहास बताता है कि ऐसे विरोधाभास लंबे समय तक स्थिर नहीं रहते।

एक समय आता है जब सम्मान और जीवन की वास्तविकता आमने-सामने खड़े हो जाते हैं।

भारत उस दिशा में बढ़ रहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि यह बदलाव आएगा या नहीं। प्रश्न यह है कि जब यह आएगा, तब क्या कोई स्पष्ट दिशा होगी। यदि दिशा नहीं होगी, तो असंतोष परिवर्तन नहीं, अव्यवस्था पैदा करेगा।

यहीं भविष्य की राजनीति का सवाल है। क्या कोई ऐसा नेतृत्व सामने आएगा जो पहचान और विकास को एक साथ समझ सके? जो केवल शिकायत न करे, बल्कि आगे का रास्ता दिखाए?

अभी ऐसा कोई स्पष्ट स्वर दिखाई नहीं देता। लेकिन उसके लिए जगह बन रही है—हर उस क्षण में जब कोई युवा बेहतर अवसर के लिए बाहर जाता है, जब कोई किसान अपनी बात अनसुनी पाता है, जब कोई नागरिक अपने जीवन और वादों के बीच का अंतर महसूस करता है।

आज की राजनीति में एक ही कथा प्रमुख है—मोदी की। लेकिन कोई भी कथा स्थायी नहीं होती।

जब वह आगे बढ़ना बंद कर देती है, तो उसके भीतर ही नए प्रश्न जन्म लेने लगते हैं।

अगला भारत अतीत को वापस लाकर नहीं बनेगा। वह एक नई दिशा से बनेगा—एक ऐसे विचार से जो यह न पूछे कि क्या खो गया, बल्कि यह कि अब क्या संभव है।

भारत उसी प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है।
वाराणसी में हजारों साल की प्रार्थनाओं और राख भरे माहौल की हवा में एक नया रंग घुल गया है। हर बिलबोर्ड पर एयरपोर्ट से लेकर गंगा किनारे तक नरेंद्र मोदी का चेहरा दिखता है। शांत स्थिर जैसे कोई देवता जो पहले ही जीत चुका हो।

दुनिया वाले इसे लोकतंत्र का अंत कहते हैं। लेकिन उन्हें चुनने वाले करोड़ों लोगों के लिए यह कुछ और है। यह है अपनी पहचान का चेहरा जो आखिरकार सामने आ गया।

बारह साल हो गए। अब साफ़ दिखता है मोदी शासन नहीं करते वे लगातार चुनाव लड़ते रहते हैं। प्रधानमंत्री की कुर्सी से ही रैली करते हैं।
हर भाषण रैली जैसा। हर फैसला हथियार। हर विरोधी दुश्मन। राष्ट्रविरोधी शहरी नक्सली भारत का दुश्मन। असली भारत जो अदालतों और अंग्रेजी अखबारों वाले भारत से अलग है।

उनकी पार्टी के लोग खुलकर कहते हैं जो मोदी के साथ नहीं वह भारत के खिलाफ है।

विरोधी सब जानते हैं। फिर भी आते रहते हैं तथ्य लेकर दस्तावेज लेकर उन नियमों पर भरोसा करके जो मोदी ने बहुत पहले छोड़ दिए।

वे बताते हैं कि इन सालों में क्या हुआ। प्रेस स्वतंत्रता में भारत एक सौ इकसठवें नंबर पर पहुंच गया। दुनिया के सारे कामयाब लोकतंत्रों से नीचे। वी-डेम ने कहा भारत अब चुनावी तानाशाही है। दो हजार चौबीस में सबसे तेजी से तानाशाही की तरफ़ बढ़ने वाले देशों में शामिल।
केंद्रीय एजेंसियां विपक्षी नेताओं पर हावी होती रहीं। यह बात अब कोई इनकार नहीं करता। सत्ता के क़रीबी अरबपतियों ने चुपचाप स्वतंत्र टीवी चैनल खरीद लिए।

और अरुंधति रॉय। भारत की सबसे मशहूर लेखिका। बुकर पुरस्कार जीत चुकीं। पंद्रह साल पुराने भाषण के लिए अब आतंकवाद के कानून में फंसाई जा रही हैं। आरोप दो हजार तेईस में लगा। मोदी की जीत के तुरंत बाद पक्का कर दिया गया। संदेश साफ था।

विरोधी यह सब मुद्दे उठाते हैं। लेकिन उससे कुछ नहीं बदलता।
क्योंकि मतदाता बेवकूफ नहीं हैं। उन्होंने हिसाब कर लिया है। लेकिन उनका हिसाब विपक्षियों के हिसाब से अलग है।

यह कहानी दो हजार चौदह की नहीं उन्नीस सौ सैंतालीस की है। आजाद भारत ने एक सौदा किया था। नेहरू का सौदा। कहा गया था कि हमारी इतनी बड़ी सभ्यता तभी एक रहेगी जब हम अपनी असली पहचान को छिपा लेंगे। धर्म, जाति, इतिहास सब को अलमारी में बंद कर देंगे। सार्वजनिक जगह धर्मनिरपेक्ष रहेगी। तर्क की प्रक्रिया काग़ज़ पर बनी। हिंदू मुस्लिम दलित सब सिर्फ नागरिक।

यह सपना बड़ा था। लेकिन करोड़ों लोगों के लिए यह निर्वासन था।

दर्द यह था कि दिन रात सब अपनी जाति अपनी आस्था अपने पुरखों की याद में जीते थे लेकिन राज्य कहता था कि थे यह सब भूल जाओ सिर्फ नागरिक बनो।

और यह सब अंग्रेजी में कहा जाता था उन संस्थानों से जो बाहर से आए लगते थे, उन लोगों से जो पश्चिम की तरफ देखते थे।

मोदी ने समझ लिया। चाय वाले की समझ से। उन्होंने देखा कि यह सौदा सड़ चुका है। उन्होंने नई नीति नहीं दी। उन्होंने अनुमति दी।

बिना शर्मिंदगी के हिंदू होने की अनुमति। अपनी पुरानी अपमानित अब उठती सभ्यता में खुद को देखने की अनुमति। बाहर वाले अखबारों और अदालतों को दुश्मन की चाल मानने की अनुमति।

जब उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर में पूजा की- नंगे पैर, आंखें बंद- राजा की तरह तो वे मंदिर नहीं खोल रहे थे। वे सभ्यता का हिसाब बराबर कर रहे थे।

सालों की लड़ाई, टूटा मस्जिद, कोर्ट का फ़ैसला- सब एक तस्वीर बन गई। नंगे पैर प्रधानमंत्री प्रार्थना में। उनके लोगों के लिए यह राजनीति नहीं थी। यह घर वापसी थी।

विरोधी इसी दीवार से टकराते रहते हैं। जब कांग्रेस दस साल की नाकामियों की लंबी फेहरिस्त निकालती है- खेती की मजदूरी रुकी हुई, पढ़े लिखे युवाओं में चालीस फीसदी बेरोजगारी तो वे जवाबदेही की भाषा बोलते हैं।

लेकिन जवाबदेही की भाषा तब चलती है जब दोनों पक्ष एक ही नियम मानते हों। जब मापने वाले खुद भरोसे के हों।

मोदी की राजनीति में जवाबदेही का मालिक पहले से तय है। अदालतें, प्रेस, विदेशी रिपोर्ट- ये वही हैं जिन्होंने पहले निर्वासन थोपा था। अब मोदी कहते हैं- ये सब उनके दुश्मनों के हाथ में हैं। तो इनका फ़ैसला कोई मतलब नहीं रखता।

मोदी ने एक बात और समझी। विदेश से जितना हमला होगा घर में उतना फायदा। जब पश्चिमी अखबार उन्हें लोकतंत्र का ख़तरा बताते हैं उनके समर्थक खुश होते हैं देखो हमारे दुश्मन डर गए।
जब राहुल गांधी अमेरिका जाकर मोदी पर आरोप लगाते हैं तो यहां कई लोग सोचते हैं अपने देश के खिलाफ बाहर से मदद मांग रहे हैं।
राष्ट्रविरोधी का ठप्पा इसलिए लग जाता है क्योंकि इसे लगाने के लिए तैयार किया गया था।

विरोधियों की सबसे बड़ी गलती यह है कि वे पुरानी सहमति वापस लाना चाहते हैं। अदालतें ठीक करो, प्रेस आजाद करो, नेहरू वाले दिन लौटाओ।

वे यह नहीं देख रहे कि वह सहमति पहले ही टूट चुकी थी। लोग उससे ऊब चुके थे। वे उस पुराने मंदिर की रक्षा कर रहे हैं जिसकी पूजा करने वाले पहले ही चले गए।

राहुल गांधी अब यात्राएँ कर रहे हैं, मंदिर जा रहे हैं, हिंदू होने की कोशिश कर रहे हैं। वे समझ गए हैं कि जमीन बदल गई है। लेकिन समझना काफी नहीं।

नई जमीन जीतने के लिए नकल नहीं नई भाषा चाहिए। पुरानी भाषा खत्म हो गई। ‘अदालतें वापस लाओ’, ‘प्रेस मुक्त करो’ वाली भाषा अब किसी को छूती नहीं। वह भारत अब नहीं रहा जिससे लोग जुड़े थे।

नई भाषा भविष्य की होगी। वह लोगों से पुरानी संस्थाओं का रोना नहीं रोएगी। वह कहेगी ऐसी संस्थाएं बनाएं जो भरोसे की हों।

वह गर्व भी नहीं बेचेगी, शर्म भी नहीं। वह बस एक दिशा दिखाएगी। मोदी ने उस आदमी से बात की जो अपने देश में अनदेखा महसूस कर रहा था। अपनी सभ्यता से कटा हुआ।

विरोधी अब उसी आदमी से नरम स्वर में बात करके नहीं जीत सकते। उन्हें उस आदमी तक पहुंचना होगा जो दस साल के तमाशे के बाद भी जिंदा है। जो अब थोड़ा बड़ा हो गया है। गर्व अभी भी है लेकिन बेटा बेरोजगार है, बेटी जहरीली हवा ले रही है, बैंक में पैसे घट रहे हैं, जबकि कुछ अरबपति और अमीर हो रहे हैं।

यह आदमी मौजूद है। यह बहुमत है। बस इसे अब तक कोई सही भाषा में नहीं बोला।

सभ्यता का तमाशा नशा है। लेकिन नशा खेत नहीं बोता हिसाब नहीं भरता। खेती बर्बाद हो रही है। जलवायु बिगड़ रही है। पढ़े लिखे युवा बेरोजगार घूम रहे हैं।

इतिहास बताता है जो नेता सिर्फ गरिमा देता है विकास नहीं उसे एक दिन हिसाब देना पड़ता है। तमाशा उस हिसाब को रोक नहीं पाता।
भारत इंतजार नहीं कर सकता कि यह हिसाब खुद आए। बिना दिशा का हिसाब सिर्फ गड़बड़ पैदा करता है।

सवाल है क्या कोई नेता आएगा जो समझे कि अगला भारत शिकायत की भाषा में नहीं बनेगा। जो हिम्मत करे और ज्वार मुड़ने से पहले यह कह दे।

अभी वह नेता नहीं दिखा। लेकिन जगह खुल रही है। हर बार जब कोई इंजीनियर कनाडा चला जाता है। हर बार जब किसानों की आवाज़ दिल्ली में दबा दी जाती है। हर बार जब कोई पुराना समर्थक चुपचाप सोचता है- वादा तो बहुत था जिंदगी वैसी नहीं हुई।

मोदी अभी अकेली कहानी हैं बाजार में। लेकिन बाजार बदलते हैं। लोग अब महसूस कर रहे हैं कि यह कहानी आगे नहीं बढ़ रही।

अगला भारत पुराने को वापस लाकर नहीं बनेगा। वह बनेगा उस आदमी से जो एक नया वाक्य लिखेगा। जो शुरू होगा क्या लिया गया से नहीं बल्कि क्या बनाया जा सकता है से।

भारत इंतजार कर रहा है। बहुत लंबे समय से।
जितना वह खुद जानता है उससे भी ज्यादा।

(सतीश झा टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के दिनमान साप्ताहिक के पूर्व संपादक हैं।)