पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने का सियासी शिगूफा छोड़कर जनता उन्नयन पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर का बीजेपी से करोड़ों रूपये लेकर चुनाव लड़ने का स्टिंग ऑपरेशन कितना सच है, यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन इस स्टिंग से इस आरोप को बल मिला है कि हुमायूं अपने निजी लाभ के लिये बीजेपी से मिले हुए हैं। ऐसे ही ऑल इंडिया मुस्लिम इत्तेहाद ए मुस्लिमीन के सदर असदुद्दीन ओवैसी पर लोग शक करते हैं कि वह अपने 15000 करोड़ के कारोबार को बिना किसी जांच-छापे और दबाव के कैसे चला पा रहे हैं? इतना ही नहीं असम में पहले जमीयत ए उलेमा ए हिंद से जुड़े रहे मौलाना बदरूद्दीन अजमल पर भी एआईयूडीएफ बनाकर मुस्लिम वोट को कांग्रेस जैसी सेकुलर पार्टी से अलग कर राज्य में बीजेपी की सरकार बार-बार बनाने का रास्ता साफ़ करने का आरोप लगता रहा है।

हुमायूं कबीर का वायरल वीडियो

हुमायूं कबीर के बारे में यह स्टिंग ऑपरेशन सामने आया है कि उन्होंने मुसलमानों को बंगाल में टीएमसी से अलग कर बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने के लिये एक हज़ार करोड़ का सौदा किया है। उसके बाद इस स्टिंग के असली नकली होने को लेकर दोनों पक्षों में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। हालाँकि इस स्टिंग की निष्पक्ष जाँच होने तक दावे से यह नहीं कहा जा सकता कि सच क्या है लेकिन सियासत में कभी कभी केवल आरोपों-चर्चाओं और अफवाहों से ही राजनीतिक नफा-नुकसान वक्ती तौर पर जो होना है वह तो हो ही जाता है। इस स्टिंग के बाद ममता बनर्जी के इस आरोप को पर लग गये हैं कि हुमायूं बीजेपी का ही आदमी है।
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इसके बाद ओवैसी ने हुमायूं की जनता उन्नयन पार्टी यानी जउपा से अपना गठबंधन तत्काल तोड़ लिया है। इससे जउपा को भी अब पहले की तरह मुसलमानों का समर्थन नहीं मिलेगा। यह बात पहले दिन से ही शक के दायरे में थी कि जिस पांच सौ साल पुरानी विवादित बाबरी मस्जिद को संघ और बीजेपी कई दशक से नेस्तानाबूद करने पर तुले थे, और आखिरकार 1992 में उसको तोड़ भी दिया गया, फिर कोर्ट का आस्था के आधार पर फैसला आया और उस जगह राम मंदिर बनाया गया, ऐसे में हुमायूं के बाबरी के नाम पर बंगाल में कारसेवा से फिर से एक मस्जिद का बनाना और उस पर संघ परिवार का चुप रहना, यहाँ तक कि कोर्ट का उस पर स्टे न देना समझ से बाहर था। अब यह राज़ काफी हद तक खुल गया है।

ओवैसी की सियासत

कुछ ऐसी ही सियासत ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम कर रही है। इसमें वह कई राज्यों में कुछ हद तक सफल भी होती नज़र आ रही है। लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही कि ओवैसी बीजेपी की जगह सेकुलर विपक्षी दलों का ही विरोध क्यों करते हैं? 

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साथ ही सारे विपक्षी दलों, उनके नेताओं, यहाँ तक कि उनको चंदा देने वाले व्यापारी व्यवसायी और काॅरपोरेट तक पर बार-बार परेशान करने की नीयत से सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स सहित तमाम जांच एजंसियों के छापे पड़ते हैं, लेकिन ओवैसी पर कभी कोई छापा, जांच या मुकदमा दायर क्यों नहीं होता? ऐसे और भी कई गंभीर आरोप और संदेह ओवैसी पर किये जाते रहे हैं जिन पर आज तक वह कोई ठोस सफाई जवाब या वजह नहीं बता सके हैं। जहां तक असम के मौलाना अजमल का सवाल है। उनके ओवैसी की पार्टी से गठबंधन करते ही मौलाना मदनी की जमीयत ए उलेमा ने कड़ा विरोध जताते हुए उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
विचार से और
मौलाना अजमल का भी बहुत बड़ा इत्र का कारोबार है लेकिन इस इत्र से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाने की बदबू आती रही है। पिछली बार चुनाव में असम में मौलाना अजमल की सांप्रदायिक पार्टी से कांग्रेस को गठबंधन का भारी सियासी नुकसान हुआ था, वर्ना राजनीतिक जानकारों का कहना था कि माहौल ऐसा था कि कांग्रेस पांच साल पहले ही असम में सरकार बना सकती थी। इस बार कांग्रेस के सत्ता में वापसी के अच्छे आसार इस लिये भी माने जा रहे हैं कि उसने मौलाना की एआईयूडीएफ से खुद को अलग कर लिया है। वैसे तो यह साफ नहीं कि मौलाना का भी अलग पार्टी बनाकर मुसलमानों के वोट बांटने से बीजेपी को सियासी लाभ पहुंचाना या अपने अरबों के इत्र कारोबार को आराम से बिना सरकारी दखल के चलाना सोची समझी योजना का हिस्सा है या यह महज़ इल्ज़ाम ही है लेकिन इतना तो साफ है कि मौलाना हों, ओवैसी हों या हुमायूं, इनसे पता चलता है कुछ तो पर्दे के पीछे चल ही रहा है।